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UGC का बड़ा निर्देश: अब लॉ कॉलेजों में पढ़ाई जाएगी भारतीय न्याय संहिता, फोरेंसिक और डिजिटल जांच पर रहेगा खास फोकस

UGC का बड़ा निर्देश: अब लॉ कॉलेजों में पढ़ाई जाएगी भारतीय न्याय संहिता, फोरेंसिक और डिजिटल जांच पर रहेगा खास फोकस

UGC का बड़ा निर्देश: अब लॉ कॉलेजों में पढ़ाई जाएगी भारतीय न्याय संहिता, फोरेंसिक और डिजिटल जांच पर रहेगा खास फोकस

देशभर के लॉ कॉलेजों और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) में अब कानूनी शिक्षा का स्वरूप बदलने जा रहा है। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने सभी लॉ संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे अपने पाठ्यक्रम में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और नए आपराधिक कानूनों को प्रमुख रूप से शामिल करें। इसका उद्देश्य छात्रों को देश की नई आपराधिक न्याय व्यवस्था के अनुरूप तैयार करना है।

UGC के इस निर्देश के बाद अब कानून की पढ़ाई केवल पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) तक सीमित नहीं रहेगी। छात्रों को भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की गहराई से पढ़ाई करनी होगी। ये तीनों नए कानून 1 जुलाई 2024 से पूरे देश में लागू किए गए थे, जिन्होंने ब्रिटिश काल के IPC, CrPC और Evidence Act की जगह ली है।

DGsP/IGsP कॉन्फ्रेंस के बाद लिया गया फैसला

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह फैसला नवंबर 2025 में आयोजित DGsP/IGsP कॉन्फ्रेंस में हुई चर्चाओं के बाद सामने आया। इस बैठक में देशभर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भाग लिया था। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि लॉ यूनिवर्सिटीज और कानूनी संस्थानों को नई न्याय व्यवस्था और उसके व्यावहारिक बदलावों को पढ़ाई का हिस्सा बनाना चाहिए।

UGC ने अपने नोटिस में कहा है कि लॉ संस्थान यह अध्ययन करें कि नए आपराधिक कानूनों ने जांच और न्याय प्रक्रिया को किस तरह बदला है। विशेष रूप से फोरेंसिक साइंस, डिजिटल सबूत और वैज्ञानिक जांच की भूमिका को समझना अब जरूरी माना जा रहा है।

फोरेंसिक साइंस की बढ़ी भूमिका

नए कानूनों में जांच प्रक्रिया को पहले से अधिक तकनीकी और वैज्ञानिक बनाया गया है। जहां पहले गवाहों और मौखिक बयानों पर अधिक निर्भरता रहती थी, वहीं अब डिजिटल रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक सबूत, वीडियो, फोरेंसिक रिपोर्ट और साइंटिफिक एनालिसिस को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है।

UGC चाहता है कि कानून के छात्र इन बदलावों को केवल सैद्धांतिक रूप से न पढ़ें, बल्कि यह भी समझें कि वास्तविक मामलों में इनका इस्तेमाल कैसे हो रहा है। इसी कारण संस्थानों को केस स्टडी तैयार करने के लिए भी कहा गया है।

असली मामलों से सीखेंगे छात्र

निर्देश में कहा गया है कि लॉ कॉलेज ऐसे केस स्टडी विकसित करें जिनसे यह समझा जा सके कि फोरेंसिक तकनीक और डिजिटल जांच ने अदालतों और जांच एजेंसियों के कामकाज को किस तरह प्रभावित किया है। इन केस स्टडी को बाद में पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा ताकि छात्रों को व्यावहारिक समझ मिल सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छात्रों को भविष्य में वकालत, न्यायिक सेवा और जांच एजेंसियों में काम करने के दौरान काफी मदद मिलेगी। नई पीढ़ी के वकीलों, जजों और जांच अधिकारियों के लिए आधुनिक जांच तकनीकों की जानकारी अब बेहद जरूरी मानी जा रही है।

पटना में बन रही NFSU से बढ़ेगी फोरेंसिक शिक्षा

इसी दिशा में बिहार की राजधानी पटना में नेशनल फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी (NFSU) की स्थापना भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस संस्थान का उद्देश्य फोरेंसिक शिक्षा, रिसर्च और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाना है।

देश में फोरेंसिक जांच से जुड़े मामलों का बैकलॉग लगातार बढ़ रहा है। कई राज्यों में प्रशिक्षित फोरेंसिक विशेषज्ञों और आधुनिक लैब सुविधाओं की कमी भी सामने आती रही है। ऐसे में NFSU जैसी संस्थाएं इस क्षेत्र में विशेषज्ञ तैयार करने और न्याय व्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

कानूनी शिक्षा में बड़ा बदलाव

UGC का यह कदम संकेत देता है कि आने वाले समय में देश की कानूनी शिक्षा अधिक व्यावहारिक, तकनीक आधारित और आधुनिक जांच प्रणाली से जुड़ी होगी। इसका सीधा असर लॉ छात्रों की ट्रेनिंग, कोर्ट प्रक्रियाओं की समझ और भविष्य की न्याय व्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।

Asmita Sarkar

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