
मध्यप्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को लेकर चल रहे विवाद के बीच राज्य सरकार ने बड़ा और अहम कदम उठाया है। लाखों शिक्षकों से जुड़े इस मामले में सरकार ने Supreme Court of India के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है। मुख्यमंत्री Mohan Yadav के नेतृत्व में उठाए गए इस कदम से शिक्षकों के बीच राहत और उम्मीद दोनों बढ़ी हैं।
दरअसल, शीर्ष अदालत ने 1 सितंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी पास करना अनिवार्य कर दिया था। इस फैसले के अनुसार, जिन शिक्षकों की सेवा अवधि 1 सितंबर 2025 के बाद पांच वर्ष से अधिक बची है और जिन्होंने अब तक टीईटी उत्तीर्ण नहीं की है, उन्हें यह परीक्षा देनी होगी। इसके अलावा, जिन शिक्षकों की सेवा में पांच साल से कम समय शेष है, उनके लिए भी पदोन्नति पाने के लिए टीईटी पास करना जरूरी कर दिया गया था।
इस निर्णय के बाद प्रदेशभर में शिक्षकों के बीच चिंता का माहौल बन गया। लंबे समय से सेवा दे रहे कई शिक्षक इस शर्त को लेकर असमंजस में थे। ऐसे में राज्य सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए 17 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की। सरकार का तर्क है कि वर्षों से कार्यरत शिक्षकों पर अचानक इस तरह की अनिवार्यता लागू करना व्यवहारिक नहीं है और इससे बड़ी संख्या में अनुभवी शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि सरकार शिक्षकों के साथ खड़ी है और उनके हितों की रक्षा करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है और उनके साथ किसी भी तरह का अन्याय स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सरकार की इस पहल को शिक्षक संगठनों ने सकारात्मक संकेत के तौर पर देखा है। माना जा रहा है कि पुनर्विचार याचिका के जरिए सरकार अदालत के सामने जमीनी हकीकत और शिक्षकों की व्यावहारिक समस्याओं को मजबूती से रखेगी। आने वाले समय में कोर्ट का फैसला इस पूरे मामले की दिशा तय करेगा, लेकिन फिलहाल राज्य सरकार के इस कदम ने शिक्षकों को बड़ी राहत दी है।




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