
नफरत फैलाने वाले भाषणों (हेट स्पीच) से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सजा तय करना पूरी तरह विधायिका का अधिकार है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में कोई नया दिशा-निर्देश जारी करने से इनकार करते हुए कई याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें अलग-अलग जगहों पर कथित भड़काऊ भाषणों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी।
यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि संविधान में शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत स्पष्ट है और इसके तहत न्यायपालिका नए अपराध नहीं बना सकती।
‘कानून बनाना अदालत का काम नहीं’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दो टूक कहा कि अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं, लेकिन वे कानून नहीं बना सकतीं और न ही सरकार को नया कानून बनाने के लिए बाध्य कर सकती हैं। अदालत ने कहा कि यह जिम्मेदारी संसद की है और न्यायपालिका उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी।
मौजूदा कानून पर्याप्त, लागू करने में कमी
कोर्ट ने माना कि हेट स्पीच से निपटने के लिए देश में पहले से पर्याप्त कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। समस्या नए कानून की कमी नहीं, बल्कि मौजूदा कानूनों के सही तरीके से लागू न होने की है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना जरूरी है। अगर पुलिस कार्रवाई नहीं करती, तो पीड़ित व्यक्ति अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
BNSS का हवाला, मजिस्ट्रेट को व्यापक अधिकार
फैसले में Bharatiya Nyaya Suraksha Sanhita (BNSS) का भी जिक्र किया गया। कोर्ट ने कहा कि यह कानून एक व्यापक कानूनी ढांचा देता है, जिसमें मजिस्ट्रेट को पर्याप्त निगरानी अधिकार प्राप्त हैं। धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे सकते हैं, जो संज्ञान लेने से पहले की प्रक्रिया होती है।
केंद्र सरकार के अधिकार पर भी टिप्पणी
अदालत ने कहा कि कानूनों में संशोधन करना केंद्र सरकार और संसद का अधिकार है। समय और जरूरत के हिसाब से बदलाव किए जा सकते हैं, लेकिन अदालत इस प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती।
समाज के लिए खतरा बताया हेट स्पीच
हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि हेट स्पीच और अफवाहें समाज की एकता और संवैधानिक ढांचे के लिए नुकसानदायक हैं। इसके बावजूद अदालत ने नए निर्देश जारी करने से परहेज किया और कहा कि मौजूदा कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।
पहले के दिशा-निर्देशों के पालन पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं ने देश के विभिन्न राज्यों में हुई घटनाओं का हवाला देते हुए अदालत का रुख किया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है।
पीठ ने यह भी संकेत दिया कि यदि जरूरत पड़ी तो Law Commission of India की 2017 की 267वीं रिपोर्ट में दिए गए सुझावों पर विचार किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि हेट स्पीच जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की है, जबकि अदालत का काम केवल मौजूदा कानूनों की व्याख्या तक सीमित है।




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