
राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण अब सिर्फ एक पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे लोगों की सेहत पर असर डालने वाला गंभीर संकट बन चुका है। खासकर अस्थमा के मरीजों की बढ़ती संख्या ने स्थिति को और चिंताजनक बना दिया है। डॉक्टरों और विशेषज्ञों के अनुसार, इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों और बुजुर्गों पर देखने को मिल रहा है। अनुमान है कि दिल्ली के बच्चों में अस्थमा की दर 20 से 30 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।
प्रदूषण का स्तर बढ़ते ही इसका असर तुरंत अस्पतालों में दिखने लगता है। 24 से 48 घंटे के भीतर ही ओपीडी में सांस से जुड़ी दिक्कतों वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है। एम्स, दिल्ली से जुड़े अध्ययनों में भी यह बात सामने आई है कि बढ़ता प्रदूषण और अस्थमा का खतरा मिलकर एक दोहरी चुनौती खड़ी कर रहे हैं—एक ओर मरीजों की संख्या बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर इलाज से जुड़ी जटिलताएं भी सामने आ रही हैं।
स्वामी दयानंद अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी और अस्थमा विशेषज्ञ डॉ. ग्लैडबिन त्यागी के मुताबिक, अस्पतालों में आने वाले कुल मरीजों में 10 प्रतिशत से अधिक लोग श्वसन संबंधी समस्याओं, खासकर अस्थमा से जुड़े होते हैं। सर्दियों के मौसम में यह आंकड़ा और बढ़ जाता है। वहीं, गुरु तेग बहादुर अस्पताल के एडिशनल मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. प्रवीण कुमार बताते हैं कि प्रदूषण का असर बच्चों और बुजुर्गों पर सबसे अधिक पड़ रहा है, क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर होती है।
हाल ही में सामने आई एक नई रिसर्च ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। एम्स, दिल्ली के अध्ययन के अनुसार, अस्थमा के इलाज में लंबे समय तक इस्तेमाल होने वाली इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉयड (ICS) दवाएं कुछ गंभीर मामलों में सर्जरी के बाद जटिलताओं का खतरा बढ़ा सकती हैं। शोध में यह भी संकेत मिला है कि इन दवाओं के लंबे इस्तेमाल से हड्डियों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, जिससे सर्जरी के परिणामों पर असर पड़ता है।
हालांकि, डॉक्टरों का साफ कहना है कि अस्थमा के इलाज में इनहेलर दवाएं बेहद जरूरी हैं और मरीजों को बिना डॉक्टर की सलाह इन्हें बंद नहीं करना चाहिए। लेकिन लंबे समय तक इनके उपयोग के दौरान नियमित जांच और डॉक्टर की निगरानी जरूरी है, ताकि किसी भी संभावित जोखिम को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।
शोध के आंकड़े बताते हैं कि जिन मरीजों ने लंबे समय तक ICS दवाओं का उपयोग किया, उनमें दो साल के भीतर दोबारा सर्जरी का खतरा तीन गुना से अधिक पाया गया। पांच साल के भीतर यह जोखिम तीन से चार गुना तक बढ़ सकता है। जबकि ऐसे अस्थमा मरीज जो इन दवाओं का उपयोग नहीं करते, उनमें यह खतरा सामान्य लोगों के बराबर पाया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि नीति और प्राथमिकताओं की भी परीक्षा है। जब तक वायु प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया जाएगा और स्वच्छ हवा को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक दिल्ली के लोगों को इस संकट का सामना करना पड़ेगा।
इस बीच, बचाव के उपाय भी बेहद अहम हैं। प्रदूषण बढ़ने पर मास्क का इस्तेमाल करना, बाहरी गतिविधियों को सीमित रखना, डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित दवा लेना और खासतौर पर बच्चों व बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। छोटी-छोटी सावधानियां इस बड़े खतरे से बचाव में मदद कर सकती हैं।




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