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तेजी से बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य: युवाओं में तनाव, अवसाद और एंग्जायटी का बढ़ता खतरा

तेजी से बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य: युवाओं में तनाव, अवसाद और एंग्जायटी का बढ़ता खतरा

तेजी से बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य: युवाओं में तनाव, अवसाद और एंग्जायटी का बढ़ता खतरा

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारी जीवनशैली और खान-पान ने सेहत पर गंभीर असर डाला है। जहां एक ओर शारीरिक बीमारियां कम उम्र में ही लोगों को प्रभावित कर रही हैं, वहीं मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की रफ्तार भी डराने वाली है। मेडिकल रिपोर्ट्स बताती हैं कि आधुनिक जीवनशैली, सोशल मीडिया का दबाव और करियर की दौड़ ने बच्चों और युवाओं के मन पर अभूतपूर्व तनाव बढ़ा दिया है। इसका नतीजा है कि एंग्जायटी, डिप्रेशन और स्ट्रेस जैसी परेशानियां बेहद आम होती जा रही हैं।

हाल ही में ब्रिटेन की एक रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि 2030 तक वहां के दो-तिहाई किशोर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर सकते हैं। यह आंकड़ा दुनिया के लिए भी एक बड़ा संकेत है कि मानसिक स्वास्थ्य का बोझ आने वाले दशक में और भारी होने वाला है।

किशोरों और युवाओं में बढ़ता मानसिक तनाव

ताजा मेडिकल रिपोर्ट बताती है कि यूके में 15 से 19 साल के करीब 51 फीसदी किशोर फिलहाल मेंटल हेल्थ या व्यवहार संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। अगर स्थिति ऐसे ही बनी रही तो चार साल में यह आंकड़ा 64 फीसदी तक पहुंच सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती मानसिक समस्याएं युवाओं की उत्पादकता ही नहीं, बल्कि रोजगार और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकती हैं।

यह स्थिति सिर्फ ब्रिटेन तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया के अधिकांश देशों में मानसिक स्वास्थ्य का बोझ इसी तरह बढ़ रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। यहां 10 फीसदी से अधिक युवा किसी न किसी रूप में मानसिक स्वास्थ्य विकारों से प्रभावित हैं, लेकिन इनमे से केवल 10-15 प्रतिशत लोग ही इलाज तक पहुंच पाते हैं। बड़ी संख्या में लोगों को अपनी मानसिक स्थिति के बारे में जानकारी भी नहीं होती।

उत्पादकता और अर्थव्यवस्था पर बढ़ता असर

यूके के स्वास्थ्य अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि पिछले दशक में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में बड़ी वृद्धि दर्ज की गई है। इंग्लैंड में मेंटल हेल्थ के केस 2012 की तुलना में अब ढाई गुना तक बढ़ चुके हैं। एंग्जायटी, डिप्रेशन, पैनिक अटैक, फोबिया जैसी समस्याएं तेजी से फैल रही हैं।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर तत्काल ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो मानसिक स्वास्थ्य संकट आने वाले वर्षों में देशों की विकास दर, रोजगार और सामाजिक संरचना सभी को प्रभावित कर सकता है।

विशेषज्ञों की राय

इंग्लैंड के बाल मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर विल शील्ड का कहना है कि किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम अभूतपूर्व रूप से बढ़ रहा है। उनका कहना है कि ब्रिटेन के युवाओं की मानसिक स्थिति जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया जैसे देशों के समकक्ष युवाओं से भी अधिक खराब पाई गई है।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल, पढ़ाई का दबाव और आर्थिक अस्थिरता मानसिक तनाव को तेज़ी से बढ़ा रहे हैं। लाइक्स, फॉलोअर्स और लोकप्रियता की होड़ ने युवाओं की आत्म-छवि पर गहरा असर डाला है।

क्यों बढ़ रही हैं मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं?

रिपोर्ट्स के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य के बिगड़ने के पीछे कई प्रमुख कारण हैं:

स्क्रीन टाइम का बढ़ना: रात में मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल नींद चक्र को खराब करता है, जिससे शरीर और दिमाग की रिकवरी प्रभावित होती है।

सोशल मीडिया तुलना: दूसरों से खुद की तुलना करने से आत्म-सम्मान कम होता है और अवसाद का खतरा बढ़ता है।

नींद की कमी: 7-8 घंटे की नींद न मिलना मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन और एंग्जायटी को बढ़ा देता है।

कार्पोरेट दबाव और असुरक्षा: नौकरी में बढ़ते लक्ष्य, अनिश्चितता और बर्नआउट मानसिक तनाव का बड़ा कारण हैं।

आर्थिक अस्थिरता: महंगाई और बेरोजगारी लोगों में तनाव और चिंता बढ़ाती है।

अकेलापन और सामाजिक दूरी: परिवार व दोस्तों से दूरी मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती है। शोध बताते हैं कि क्रॉनिक अकेलापन शारीरिक बीमारियों तक का कारण बन सकता है।

समाधान की दिशा में क्या जरूरी है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाना अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। समय पर पहचान, इलाज की सुविधा और सहायक माहौल ही युवाओं को इस संकट से निकालने में मदद कर सकता है।

कुल मिलाकर, मानसिक स्वास्थ्य सिर्फ व्यक्तिगत मुद्दा नहीं रह गया है—यह सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय विकास से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। आने वाले वर्षों में इस पर निवेश ही देशों के भविष्य को सुरक्षित करेगा।

Asmita Sarkar

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