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क्या भारत बन सकता है वैश्विक शिक्षा का नया केंद्र?

क्या भारत बन सकता है वैश्विक शिक्षा का नया केंद्र?

क्या भारत बन सकता है वैश्विक शिक्षा का नया केंद्र?

दुनिया में उच्च शिक्षा का नक्शा तेजी से बदल रहा है। लंबे समय तक भारत को उस देश के रूप में देखा जाता रहा है जहां से बड़ी संख्या में छात्र विदेशों में पढ़ने जाते हैं। लेकिन अब धीरे-धीरे यह धारणा बदलती दिखाई दे रही है। हाल की रिपोर्ट “QS Global Student Flows: India 2026” यह संकेत देती है कि भारत केवल छात्रों को विदेश भेजने वाला देश ही नहीं रहेगा, बल्कि एशिया में उभरता हुआ एक महत्वपूर्ण अध्ययन केंद्र भी बन सकता है।

दरअसल, पिछले दो दशकों में भारतीय छात्रों का विदेशों की ओर रुख लगातार बढ़ा है। बेहतर अवसर, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और विदेशी डिग्री की प्रतिष्ठा ने लाखों छात्रों को बाहर जाने के लिए प्रेरित किया। आज भी बड़ी संख्या में छात्र कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को अपनी पढ़ाई के लिए चुनते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में इन देशों की कड़ी वीज़ा नीतियां, बढ़ती फीस और वैश्विक राजनीतिक अनिश्चितताएं इस प्रवृत्ति को नया मोड़ दे रही हैं।

यही वह समय है जब भारत के सामने एक बड़ा अवसर खड़ा है। अगर देश अपनी उच्च शिक्षा व्यवस्था को सही दिशा में आगे बढ़ा सके तो वह न केवल अपने छात्रों को बेहतर विकल्प दे सकता है, बल्कि दुनिया भर के छात्रों को भी आकर्षित कर सकता है।

इस बदलाव के पीछे सबसे महत्वपूर्ण पहल National Education Policy 2020 को माना जा रहा है। इस नीति ने भारतीय विश्वविद्यालयों को अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अपने दरवाजे ज्यादा खोलने की अनुमति दी है। विश्वविद्यालय अब अपनी कुल सीटों का 25 प्रतिशत तक हिस्सा विदेशी छात्रों के लिए रख सकते हैं, बिना घरेलू छात्रों की सीटों को प्रभावित किए। यह कदम भारत को वैश्विक शिक्षा नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है

शिक्षा विशेषज्ञ अश्विन फर्नांडीस का मानना है कि भारत लंबे समय से वैश्विक छात्र गतिशीलता का अहम हिस्सा रहा है। उनके अनुसार आने वाले समय में भारत केवल छात्रों का स्रोत ही नहीं रहेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शिक्षा की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह विचार केवल उम्मीद नहीं है, बल्कि कई मौजूदा संकेत इसे मजबूत भी करते हैं।

आज भारत में करीब 58 हजार विदेशी छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। यह संख्या भले ही वैश्विक मानकों के हिसाब से बहुत बड़ी न लगे, लेकिन इसमें लगातार बढ़ोतरी की संभावना दिखाई दे रही है। दक्षिण एशिया के देशों से आने वाले छात्र इसमें सबसे बड़ा हिस्सा रखते हैं। खासकर नेपाल और बांग्लादेश से बड़ी संख्या में छात्र भारतीय विश्वविद्यालयों का रुख करते हैं।

इसके साथ ही एक नया रुझान अफ्रीका और मध्य-पूर्व के देशों में भी दिखाई दे रहा है। उदाहरण के तौर पर ज़िम्बाब्वे जैसे देशों के छात्र भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में पढ़ाई की लागत कम है, जबकि शिक्षा की गुणवत्ता और शैक्षणिक वातावरण अपेक्षाकृत मजबूत माना जाता है।

हालांकि इस अवसर के साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। भारत में कई विश्वविद्यालयों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा अभी भी पश्चिमी देशों के प्रमुख संस्थानों से पीछे मानी जाती है। यह सच है कि भारतीय छात्र वैश्विक कंपनियों में अपनी प्रतिभा के लिए पहचाने जाते हैं, लेकिन विश्वविद्यालयों की ब्रांड पहचान अभी उतनी मजबूत नहीं बन पाई है।

एक दूसरी चिंता रोजगार क्षमता को लेकर भी है। हाल के कई अध्ययन बताते हैं कि भारतीय स्नातकों में से आधे से भी कम को आधुनिक उद्योग की जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह रोजगार योग्य माना जाता है। अगर भारत को वास्तव में वैश्विक शिक्षा केंद्र बनना है, तो उसे केवल डिग्री देने से आगे बढ़कर छात्रों को कौशल, शोध अवसर और उद्योग से जुड़ी संभावनाएं भी देनी होंगी।

इसके बावजूद कुछ सकारात्मक बदलाव भी सामने आ रहे हैं। भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस खोलने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं। खासकर गिफ्ट सिटी (GIFT City) जैसे स्थानों पर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के आने की योजना इस दिशा में नई संभावनाएं पैदा करती है। अगर यह पहल सफल होती है तो भारतीय छात्रों को विदेशी डिग्री का अनुभव अपने ही देश में अपेक्षाकृत कम खर्च पर मिल सकता है।

साथ ही यह भी सच है कि दुनिया भर में शिक्षा की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। आज के छात्र केवल डिग्री नहीं चाहते, बल्कि इंटर्नशिप, शोध अवसर और स्थिर करियर की राह भी तलाशते हैं। भारत के पास तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, बड़ा युवा बाजार और तकनीकी क्षेत्र में बढ़ती संभावनाएं हैं। यह सभी कारक विदेशी छात्रों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं।

अंततः सवाल यह नहीं है कि भारत शिक्षा का वैश्विक केंद्र बन सकता है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या भारत अपनी नीतियों, संस्थानों और शिक्षा की गुणवत्ता को उस स्तर तक पहुंचा पाएगा जहां दुनिया के छात्र यहां पढ़ने को एक बड़े अवसर के रूप में देखें। अगर ऐसा होता है, तो आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक शिक्षा के नक्शे पर एक नई पहचान बना सकता है।

रईस अहमद 'लाली'

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