
कोविड-19 महामारी के बाद ऑनलाइन शिक्षा ने छात्रों के पढ़ने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। आज बड़ी संख्या में छात्र मानते हैं कि लैपटॉप और इंटरनेट की मदद से लगभग हर डिग्री घर बैठे पूरी की जा सकती है। हालांकि कई थ्योरी और स्किल आधारित कोर्स ऑनलाइन माध्यम से अच्छे तरीके से किए जा सकते हैं, लेकिन कुछ प्रोफेशनल कोर्स ऐसे हैं जिनमें प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, लैब एक्सपोजर और व्यक्तिगत मार्गदर्शन बेहद जरूरी होता है।
भारत में University Grants Commission और विभिन्न प्रोफेशनल काउंसिल्स ने भी कई तकनीकी और क्लिनिकल कोर्सेज के लिए पूरी तरह ऑनलाइन पढ़ाई पर सीमाएं तय की हुई हैं।
ऐसे में 12वीं के बाद छात्रों को कुछ कोर्स पूरी तरह ऑनलाइन चुनने से पहले सावधानी से विचार करना चाहिए।
मेडिकल और एलाइड हेल्थ साइंस कोर्स
MBBS, BDS, नर्सिंग, फिजियोथेरेपी और अन्य हेल्थ साइंस कोर्स पूरी तरह ऑनलाइन तरीके से प्रभावी रूप से नहीं किए जा सकते।
मेडिकल शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा क्लिनिकल एक्सपोजर, मरीजों से बातचीत, एनाटॉमी लैब, अस्पताल प्रशिक्षण और प्रैक्टिकल प्रक्रियाएं होती हैं। छात्रों को वास्तविक परिस्थितियों में मरीजों की जांच करना, लक्षण समझना और इमरजेंसी में निर्णय लेना सीखना पड़ता है।
National Medical Commission पूरी तरह ऑनलाइन मेडिकल डिग्री को मान्यता नहीं देता क्योंकि मेडिकल शिक्षा का आधार ही क्लिनिकल प्रैक्टिस है। अस्पताल प्रशिक्षण और लैब अनुभव के बिना छात्र आवश्यक प्रैक्टिकल स्किल्स विकसित नहीं कर पाते।
कोर इंजीनियरिंग कोर्स
हालांकि कोडिंग और कुछ सॉफ्टवेयर विषय ऑनलाइन सीखे जा सकते हैं, लेकिन मैकेनिकल, सिविल, इलेक्ट्रिकल और ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग जैसे कोर्स में प्रैक्टिकल अनुभव जरूरी होता है।
इंजीनियरिंग छात्रों को मशीनों, टूल्स, सर्किट्स, इंजनों और निर्माण सामग्री के साथ काम करके सिस्टम की वास्तविक कार्यप्रणाली समझनी होती है। अधिकांश इंजीनियरिंग कोर्स में लैब सेशन, इंडस्ट्रियल विजिट और प्रोजेक्ट वर्क अनिवार्य होते हैं।
सिर्फ वीडियो के जरिए स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी, मशीनिंग या इलेक्ट्रिकल इंस्टॉलेशन जैसे विषय सीखने से व्यावहारिक समझ अधूरी रह सकती है।
आर्किटेक्चर और डिजाइन
B.Arch जैसे कोर्स केवल ड्रॉइंग या डिजिटल मॉडलिंग तक सीमित नहीं होते।
छात्रों को स्टूडियो वर्क, मॉडल मेकिंग, मटेरियल स्टडी, साइट विजिट और फील्ड ऑब्जर्वेशन में हिस्सा लेना पड़ता है। आर्किटेक्चर की पढ़ाई में निर्माण तकनीक और वास्तविक डिजाइन वातावरण को सीधे समझना बेहद जरूरी होता है।
Council of Architecture ने आर्किटेक्चर कोर्स में फिजिकल उपस्थिति को अनिवार्य माना है क्योंकि स्पेस और डिजाइन की व्यावहारिक समझ पूरी तरह ऑनलाइन विकसित नहीं की जा सकती।
परफॉर्मिंग आर्ट्स
डांस, थिएटर, एक्टिंग, क्लासिकल म्यूजिक और स्टेज परफॉर्मेंस जैसे क्षेत्र व्यक्तिगत प्रशिक्षण पर काफी निर्भर करते हैं।
भारत में खासतौर पर गुरु-शिष्य परंपरा आज भी परफॉर्मिंग आर्ट्स का अहम हिस्सा मानी जाती है। इसमें गुरु छात्रों की बॉडी लैंग्वेज, भाव-भंगिमा, लय, मूवमेंट और स्टेज प्रेजेंस को करीब से समझाते हैं।
ऑनलाइन क्लासेस थ्योरी या अतिरिक्त अभ्यास में मदद कर सकती हैं, लेकिन लाइव रिहर्सल और सीधा मार्गदर्शन पूरी तरह ऑनलाइन संभव नहीं माना जाता।
लैब आधारित साइंस कोर्स
केमिस्ट्री, बायोटेक्नोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, फिजिक्स और अन्य साइंस विषयों में B.Sc. करने वाले छात्रों को लैब में काफी समय बिताना पड़ता है।
टाइट्रेशन, सेल कल्चर, केमिकल एक्सपेरिमेंट, इंस्ट्रूमेंट हैंडलिंग और सैंपल एनालिसिस जैसी तकनीकों को केवल रिकॉर्डेड लेक्चर देखकर नहीं सीखा जा सकता।
लैब सेफ्टी, प्रयोगों में सटीकता और तकनीकी समस्याओं को समझने की क्षमता लगातार प्रैक्टिकल अभ्यास से विकसित होती है।
ऑनलाइन शिक्षा सपोर्ट हो सकती है, पूरी जगह नहीं ले सकती
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑनलाइन शिक्षा सर्टिफिकेशन, थ्योरी आधारित पढ़ाई, कोडिंग, बिजनेस स्टडीज, लैंग्वेज ट्रेनिंग और प्रोफेशनल अपस्किलिंग के लिए बेहद उपयोगी है। लेकिन जिन कोर्सेज में मरीजों की देखभाल, मशीनरी, लैब, परफॉर्मेंस या डिजाइन से जुड़ा व्यावहारिक अनुभव जरूरी होता है, वहां केवल ऑनलाइन पढ़ाई पर्याप्त नहीं मानी जाती।
इसलिए 12वीं के बाद उच्च शिक्षा का चयन करते समय छात्रों को केवल फीस और सुविधा ही नहीं, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि उस कोर्स में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कितनी जरूरी है।
कई प्रोफेशन में वास्तविक अनुभव कोई अतिरिक्त विकल्प नहीं बल्कि सीखने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।




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