
मुंबई के स्कूलों में संत समर्थ रामदास स्वामी के ‘मनाचे श्लोक’ को अनिवार्य करने के प्रस्ताव ने नई बहस छेड़ दी है। इस मुद्दे ने अब धार्मिक परंपरा और संविधानिक मूल्यों के बीच संतुलन को लेकर सियासी और सामाजिक चर्चा को तेज कर दिया है।
मुंबई की पूर्व मेयर और शिवसेना (यूबीटी) की नेता किशोरी पेडनेकर ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के आयुक्त को नोटिस भेजकर यह मांग उठाई है। प्रस्ताव के मुताबिक, जिन स्कूलों में मराठी भाषा अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जाती है, वहां रोजाना ‘मनाचे श्लोक’ का पाठ कराया जाए। इसमें सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूल शामिल हैं।
प्रस्ताव के समर्थन में यह तर्क दिया गया है कि 17वीं सदी के संत समर्थ रामदास द्वारा रचित ये श्लोक सरल भाषा में हैं और बच्चों के मानसिक विकास में मदद कर सकते हैं। पेडनेकर का कहना है कि इनका नियमित पाठ बच्चों में अनुशासन, सकारात्मक सोच और अच्छे संस्कार विकसित करेगा। साथ ही, आज के समय में बढ़ते तनाव के बीच यह बच्चों के मानसिक संतुलन को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया है कि स्कूलों के टाइम-टेबल में इसके लिए एक निश्चित समय भी तय किया जाए।
हालांकि, इस प्रस्ताव के सामने आते ही विरोध भी शुरू हो गया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। बीएमसी में पार्टी के नेता विजय उबाले ने कहा कि सरकारी स्कूलों का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए और किसी एक धर्म या परंपरा से जुड़े साहित्य को सभी छात्रों पर लागू करना उचित नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर छात्रों को कुछ सिखाना ही है, तो उन्हें संविधान की शिक्षा दी जानी चाहिए, ताकि वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों को बेहतर तरीके से समझ सकें और जिम्मेदार नागरिक बन सकें।
फिलहाल, यह प्रस्ताव शुरुआती चरण में है। नगर निगम आयुक्त से इसकी व्यवहार्यता पर रिपोर्ट मांगी गई है। माना जा रहा है कि आने वाली BMC की जनरल बॉडी मीटिंग में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा होगी, जहां अलग-अलग पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि शिक्षा व्यवस्था में सांस्कृतिक और धार्मिक तत्वों की भूमिका क्या होनी चाहिए, और इसे संविधान के मूल सिद्धांतों के साथ कैसे संतुलित किया जाए।




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