
ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और समाचार उद्योग के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने Meta, Google और TikTok जैसी बड़ी टेक कंपनियों पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा है। इसका मकसद पत्रकारों और समाचार संस्थानों को आर्थिक सहयोग देना और डिजिटल दौर में पत्रकारिता को टिकाऊ बनाना है।
क्या है प्रस्तावित कानून का उद्देश्य
सरकार ने इस संबंध में एक ड्राफ्ट कानून जारी किया है, जिसे 2 जुलाई तक संसद में पेश करने की तैयारी है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य यह है कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स समाचार संस्थानों के साथ व्यावसायिक समझौते करें और उनके कंटेंट के उपयोग के बदले भुगतान सुनिश्चित करें।
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री Anthony Albanese ने साफ कहा है कि पत्रकारों के काम की एक आर्थिक कीमत तय होना जरूरी है। उनका मानना है कि बड़ी कंपनियां यदि खबरों से लाभ कमा रही हैं, तो उन्हें इसके लिए भुगतान भी करना चाहिए। उनके अनुसार, मजबूत पत्रकारिता किसी भी लोकतंत्र के लिए जरूरी आधार है।
पहले भी हो चुका है ऐसा प्रयास
यह ऑस्ट्रेलिया का इस तरह का पहला कदम नहीं है। इससे पहले 2021 में लागू किए गए न्यूज मीडिया बार्गेनिंग कोड के जरिए भी डिजिटल कंपनियों को समाचार संस्थानों के साथ समझौते करने के लिए बाध्य किया गया था। उस समय कई प्लेटफॉर्म्स ने मध्यस्थता से बचने के लिए खुद ही मीडिया संगठनों के साथ डील की थी।
हालांकि बाद में कई कंपनियों ने इन समझौतों को आगे नहीं बढ़ाया और कुछ मामलों में अपने प्लेटफॉर्म्स से समाचार सामग्री हटाने जैसे कदम भी उठाए।
‘न्यूज बार्गेनिंग इंसेंटिव’ क्या है
सरकार अब ‘न्यूज बार्गेनिंग इंसेंटिव’ नाम से नया प्रावधान ला रही है। इसके तहत जो कंपनियां समाचार संस्थानों के साथ समझौता नहीं करेंगी, उन पर ऑस्ट्रेलिया में उनकी कमाई का 2.25% टैक्स लगाया जाएगा।
वहीं, जो कंपनियां पत्रकारिता के लिए भुगतान करने को तैयार होंगी, उन्हें टैक्स में राहत दी जाएगी। सरकार का अनुमान है कि इस योजना से हर साल करीब 200 से 250 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जुटाए जा सकते हैं। इस राशि को समाचार संस्थानों में कार्यरत पत्रकारों की संख्या के आधार पर वितरित करने की योजना है। इस पर जानकारी ऑस्ट्रेलिया की संचार मंत्री Anika Wells ने दी।
टेक कंपनियों का कड़ा विरोध
इस प्रस्ताव का टेक कंपनियों ने खुलकर विरोध किया है। Meta का कहना है कि समाचार संस्थान अपनी इच्छा से उनके प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं और इससे उन्हें भी ट्रैफिक और कमाई होती है। कंपनी ने इसे “जबरन संपत्ति हस्तांतरण” जैसा कदम बताया है।
वहीं Google ने भी इस नीति पर सवाल उठाए हैं। कंपनी का कहना है कि वह पहले से ही कई मीडिया संस्थानों के साथ समझौते कर चुकी है और नया प्रस्ताव विज्ञापन बाजार में आए बदलावों को नजरअंदाज करता है। साथ ही, गूगल ने यह भी कहा कि यह नियम कुछ चुनिंदा कंपनियों पर ही लागू होता है, जबकि अन्य प्लेटफॉर्म्स को इसमें शामिल नहीं किया गया।
TikTok की ओर से इस पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
अंतरराष्ट्रीय असर और आगे की राह
ध्यान देने वाली बात यह है कि इस प्रस्ताव के दायरे में आने वाली सभी प्रमुख कंपनियां अमेरिकी हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फैसले को लेकर चर्चा तेज हो सकती है। हालांकि प्रधानमंत्री Anthony Albanese ने स्पष्ट किया है कि ऑस्ट्रेलिया अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।
कुल मिलाकर, यह प्रस्ताव डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और पारंपरिक पत्रकारिता के बीच आर्थिक संतुलन बनाने की एक नई कोशिश है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद में इस कानून को किस रूप में मंजूरी मिलती है और इसका वैश्विक टेक उद्योग पर क्या असर पड़ता है।




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