
यूजीसी के नए विनियमों को लेकर बढ़ते विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत ने इस मामले को पहले से लंबित मूल याचिका के साथ टैग करते हुए साफ कहा कि इसे गंभीरता से सुना जाएगा। यह याचिका भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व सांसद कुंवर हरिवंश सिंह की ओर से दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि सरकार ने यूजीसी के नए नियमों के माध्यम से समाज को वर्गों में बांटने का प्रयास किया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि जातिगत भेदभाव सिर्फ आरक्षित वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसी भी सामाजिक समूह के साथ हो सकता है। ऐसे में नियमों को कुछ विशेष समुदायों तक सीमित रखना भेदभाव की व्यापक वास्तविकता को नजरअंदाज करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही लगाई थी रोक
गत 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा’ देने वाले विनियमों पर अंतरिम रोक लगा दी थी। ये नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे। अदालत ने इन्हें “प्रारंभिक रूप से अस्पष्ट” बताते हुए कहा था कि इनके लागू होने से “बहुत व्यापक प्रभाव” पड़ सकते हैं और यह भी आशंका जताई थी कि इससे समाज में विभाजन बढ़ सकता है। अधिसूचना जारी होने के बाद देशभर के कई शहरों में इसका विरोध शुरू हो गया था।
सड़क से लेकर कैंपस तक विरोध
हाल ही में जयपुर में राजपूत करणी सेना ने भी इन नियमों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया और विनियमों को तुरंत वापस लेने की मांग की। संगठन के अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना ने कहा कि युवा किसी भी तरह के अन्याय को स्वीकार नहीं करेंगे। राजस्थान ही नहीं, कई राज्यों के शैक्षिक संस्थानों में भी छात्रों और संगठनों ने विरोध जताया है।
विरोध की असल वजह क्या है?
याचिकाओं में मुख्य आपत्ति इस बात पर उठाई गई है कि नए नियमों में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित कर दी गई है। विरोध कर रहे समूहों का कहना है कि इससे ऐसा प्रतीत होता है मानो भेदभाव केवल इन्हीं समुदायों के साथ होता हो, जबकि वास्तविकता इससे कहीं व्यापक है।
आलोचकों का यह भी कहना है कि सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों के लिए न तो कोई संस्थागत सुरक्षा का प्रावधान किया गया है और न ही कोई मजबूत grievance redressal system मौजूद है। यही कारण है कि इसे “एकतरफा” और “अधूरा” बताया जा रहा है।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब सरकार और यूजीसी को अपने पक्ष स्पष्ट करने होंगे। अदालत की अगली सुनवाई में यह तय होगा कि आगे इन नियमों का भविष्य क्या होगा और क्या इनमें संशोधन या पूरी तरह बदलाव की आवश्यकता है।
यह मामला न सिर्फ शिक्षा जगत बल्कि सामाजिक संरचना और संवैधानिक समानता के मुद्दे को भी छूता है। ऐसे में देशभर की नजरें सुप्रीम कोर्ट की अगली कार्यवाही पर टिकी हैं।




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