
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार कानून 2009 (RTE) के तहत प्राइवेट स्कूलों में दाखिले को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी छात्र की पात्रता पर संदेह के आधार पर स्कूल उसे प्रवेश देने से मना नहीं कर सकते। कोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार द्वारा आवंटित छात्रों को प्राइवेट स्कूलों को तुरंत दाखिला देना होगा, चाहे पात्रता से जुड़ा कोई विवाद लंबित ही क्यों न हो।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कई मामलों में देखा गया कि प्राइवेट स्कूल RTE के तहत भेजे गए छात्रों का एडमिशन विभिन्न कारणों से रोक देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यदि स्कूल को किसी छात्र की पात्रता पर संदेह है, तो वह संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांग सकता है, लेकिन इस दौरान एडमिशन रोकना नियमों के खिलाफ है।
क्या था पूरा मामला
यह मामला उत्तर प्रदेश से जुड़ा है, जहां Uttar Pradesh Basic Education Department ने RTE के तहत एक छात्र को Lucknow Public School Eldeco में सीट आवंटित की थी। हालांकि, स्कूल ने छात्र की पात्रता को लेकर अनिश्चितता जताते हुए उसे प्रवेश देने से इनकार कर दिया।
मामला पहले Allahabad High Court पहुंचा, जहां कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य द्वारा चयन प्रक्रिया पूरी कर सूची भेजने के बाद स्कूल के पास प्रवेश से इनकार करने या देरी करने का अधिकार नहीं है। इसके बाद स्कूल ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन शीर्ष अदालत ने अपील खारिज कर दी और हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
क्या कहता है कानून
Right to Education Act 2009 के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है। इस कानून के तहत प्राइवेट स्कूलों को अपनी एंट्री लेवल कक्षाओं में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रखनी होती हैं।
फैसले के मायने
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर के लाखों छात्रों और अभिभावकों के लिए राहत की खबर है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि RTE के तहत चयनित बच्चों को समय पर स्कूलों में प्रवेश मिल सके और उन्हें अनावश्यक बाधाओं का सामना न करना पड़े।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश RTE कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक मजबूत कदम है। इससे न केवल शिक्षा तक समान पहुंच को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि प्राइवेट स्कूलों की जवाबदेही भी तय होगी।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह संदेश देता है कि शिक्षा का अधिकार केवल कागजों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसे जमीनी स्तर पर पूरी सख्ती के साथ लागू करना जरूरी है।




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