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हरित हाइड्रोजन: क्या यह सचमुच भारत की ऊर्जा आज़ादी का रास्ता है?

हरित हाइड्रोजन: क्या यह सचमुच भारत की ऊर्जा आज़ादी का रास्ता है?

हरित हाइड्रोजन: क्या यह सचमुच भारत की ऊर्जा आज़ादी का रास्ता है?

भारत में ऊर्जा को लेकर एक नई उम्मीद तेजी से आकार ले रही है—हरित हाइड्रोजन। हाल में India Energy Week 2026 के मंच से यह संकेत दिया गया कि इसकी लागत घटकर 4 डॉलर प्रति किलोग्राम से नीचे आ गई है। सुनने में यह एक बड़ी उपलब्धि लगती है, लेकिन असली सवाल अभी भी बाकी है—क्या यह बदलाव जमीन पर दिखेगा या फिर कागज़ी योजनाओं तक सीमित रह जाएगा?

भारत की ऊर्जा हकीकत अभी भी जीवाश्म ईंधन पर टिकी है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और वैश्विक तनाव—चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध हो या मध्य-पूर्व की अस्थिरता—सीधे हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। ऐसे में हरित हाइड्रोजन को एक “स्वदेशी और सुरक्षित” विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा है। National Green Hydrogen Mission इसी दिशा में सरकार का बड़ा दांव है, जिसमें 2030 तक बड़े उत्पादन और निवेश के लक्ष्य तय किए गए हैं।

लेकिन नीतियों और जमीनी सच्चाई के बीच का फर्क यहीं से शुरू होता है।

सबसे बड़ी चुनौती लागत की है। जब तक हरित हाइड्रोजन सस्ती और स्थिर कीमत पर उपलब्ध नहीं होगी, तब तक उद्योग इसे बड़े पैमाने पर अपनाने से हिचकेंगे। आज की स्थिति यह है कि इसे अपनाना पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का संकेत ज्यादा है, आर्थिक मजबूरी कम। यानी यह “जरूरी” तो है, लेकिन अभी “सुलभ” नहीं है।

दूसरी बड़ी समस्या बुनियादी ढांचे की है। हाइड्रोजन को सुरक्षित रखना, ट्रांसपोर्ट करना और इस्तेमाल करना—यह सब सामान्य ऊर्जा स्रोतों की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल है। पाइपलाइन, स्टोरेज और सुरक्षा के लिए बड़े निवेश की जरूरत है, जो अभी शुरुआती दौर में है। सवाल यह है कि क्या हम इस ढांचे को समय पर तैयार कर पाएंगे?

इसके साथ ही संसाधनों का मुद्दा भी कम अहम नहीं है। एक किलोग्राम हरित हाइड्रोजन बनाने के लिए करीब 9 लीटर पानी की जरूरत होती है। ऐसे में सूखा प्रभावित इलाकों में बड़े प्रोजेक्ट लगाना कितना व्यावहारिक होगा? वहीं, सौर और पवन ऊर्जा के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर पहले से ही कई जगहों पर विरोध देखने को मिल रहा है।

पर असली चिंता इससे भी गहरी है—यह मॉडल किसके लिए काम करेगा?

अभी हरित हाइड्रोजन की ज्यादातर योजनाएं बड़े उद्योगों और निर्यात पर केंद्रित हैं। यह ऊपर से नीचे की ओर जाने वाला मॉडल है, जिसमें बड़े निवेश और वैश्विक बाजार को प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन भारत जैसे देश में, जहां ऊर्जा की असमानता पहले से मौजूद है, यह मॉडल अधूरा लग सकता है।

गांवों में आज भी बिजली की कमी है, किसान सिंचाई के लिए जूझते हैं, छोटे उद्योग सीमित संसाधनों में काम करते हैं। अगर हरित हाइड्रोजन इन जरूरतों से नहीं जुड़ती, तो यह एक “हाई-टेक समाधान” बनकर रह जाएगी, जिसका असर सीमित वर्ग तक ही रहेगा।

यहीं पर सोच बदलने की जरूरत है। अगर हरित हाइड्रोजन को छोटे, स्थानीय और विकेंद्रीकृत मॉडल के रूप में विकसित किया जाए—जैसे ऑफ-ग्रिड सिस्टम या बायोमास आधारित छोटे प्रोजेक्ट—तो यह न केवल ऊर्जा दे सकती है, बल्कि लोगों को सशक्त भी बना सकती है।

भारत के लिए यह एक बड़ा मौका भी है। वैश्विक ग्रीन एनर्जी बाजार में जगह बनाने, रोजगार बढ़ाने और 2070 के नेट-जीरो लक्ष्य तक पहुंचने में यह अहम भूमिका निभा सकती है। लेकिन इसके लिए सिर्फ बड़े लक्ष्य तय करना काफी नहीं होगा, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका लाभ समाज के हर स्तर तक पहुंचे।

साफ है, हरित हाइड्रोजन का सवाल सिर्फ तकनीक या उत्पादन का नहीं है, बल्कि यह उस दिशा का है जिसे हम चुनते हैं। अगर यह केवल बड़े उद्योगों तक सीमित रही, तो यह एक अधूरी कहानी बन जाएगी। लेकिन अगर इसे आम लोगों की जरूरतों से जोड़ा गया, तो यह सचमुच भारत की ऊर्जा आज़ादी का रास्ता बन सकती है।

Asmita Sarkar

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