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क्या AI बना रहा है हमें मानसिक रूप से कमजोर? नई स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली बात

क्या AI बना रहा है हमें मानसिक रूप से कमजोर? नई स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली बात

क्या AI बना रहा है हमें मानसिक रूप से कमजोर? नई स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली बात

आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। चैटजीपीटी, जेमिनी, क्लाउड या ग्रोक (ChatGPT, Google Gemini, Claude और Grok) जैसे AI टूल्स का इस्तेमाल अब केवल टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स तक सीमित नहीं है। ईमेल लिखने, नोट्स तैयार करने, पढ़ाई में मदद लेने, शेड्यूल बनाने और लंबे कंटेंट को जल्दी समझने तक लोग तेजी से AI पर निर्भर होते जा रहे हैं।

लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इस बढ़ती निर्भरता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अमेरिका और ब्रिटेन की कई प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज के शोधकर्ताओं द्वारा की गई एक स्टडी में दावा किया गया है कि लगातार AI पर निर्भर रहने से इंसान की खुद सोचने, समझने और समस्या हल करने की क्षमता कमजोर हो सकती है।

टॉप यूनिवर्सिटीज के रिसर्चर्स ने क्या पाया?

यह रिसर्च Massachusetts Institute of Technology, Carnegie Mellon University, University of Oxford और University of California, Los Angeles से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा की गई।

स्टडी में कुल 1,222 लोगों को शामिल किया गया और उन्हें गणित तथा रीडिंग कॉम्प्रिहेंशन से जुड़े अलग-अलग टास्क दिए गए। प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा गया था। पहला समूह बिना किसी मदद के खुद सवाल हल कर रहा था, जबकि दूसरे समूह को AI असिस्टेंट की सुविधा दी गई थी।

शुरुआती नतीजों में AI इस्तेमाल करने वाला समूह तेज और ज्यादा सटीक साबित हुआ। उन्होंने कम समय में ज्यादा सही जवाब दिए। लेकिन रिसर्च का असली निष्कर्ष तब सामने आया जब AI सपोर्ट अचानक हटा लिया गया।

AI हटते ही गिर गई परफॉर्मेंस

शोधकर्ताओं के अनुसार, जिन लोगों ने लगातार AI की मदद ली थी, उनकी परफॉर्मेंस AI हटने के बाद तेजी से गिर गई।

मैथ्स टेस्ट में बिना AI वाले समूह ने करीब 73 प्रतिशत सवाल सही हल किए, जबकि AI पर निर्भर समूह AI हटने के बाद केवल लगभग 57 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया।

रीडिंग और समझ से जुड़े टास्क में भी यही पैटर्न देखने को मिला। AI की आदत वाले कई प्रतिभागी मुश्किल सवालों को हल करने की कोशिश करने के बजाय उन्हें छोड़ने लगे।

रिसर्चर्स का कहना है कि चिंता केवल कम स्कोर की नहीं है, बल्कि लोगों में “डटे रहने की क्षमता” कम होती दिखाई दे रही है। लगातार तुरंत जवाब मिलने की आदत लोगों को मानसिक मेहनत और गहरी सोच से दूर कर सकती है।

क्या AI का इस्तेमाल नुकसानदायक है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या AI नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल करने का तरीका है।

अगर कोई व्यक्ति AI का इस्तेमाल केवल गाइडेंस, जानकारी समझने या सीखने के लिए करता है, तो इससे सोचने की क्षमता पर नकारात्मक असर नहीं पड़ता। लेकिन जब लोग पूरा काम AI के भरोसे छोड़ देते हैं और खुद सोचने की कोशिश कम कर देते हैं, तब दिक्कत शुरू होती है।

यानी AI को “थिंकिंग पार्टनर” की तरह इस्तेमाल करना फायदेमंद हो सकता है, लेकिन अगर यह इंसान की सोचने की जगह लेने लगे, तो लंबे समय में इसका असर मानसिक क्षमता पर पड़ सकता है।

‘बॉयलिंग फ्रॉग’ इफेक्ट से की गई तुलना

रिसर्चर्स ने इस स्थिति की तुलना ‘बॉयलिंग फ्रॉग’ इफेक्ट (Boiling Frog Effect) से की है। इस उदाहरण में बताया जाता है कि अगर किसी मेंढक को धीरे-धीरे गर्म होते पानी में रखा जाए, तो उसे खतरे का अहसास देर से होता है।

इसी तरह, शुरुआत में AI से छोटे-छोटे काम करवाना सामान्य लगता है। लेकिन धीरे-धीरे जब हर काम के लिए AI पर निर्भरता बढ़ने लगती है, तो इंसान की खुद सोचने और कठिन समस्याओं को हल करने की आदत कमजोर हो सकती है।

शिक्षा और कामकाज पर भी पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में AI का सबसे बड़ा असर शिक्षा और कार्यक्षेत्र पर देखने को मिल सकता है। अगर छात्र केवल असाइनमेंट, नोट्स और सवालों के जवाब AI से तैयार करवाने लगेंगे, तो उनकी विश्लेषण क्षमता और क्रिटिकल थिंकिंग कमजोर हो सकती है।

वहीं कार्यस्थल पर भी जरूरत से ज्यादा AI निर्भरता कर्मचारियों की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।

संतुलित इस्तेमाल ही सबसे जरूरी

तकनीक विशेषज्ञ मानते हैं कि AI भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीक है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इसका संतुलित और समझदारी से इस्तेमाल करना जरूरी है।

AI को सीखने, समझने और काम आसान बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह उस पर निर्भर हो जाना लंबे समय में नुकसानदायक साबित हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इंसानी दिमाग की सबसे बड़ी ताकत उसकी जिज्ञासा, विश्लेषण क्षमता और समस्याओं को हल करने की सोच है। अगर यह क्षमता कमजोर होने लगे, तो तकनीक की सुविधा भी एक नई चुनौती बन सकती है।

Asmita Sarkar

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