
ईरान, इज़राइल, अमेरिका और बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन
मध्य-पूर्व में चल रहा युद्ध अचानक शुरू हुआ दिखाई देता है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। बड़े युद्ध अक्सर अचानक नहीं होते, बल्कि वर्षों तक धीरे-धीरे तैयार होते हैं। कूटनीति, सार्वजनिक बयानबाज़ी, गुप्त अभियानों और आपसी अविश्वास के बीच टकराव की जमीन तैयार होती रहती है। मौजूदा युद्ध—जिसमें ईरान, इज़राइल और अमेरिका शामिल हैं—भी इसी तरह का संघर्ष है। यह इसलिए शुरू नहीं हुआ कि 28 फरवरी 2026 की सुबह किसी एक पक्ष ने अचानक युद्ध का फैसला कर लिया। इसके पीछे लंबे समय से बनती परिस्थितियाँ थीं, जबकि कूटनीतिक प्रयास इतने मजबूत नहीं बन सके कि टकराव को रोक पाते।
इज़राइल और अमेरिका ने अपने हमले को सार्वजनिक रूप से एक अनिवार्य प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया। उनका तर्क था कि ईरान की बढ़ती परमाणु क्षमता और मिसाइल कार्यक्रम क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन रहे हैं। इसलिए इस कार्रवाई का उद्देश्य ईरान को परमाणु सीमा पार करने से रोकना, उसके मिसाइल कार्यक्रम को कमजोर करना और उन सैन्य क्षमताओं को नष्ट करना था जो इज़राइल के लिए खतरा मानी जा रही थीं। इस आधिकारिक व्याख्या में युद्ध को एक “पूर्व-सुरक्षात्मक कार्रवाई” के रूप में बताया गया।
लेकिन इतिहास अक्सर आधिकारिक बयानों से कहीं अधिक जटिल होता है। हमले के समय ईरान के साथ कोई नया परमाणु समझौता अंतिम रूप नहीं ले पाया था, हालांकि बातचीत आगे बढ़ रही थी और समझौते की संभावनाएँ भी दिख रही थीं। फिर भी कई बड़े मुद्दे अनसुलझे थे। ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन के अधिकार को मान्यता दिलाना चाहता था, जबकि पश्चिमी देश इस पर कड़ी सीमाएँ और सख्त निगरानी चाहते थे। दूसरी ओर, इज़राइल केवल ईरान की क्षमताओं को धीमा करना नहीं चाहता था, बल्कि उन्हें पूरी तरह पीछे धकेलने की रणनीतिक इच्छा रखता था।
यही फर्क इस संघर्ष को समझने में अहम है। अगर बातचीत आगे बढ़ रही थी लेकिन इज़राइल को मनचाहा परिणाम नहीं मिल रहा था, तो हमला केवल प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक रणनीतिक फैसला भी माना जा सकता है—ऐसा फैसला जो उस संभावित समझौते से पहले लिया गया जिसे बाद में बदलना मुश्किल होता। इस नजरिए से देखें तो यह युद्ध शांति की विफलता नहीं, बल्कि अधूरी शांति को स्वीकार न करने का परिणाम था।
छाया युद्ध से खुला टकराव
वर्तमान संकट को समझने के लिए पीछे जाना जरूरी है। ईरान और इज़राइल वर्षों से “छाया युद्ध” में उलझे हुए थे। इसमें लक्षित हत्याएँ, तोड़फोड़, साइबर हमले, प्रॉक्सी संगठनों पर हमले और दबाव की रणनीतियाँ शामिल थीं। कुछ वर्ष पहले ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की हत्या ने इस टकराव को अधिक खतरनाक चरण में पहुँचा दिया था। साथ ही, परमाणु कूटनीति के पुराने प्रयासों के विफल होने से अविश्वास और गहरा गया।
समय के साथ ईरान की बाहरी सुरक्षा परत भी कमजोर हुई। पिछले कुछ वर्षों के क्षेत्रीय संघर्षों और प्रॉक्सी लड़ाइयों—खासकर 7 अक्टूबर के बाद की घटनाओं—ने उस नेटवर्क को नुकसान पहुँचाया जिस पर तेहरान लंबे समय से निर्भर था। लेबनान में सक्रिय हिज़बुल्लाह पर दबाव बढ़ा, जबकि सीरिया पहले जैसा भरोसेमंद गलियारा नहीं रहा। इससे ईरान की रणनीतिक सुरक्षा कमजोर हुई और सीधा टकराव पहले से अधिक संभव दिखाई देने लगा।
2026 की शुरुआत तक स्थिति ऐसी हो गई कि सवाल यह नहीं रह गया था कि छाया युद्ध वास्तविक युद्ध में बदलेगा या नहीं, बल्कि यह था कि वह कब होगा।
खाड़ी देशों की बेचैनी
शुरुआत में खाड़ी देशों ने इस युद्ध से दूरी बनाए रखने की कोशिश की। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान जैसे देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता उनकी अर्थव्यवस्था थी। इन देशों ने निवेश, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, पर्यटन और क्षेत्रीय स्थिरता पर आधारित एक आर्थिक मॉडल खड़ा किया है। इसलिए वे नहीं चाहते थे कि उनका इलाका युद्ध का मैदान बने।
इसी कारण शुरुआत में संयम और कूटनीति की अपील सुनाई दी। ओमान ने मध्यस्थता की कोशिशें तेज कीं, जबकि कतर संवाद की प्रक्रिया में सक्रिय रहा। सऊदी अरब और यूएई ईरान से सावधान तो थे, लेकिन क्षेत्रीय तबाही भी नहीं चाहते थे।
हालांकि जैसे-जैसे ईरान की जवाबी कार्रवाई खाड़ी क्षेत्र के हवाई क्षेत्र, ऊर्जा ढांचे और सुरक्षा माहौल को प्रभावित करने लगी, खाड़ी देशों का रुख भी सख्त होता गया। वे अभी भी युद्ध का विस्तार नहीं चाहते थे, लेकिन उनकी तटस्थता कमजोर पड़ने लगी।
भारत और यूरोप का संतुलन
इस संकट में भारत और यूरोपीय संघ अलग-अलग शैली में संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के लिए पश्चिम एशिया अत्यंत महत्वपूर्ण है—ऊर्जा आयात, व्यापार मार्ग, समुद्री सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों के कारण। इसलिए नई दिल्ली की रणनीति आमतौर पर संयमित और व्यावहारिक रहती है। भारत का ध्यान अपने नागरिकों की सुरक्षा, व्यापारिक संपर्क बनाए रखने और सभी पक्षों से संवाद जारी रखने पर रहता है।
यूरोप की स्थिति अधिक उलझी हुई है। यूरोपीय देश अंतरराष्ट्रीय कानून, नागरिक सुरक्षा और तनाव कम करने की बात करते हैं, लेकिन वे ऊर्जा संकट, समुद्री सुरक्षा और शरणार्थी दबाव को लेकर भी चिंतित हैं। यही कारण है कि यूरोप की प्रतिक्रिया पूरी तरह एक जैसी नहीं दिखती।
रूस और चीन की भूमिका
इस युद्ध में रूस और चीन ने अमेरिका-इज़राइल की कार्रवाई का विरोध किया है, लेकिन दोनों की रणनीति अलग-अलग है। रूस इसे वैश्विक शक्ति संतुलन के नजरिए से देखता है। मॉस्को नहीं चाहता कि ईरान की बड़ी हार से पश्चिमी ताकतों की स्थिति और मजबूत हो।
वहीं चीन का दृष्टिकोण अधिक आर्थिक और स्थिरता-केंद्रित है। बीजिंग क्षेत्रीय अस्थिरता से चिंतित है क्योंकि मध्य-पूर्व ऊर्जा और व्यापार के लिहाज से चीन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए चीन का मुख्य लक्ष्य तनाव कम करना और व्यापारिक प्रवाह को सुरक्षित रखना है।
ईरान की रणनीति
युद्ध की शुरुआत में ऐसा लगा कि शुरुआती हमलों से ईरान की कमान संरचना बुरी तरह प्रभावित हो जाएगी। कई वरिष्ठ अधिकारी मारे गए और सैन्य ढांचे को नुकसान पहुंचा। लेकिन ईरान ने अपेक्षा के विपरीत तेज़ी से प्रतिक्रिया दी।
ईरान की सैन्य रणनीति लंबे समय से इस संभावना को ध्यान में रखकर बनाई गई थी कि युद्ध की शुरुआत नेतृत्व पर हमले से होगी। इसलिए उसने विकेंद्रीकृत सैन्य संरचना, सुरक्षित कमांड सिस्टम और अलग-अलग लॉन्च क्षमता विकसित की। परिणामस्वरूप शुरुआती झटके के बावजूद ईरान सक्रिय बना रहा।
इसके बाद ईरान ने युद्ध के भूगोल को व्यापक बना दिया—मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए क्षेत्रीय ढांचे, सैन्य ठिकानों और समुद्री मार्गों को निशाना बनाकर विरोधियों की लागत बढ़ाने की कोशिश की।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य का महत्व
इस पूरे संघर्ष में सबसे संवेदनशील बिंदु होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। यह संकरा समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार का प्रमुख रास्ता है। यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का असर सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है।
ईरान ने इस मार्ग को पूरी तरह बंद करने की बजाय “नियंत्रित अस्थिरता” की रणनीति अपनाई है—जहां खतरे का माहौल बनाकर बीमा लागत बढ़ती है, जहाजों की आवाजाही धीमी होती है और बाजार में अनिश्चितता पैदा होती है।
अमेरिका-इज़राइल की रणनीतिक दुविधा
युद्ध की शुरुआत में अमेरिका और इज़राइल एकजुट दिखाई दिए, लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ा, दोनों के अंतिम लक्ष्य अलग-अलग नजर आने लगे। इज़राइल का लक्ष्य ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमता को मूल रूप से खत्म करना है।
दूसरी ओर अमेरिका के लिए लंबे युद्ध की राजनीतिक और आर्थिक लागत बढ़ती जा रही है। इसलिए वॉशिंगटन शायद सीमित सैन्य सफलता के बाद किसी नियंत्रित निष्कर्ष की तलाश में हो।
युद्ध के आर्थिक प्रभाव
यह संघर्ष केवल सैन्य नहीं बल्कि आर्थिक भी है। तेल कीमतों में उछाल, समुद्री बीमा लागत में वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता इसके शुरुआती संकेत हैं। खाड़ी देशों के लिए यह उनके आर्थिक मॉडल की विश्वसनीयता का सवाल है, जबकि भारत और एशिया के लिए ऊर्जा लागत और रणनीतिक सुरक्षा का मुद्दा।
2030 की ओर बदलती दुनिया
जब यह युद्ध समाप्त होगा, तब संभव है कि मध्य-पूर्व पहले जैसा न रहे। क्षेत्र में सैन्यीकरण बढ़ सकता है, देशों के बीच अविश्वास गहरा सकता है और नई सुरक्षा व्यवस्थाएँ बन सकती हैं। इज़राइल की सैन्य शक्ति बनी रहेगी, लेकिन राजनीतिक चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं। ईरान, भले नुकसान झेले, लेकिन असममित रणनीतियों पर और भरोसा बढ़ा सकता है तथा रूस और चीन के साथ उसके संबंध गहरे हो सकते हैं।
इस संघर्ष ने एक बड़ी सच्चाई भी उजागर की है—आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत से नहीं जीते जाते। भूगोल, बाजार, ऊर्जा और वैश्विक राजनीति भी उतने ही महत्वपूर्ण हथियार बन चुके हैं। इसलिए यह युद्ध केवल परमाणु विवाद की कहानी नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा और शक्ति संतुलन की नई कहानी भी है।
(लेखक एडइनबॉक्स के चीफ मेंटर हैं और कोलकाता स्थित टेक्नो इंडिया ग्रुप के साथ निदेशक के रूप में कार्यरत हैं, साथ ही समूह की कोलकाता आधारित यूनिवर्सिटी के प्रमुख सलाहकार भी हैं।)




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