
राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के गायन को लेकर जारी केंद्र सरकार के सर्कुलर के खिलाफ दायर याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सार्वजनिक स्थानों और कार्यक्रमों के लिए जारी यह एडवाइजरी अनिवार्य नहीं है और इसमें किसी तरह की सजा का प्रावधान भी नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना कि याचिका समय से पहले दाखिल की गई है।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने की। यह याचिका मोहम्मद सईद नूरी की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी को जारी ‘वंदे मातरम’ के गायन संबंधी परिपत्र और स्कूलों व दफ्तरों में इसके पालन के प्रोटोकॉल को चुनौती दी गई थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि गृह मंत्रालय की एडवाइजरी केवल एक प्रोटोकॉल है, बाध्यकारी आदेश नहीं। यदि कोई व्यक्ति ‘वंदे मातरम’ नहीं गाता है तो उसके खिलाफ दंड का कोई प्रावधान नहीं है। पीठ ने कहा कि जब तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती या उसे जबरन गाने के लिए बाध्य नहीं किया जाता, तब तक अदालत दखल देने की जरूरत नहीं समझती।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या उनके पास ऐसा कोई नोटिस है, जिसमें उन्हें राष्ट्रगीत गाने के लिए मजबूर किया गया हो। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता एक स्कूल चलाते हैं, लेकिन रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं है कि वह स्कूल मान्यता प्राप्त है या नहीं।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने दलील दी कि ‘वंदे मातरम’ गाने या राष्ट्रगीत के समय खड़े होने से इनकार करने वालों पर सामाजिक और प्रशासनिक दबाव बन सकता है। सलाह के नाम पर लोगों को सामूहिक रूप से गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल है।
इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यह एक दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन सभी लोग इससे सहमत हों, जरूरी नहीं। अगर भविष्य में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कार्रवाई होती है या कोई औपचारिक नोटिस जारी होता है, तो वे दोबारा अदालत का रुख कर सकते हैं। फिलहाल अदालत को यह याचिका ठोस आधार के बजाय आशंका पर आधारित लगी।
सुनवाई के दौरान अदालत में मौजूद भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने टिप्पणी करते हुए कहा, “क्या हमें राष्ट्रगान का सम्मान करने के लिए भी सलाह देने की जरूरत है?”
क्या हैं गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देश
गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एक आदेश जारी किया था। इसमें सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ बजाने का प्रावधान किया गया। आदेश के मुताबिक, गीत के दौरान सभी लोगों को सावधान मुद्रा में खड़े रहने को कहा गया है। हालांकि यह आदेश जारी होने के कुछ दिनों बाद सार्वजनिक चर्चा में आया।
दिशानिर्देशों में यह भी कहा गया है कि अगर ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ दोनों गाए या बजाए जाते हैं, तो पहले ‘वंदे मातरम’ प्रस्तुत किया जाएगा। नए प्रोटोकॉल के तहत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह अंतरे गाने का उल्लेख है, जिनकी कुल अवधि लगभग तीन मिनट दस सेकंड बताई गई है। पहले आमतौर पर इसके शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाते थे।
क्या है इस फैसले का मतलब
सुप्रीम कोर्ट के रुख से साफ है कि फिलहाल ‘वंदे मातरम’ के गायन को लेकर जारी दिशा-निर्देश बाध्यकारी नहीं हैं। जब तक किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ इन निर्देशों के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती, तब तक अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी। यह फैसला सरकारी प्रोटोकॉल और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन की दिशा में अहम माना जा रहा है।




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