
भारत में रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित Anusandhan National Research Foundation (ANRF) ने कम समय में कई अहम पहल की हैं और फंडिंग के लिए प्रतिस्पर्धा भी तेज़ हो गई है। हालांकि, अपने शुरुआती वर्षों में सरकारी बजट के कम उपयोग को लेकर इस संस्था को हाल ही में संसदीय समिति की जांच का सामना करना पड़ा है।
ANRF की स्थापना अगस्त 2023 में National Education Policy 2020 के तहत की गई थी। हर साल इसे लगभग 20 अरब रुपये का बजट निर्धारित किया गया, जिसकी पहली किस्त 2024 के मध्य में मिली।
संसद की स्थायी समिति—Parliamentary Standing Committee on Science and Technology, Environment, Forests and Climate Change—जिसकी अध्यक्षता Bhubaneswar Kalita कर रहे हैं, ने पाया कि शुरुआती चरण में फंड का उपयोग अपेक्षा से धीमा रहा।
समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में ANRF ने संशोधित 19.48 अरब रुपये के बजट में से करीब 61% यानी 11.91 अरब रुपये ही खर्च किए। हालांकि, इसे हाल के समय में सुधार का संकेत भी माना गया है।
इस आलोचना के बीच शिक्षा और रिसर्च क्षेत्र के विशेषज्ञों ने ANRF के कामकाज का बचाव भी किया है। V Ramgopal Rao, जो BITS पिलानी समूह के वाइस चांसलर रह चुके हैं, का कहना है कि ANRF भारत के रिसर्च फंडिंग सिस्टम में एक जरूरी और सकारात्मक बदलाव है। उनके अनुसार, “यह संस्था अब केवल नीतिगत स्तर पर नहीं, बल्कि अलग-अलग योजनाओं और साझेदारियों के जरिए वास्तविक फंडिंग के अवसर बना रही है।”
उन्होंने यह भी कहा कि 61% फंड उपयोग को एक नई संस्था के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसने हाल ही में बड़े स्तर पर काम शुरू किया है, इसलिए शुरुआती देरी स्वाभाविक है।
वहीं, Department of Science and Technology (DST) ने स्पष्ट किया कि शुरुआती वर्षों में संगठनात्मक ढांचा तैयार करने पर ध्यान दिया गया। 2023-24 में संरचना तय की गई, जबकि 2024-25 में प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था को मजबूत किया गया। ANRF ने औपचारिक रूप से फरवरी 2024 में काम शुरू किया और उसी साल सितंबर में पहली गवर्निंग बोर्ड बैठक हुई।
मौजूदा वित्त वर्ष में ANRF ने तेजी से काम करते हुए 12 नए प्रोग्राम्स को मंजूरी दी है, जो हाई-इंपैक्ट टेक्नोलॉजी सेक्टर्स से जुड़े हैं। DST के अनुसार, करीब 2,500 संस्थान अब तक ANRF से जुड़ चुके हैं।
इसके बावजूद संसदीय समिति ने DST को सलाह दी है कि फंड का उपयोग अधिक प्रभावी तरीके से किया जाए और वितरण में देरी से बचा जाए, ताकि देश की रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा सके।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ANRF ने तेजी से कई सुधार लागू किए हैं, लेकिन फंड के वितरण को लेकर सवाल अभी भी बने हुए हैं—खासकर यह कि क्या फंड कुछ ही संस्थानों तक सीमित हो रहा है।
इस पर अलग राय रखते हुए Vidya Yeravdekar का कहना है कि ANRF की तेज फंडिंग इसकी शुरुआती मजबूती को दिखाती है, लेकिन इससे यह चिंता भी उठती है कि कहीं फंड का बड़ा हिस्सा शीर्ष संस्थानों तक ही सीमित न रह जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि आगे फंडिंग को चरणबद्ध और रणनीतिक तरीके से बांटना जरूरी होगा।
PAIR प्रोग्राम: जमीनी स्तर तक रिसर्च को पहुंचाने की पहल
संसदीय समिति की रिपोर्ट में ANRF की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर “PAIR” यानी Partnership for Accelerated Innovation and Research प्रोग्राम को खास तौर पर रेखांकित किया गया है। नवंबर 2024 में शुरू इस योजना का उद्देश्य कमजोर और उभरते संस्थानों को मजबूत बनाना है।
इस योजना में “हब एंड स्पोक” मॉडल अपनाया गया है, जिसमें IIT और IISc जैसे प्रमुख संस्थानों को हब बनाया गया है, जबकि राज्य और उभरते संस्थान स्पोक के रूप में जुड़े हैं। इससे छोटे संस्थानों को मार्गदर्शन और संसाधन मिलते हैं। खास बात यह है कि इस योजना के 70% फंड सीधे स्पोक संस्थानों को दिए जाते हैं।
अब तक 7 नेटवर्क मंजूर किए जा चुके हैं, जिनमें 7 हब और 42 स्पोक शामिल हैं। हर नेटवर्क को अगले पांच वर्षों में 100 करोड़ रुपये तक की फंडिंग मिल सकती है। समिति ने सुझाव दिया है कि इस नेटवर्क को और बढ़ाया जाए ताकि हर आकांक्षी जिले तक रिसर्च के अवसर पहुंच सकें।
इसके अलावा, जुलाई 2025 में शुरू किए गए “Prime Minister’s Professorship Programme” के तहत 20 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में 21 पदों को मंजूरी दी गई है। इसका उद्देश्य संसाधन की कमी वाले संस्थानों में अनुभवी वैज्ञानिकों की नियुक्ति कर रिसर्च को मजबूत करना है।
फंडिंग पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा और चुनौतियां
ANRF की योजनाओं को लेकर रिसर्च समुदाय में काफी उत्साह देखा गया है। बड़ी संख्या में प्रस्ताव जमा हो रहे हैं और कई योजनाओं में चयन दर 10% से भी कम है, जो इस बात का संकेत है कि फंड की तुलना में मांग कहीं ज्यादा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रांट देने से पहले सख्त जांच जरूरी है, ताकि फंड सही और योग्य शोधकर्ताओं तक पहुंचे। कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि परियोजनाओं के बजट को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है, जिससे संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पाता।
फंड के बेहतर उपयोग के लिए ANRF ने कई कदम उठाए हैं, जैसे ऑनलाइन पोर्टल के जरिए आवेदन और फंड वितरण को आसान बनाना। “FIRE” जैसे प्रोग्राम के जरिए इंडस्ट्री और अकादमिक संस्थानों के बीच साझेदारी भी बढ़ाई जा रही है।
साथ ही, ANRF निजी दान, कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) और भारतीय प्रवासी समुदाय से फंड जुटाने की दिशा में भी काम कर रहा है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि असली चुनौती प्रदर्शन की नहीं, बल्कि पर्याप्त निवेश की है। अगर अच्छे प्रस्तावों की संख्या ज्यादा है और फंड सीमित , तो समस्या फंड की मात्रा में है, न कि रिसर्च आइडियाज की गुणवत्ता में।
संसदीय समिति ने भी इस बात पर जोर दिया है कि फंड का समय पर और पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
ANRF को भारत के रिसर्च भविष्य की अहम कड़ी माना जा रहा है। आने वाले समय में इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कितनी प्रभावी तरीके से फंड का वितरण करता है और देश के हर स्तर तक रिसर्च के अवसर पहुंचाता है।




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