
असम की सोनोवाल कछारी जनजाति की पारंपरिक औषधीय पद्धतियों पर हुई एक नई रिसर्च ने यह दिखाया है कि आदिवासी समुदायों का हर्बल ज्ञान भविष्य की सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं और नई दवाओं की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस अध्ययन में उन पारंपरिक जड़ी-बूटी आधारित उपचारों को दर्ज किया गया है, जिनका इस्तेमाल यह समुदाय लंबे समय से विभिन्न बीमारियों के इलाज में करता आ रहा है।
यह शोध Nagaland University के शोधकर्ताओं ने Indian Council of Medical Research से जुड़े वैज्ञानिकों के साथ मिलकर किया। अध्ययन में 39 औषधीय पौधों की प्रजातियों पर विशेष ध्यान दिया गया, जिनका उपयोग बुखार, सांस से जुड़ी बीमारियों, किडनी स्टोन और त्वचा रोगों जैसी समस्याओं के इलाज में किया जाता है।
पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक जानकारी का दस्तावेजीकरण
रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने समुदाय के 180 बुजुर्ग लोगों से बातचीत की, जिन्हें पारंपरिक हर्बल चिकित्सा का गहरा ज्ञान है। इन जानकारियों को व्यवस्थित तरीके से दर्ज किया गया ताकि पीढ़ियों से मौखिक रूप से चली आ रही चिकित्सा पद्धतियों को संरक्षित किया जा सके।
अध्ययन के मुताबिक, ग्रामीण और संसाधन सीमित इलाकों में हर्बल चिकित्सा आज भी कम खर्च वाली और आसानी से उपलब्ध स्वास्थ्य सेवा का महत्वपूर्ण विकल्प बनी हुई है। जहां आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं, वहां लोग अब भी पारंपरिक उपचार पद्धतियों पर भरोसा करते हैं।
आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा के साथ मिलकर काम करने की संभावना
रिसर्च में यह भी सामने आया कि समुदाय के भीतर पारंपरिक हर्बल उपचार और एलोपैथिक चिकित्सा दोनों साथ-साथ उपयोग किए जाते हैं। इससे भविष्य में इंटीग्रेटेड हेल्थकेयर यानी पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा को मिलाकर इलाज की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
इस अध्ययन के निष्कर्षों को Journal of Ayurveda and Integrative Medicine में प्रकाशित किया गया है। यह जर्नल पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और आधुनिक बायोमेडिकल साइंस के बीच संबंधों पर आधारित रिसर्च प्रकाशित करता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, कई पौधों का इस्तेमाल लगातार समान उपचार परिणामों के साथ देखा गया, जिससे वैज्ञानिक परीक्षण, फार्माकोलॉजिकल रिसर्च और पौधों पर आधारित नई दवाओं के विकास की संभावनाएं मजबूत होती हैं।
पारंपरिक ज्ञान के खत्म होने की चिंता
रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिकों ने यह चिंता भी जताई कि नई पीढ़ी के लोग धीरे-धीरे पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों से दूर होते जा रहे हैं। इससे आने वाले समय में यह अमूल्य जनजातीय ज्ञान खत्म हो सकता है।
इसी को ध्यान में रखते हुए अध्ययन में एक संरक्षण मॉडल का सुझाव दिया गया है, जिसका उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखना और औषधीय पौधों के संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि अगर इस तरह की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाए, तो भविष्य में लैब रिसर्च, क्लिनिकल ट्रायल और वैज्ञानिक आधार पर स्वास्थ्य सेवाओं में इनके इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही यह भी जरूरी है कि इससे जुड़े लाभों में आदिवासी समुदायों की समान भागीदारी सुनिश्चित हो।
भारत में प्राकृतिक चिकित्सा आधारित रिसर्च को मिल रहा बढ़ावा
यह अध्ययन ऐसे समय में सामने आया है जब भारत में प्राकृतिक उत्पादों और जैव विविधता आधारित स्वास्थ्य शोध को तेजी से बढ़ावा मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि देश की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां भविष्य की हेल्थकेयर रिसर्च और दवा निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।




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