
देश में कार्यस्थल और परिवार के बीच संतुलन को लेकर चल रही बहस के बीच Supreme Court of India ने एक अहम टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने पर विचार करने के लिए कहा है। अदालत ने साफ कहा कि बच्चे की परवरिश केवल मां की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह दोनों अभिभावकों की साझा जिम्मेदारी है। ऐसे में पिता की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता।
यह टिप्पणी उस समय सामने आई, जब अदालत ने गोद लेने से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उस प्रावधान को रद्द कर दिया, जिसमें तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को कानूनी रूप से गोद लेने पर ही मातृत्व अवकाश का लाभ देने की बात थी। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की उम्र चाहे कुछ भी हो, गोद लेने वाली मां को 12 सप्ताह के मातृत्व अवकाश का अधिकार मिलना चाहिए।
परिवार और कार्यस्थल में लैंगिक समानता की तरफ बड़ा कदम
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि पितृत्व अवकाश का प्रावधान लैंगिक भूमिकाओं को बदलने में अहम भूमिका निभाता है। इससे न सिर्फ पिता को बच्चे की देखभाल में सक्रिय रूप से शामिल होने का मौका मिलता है, बल्कि कार्यस्थल पर महिलाओं पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव भी कम होता है।
बेंच ने कहा कि बच्चे के भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक विकास में मां की भूमिका जितनी जरूरी है, पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पिता को सिर्फ सहायक भूमिका में देखना समाज की एक अधूरी और गलत समझ है, जिसे बदलने की जरूरत है।
बच्चे की परवरिश—एक साझा जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि परवरिश किसी एक माता-पिता का काम नहीं है। दोनों की बराबर भागीदारी ही बच्चे के समग्र विकास के लिए जरूरी है। समाज अक्सर मां की भूमिका को ‘सबसे आवश्यक’ मानकर पिता की मौजूदगी और जिम्मेदारी को उसके मुकाबले कमतर आंकता है। अदालत ने इसे अन्यायपूर्ण बताते हुए कहा कि पिता को भी अधिकार और जिम्मेदारी दोनों के मामले में समान महत्व मिलना चाहिए।
पितृत्व अवकाश को मिले सामाजिक सुरक्षा का दर्जा
अदालत ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने पर विचार करे। अदालत का मानना है कि इस अवकाश की अवधि इस तरह तय की जानी चाहिए कि इससे माता-पिता दोनों के लिए बच्चे की देखभाल आसान हो सके और परिवार पर किसी तरह का अतिरिक्त दबाव न पड़े।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न सिर्फ कामकाजी माता-पिता के लिए राहत की उम्मीद जगाता है, बल्कि देश में लैंगिक समानता और परिवार-हितैषी नीतियों को मजबूत दिशा भी देता है।




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