
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने एआई-जनित या सिंथेटिक कंटेंट को लेकर नए सख्त नियमों का मसौदा जारी किया है। सरकार ने इसे सार्वजनिक परामर्श के लिए खोला है और 7 मई तक आम नागरिकों, विशेषज्ञों और उद्योग से सुझाव मांगे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से बढ़ रहे एआई कंटेंट और डीपफेक के दुरुपयोग को देखते हुए सरकार इसे लेकर स्पष्ट और कड़े प्रावधान चाहती है।
एआई लेबल अब पूरे समय अनिवार्य
नए ड्राफ्ट में सबसे बड़ा बदलाव लेबलिंग से जुड़ा है। पहले एआई कंटेंट पर प्रमुख रूप से दिखने वाला लेबल काफी माना जाता था, लेकिन अब प्रस्ताव है कि यह लेबल किसी भी वीडियो, फोटो या विजुअल की पूरी अवधि के दौरान लगातार और साफ दिखाई दे। उद्देश्य यह है कि दर्शकों को हर समय पता रहे कि कंटेंट वास्तविक नहीं, बल्कि एआई से तैयार किया गया है।
नियम केवल कंपनियों के लिए नहीं, आम यूजर्स पर भी लागू
ड्राफ्ट में यह भी साफ किया गया है कि जिम्मेदारी सिर्फ टेक कंपनियों या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की नहीं होगी। अगर कोई आम यूजर भी एआई से बनाया गया कंटेंट तैयार या शेयर करता है, तो उसे भी अनिवार्य रूप से लेबल लगाना होगा। यानी गलत जानकारी या भ्रामक वीडियो के प्रसार की जिम्मेदारी हर कंटेंट क्रिएटर पर तय होगी।
आईटी नियम 2026: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए नए मानक
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक के दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026 अधिसूचित कर दिए हैं। ये नियम 20 फरवरी 2026 से लागू हैं। इनके तहत कई महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़े गए हैं:
अनिवार्य एआई लेबलिंग
फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स को एआई-जनित फोटो, वीडियो और ऑडियो पर स्पष्ट और लगातार दिखने वाला लेबल लगाना होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोग भ्रमित न हों और उन्हें पता रहे कि सामग्री वास्तविक नहीं है।
डिजिटल फिंगरप्रिंटिंग और मेटाडेटा
हर एआई जनित फाइल में तकनीकी पहचानकर्ता (मेटाडेटा) शामिल करना जरूरी होगा। यह ‘डिजिटल डीएनए’ यह बताता रहेगा कि कंटेंट कब, कैसे और किस एआई टूल से बनाया गया। यह प्रावधान जांच एजेंसियों को डीपफेक अपराधों की जांच में मदद करेगा। प्लेटफॉर्म्स को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यूजर्स यह मेटाडेटा या वॉटरमार्क हटाने में सक्षम न हों।
लेबल हटाने पर दंड
एडिटिंग करके एआई वॉटरमार्क हटाना अब गैर-कानूनी होगा। सरकार ने निर्देश दिया है कि प्लेटफॉर्म ऐसी तकनीक अपनाएं जिसमें लेबल हटाने या छेड़छाड़ की कोशिश पर कंटेंट ब्लॉक या डिलीट हो जाए।
यूजर डिक्लेरेशन अनिवार्य
50 लाख से अधिक उपयोगकर्ताओं वाले प्लेटफॉर्म्स को हर अपलोडर से यह घोषणा लेना अनिवार्य होगा कि उनकी सामग्री एआई से बनाई गई है या नहीं। प्लेटफॉर्म्स को ऐसे टूल्स भी विकसित करने होंगे जो इस दावे की जांच कर सकें।
तीन घंटे में कार्रवाई
पहले शिकायत मिलने पर कंपनियों को 36 घंटे का समय मिलता था। नए नियमों में बदलाव के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अब किसी भी अवैध या आपत्तिजनक कंटेंट पर 3 घंटे के भीतर कार्रवाई करनी होगी। इससे उनकी जवाबदेही काफी बढ़ जाती है।
कुछ कंटेंट को मिलेगी छूट
साधारण फोटो एडिटिंग जैसे ब्राइटनेस बढ़ाना, क्रॉप करना या फिल्मों में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले स्पेशल इफेक्ट्स को सिंथेटिक कंटेंट नहीं माना जाएगा। इसलिए इस तरह के कंटेंट पर एआई लेबल की आवश्यकता नहीं होगी।
नियम तोड़ने पर कानूनी कार्रवाई
अगर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो वे ‘सेफ हार्बर’ यानी कानूनी सुरक्षा खो देंगे। इसके बाद उन पर सीधे कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी।
यूजर्स की जिम्मेदारी बढ़ी
अब किसी भी यूजर को कंटेंट अपलोड करते समय स्पष्ट करना होगा कि सामग्री एआई जनरेटेड है या नहीं। अगर किसी प्लेटफॉर्म पर बिना लेबल वाला एआई कंटेंट पाया जाता है, तो जिम्मेदारी कंपनी और कंटेंट क्रिएटर दोनों पर तय होगी।
सरकार का उद्देश्य: सुरक्षित और भरोसेमंद इंटरनेट
MeitY का कहना है कि इन नियमों का मकसद “ओपन, सेफ, ट्रस्टेड और अकाउंटेबल इंटरनेट” सुनिश्चित करना है। सरकार मानती है कि नए मानक डीपफेक, गलत जानकारी, पहचान की चोरी और चुनावी हस्तक्षेप जैसे जोखिमों को काफी हद तक नियंत्रित करेंगे।
डीपफेक क्या है?
डीपफेक दो शब्दों ‘डीप’ और ‘फेक’ से मिलकर बना है। ‘डीप’ का मतलब है डीप लर्निंग—एआई की उन्नत तकनीक, और ‘फेक’ का मतलब नकली। यानी ऐसी तकनीक जिसमें एआई की मदद से किसी असली वीडियो, तस्वीर या ऑडियो के चेहरे या आवाज को बदलकर ऐसा कंटेंट बनाया जाता है, जो पूरी तरह असली जैसा लगता है। आम दर्शक अक्सर असली और नकली में फर्क नहीं कर पाते।
डीपफेक खतरनाक क्यों है?
इस तकनीक का दुरुपयोग दुनिया भर में गंभीर समस्याएं पैदा कर रहा है।
— राजनीतिक व्यक्तियों के नकली भाषण तैयार करके गलत संदेश फैलाना।
— आवाज की नकल कर लोगों से आर्थिक धोखाधड़ी करना।
— आम महिलाओं या सेलिब्रिटीज की फोटो को अश्लील वीडियो में बदलकर ब्लैकमेल करना।
तकनीक के गलत इस्तेमाल के बढ़ते मामलों के बीच सरकार के नए नियम एआई के इस्तेमाल को अधिक जिम्मेदार और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।




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