
ब्रिटेन को अपने यहाँ अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या को सीमित करने के सख्त प्रयासों से बचना चाहिए, वरना कई विश्वविद्यालयों को इससे खतरा उत्पन्न हो सकता है। यह निष्कर्ष है सरकार द्वारा गठित उस समिति की रिपोर्ट का, जिसका गठन आगामी शैक्षणिक सत्र के लिए विदेशी छात्रों के पंजीकरण में आयी गिरावट के बाद किया गया था।
विदित है कि ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज़ इंटरनेशनल लाइजन एसोसिएशन ने 75 विश्वविद्यालयों का सर्वेक्षण किया था और पाया कि उनमें से 90% ने अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के आवेदनों में गिरावट देखी है। पिछले वर्ष की तुलना में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए अंतर्राष्ट्रीय छात्रों द्वारा कुल आवेदनों में 27% की गिरावट आई है। इस साल ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रमों के लिए भारतीय छात्रों के आवेदनों में भी गिरावट आई है। भारत से ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में आवेदनों में 4% की गिरावट देखी गई।
उल्लेखनीय है कि बड़े पैमाने पर उच्च शिक्षा के लिए विदेशी छात्रों का ब्रिटेन में आना वहां की सियासत का अहम मुद्दा रहा है। ख़ास कर, 2016 में ब्रेक्सिट जनमत संग्रह के बाद तो जोरशोर से यह मांग उठायी जाती रही है कि विदेशी छात्रों को इतनी बड़ी संख्या में ब्रिटेन में आने से रोकने के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए। राजनीतिक दलों द्वारा कानून में इसके लिए सख्त व्यवस्था करने की वकालत की जाती रही है।
उक्त हलचल के दृष्टिगत ही ब्रिटेन में प्रधानमंत्री ऋषि सनक के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार भी न सिर्फ इसकी वकालत करती रही बल्कि इस दिशा में आवश्यक कदम भी बढ़ाये। इसी का नतीजा है कि इन सरगोशियों के दरम्यान ब्रिटेन में उच्च शिक्षा के लिए विदेश से आने वाले छात्रों की तादाद में इस बार काफी कमी देखी गयी। बता दें कि सुनक सरकार द्वारा स्नातक रुट वीजा कार्यक्रम की समीक्षा की बात कही गई है, जो विदेशी स्नातकों को उनकी डिग्री के बाद कम से कम दो साल तक रहने और कार्य अनुभव प्राप्त करने की अनुमति देता है। इसमें केयर वर्कर्स और कम वेतन वाले कर्मचारियों के साथ स्नातकोत्तर छात्रों को परिवार के सदस्यों को लाने से रोकना भी शामिल है।
गौरतलब है कि सरकार ने विदेशी छात्रों के आवेदन में कमी की बात सामने आने के बाद कार्य वीज़ा की समीक्षा करने के लिए माइग्रेशन एडवाइजरी कमिटी यानी प्रवासन सलाहकार समिति (एमएसी) को नियुक्त किया था। प्रवासन सलाहकार समिति ने सकरकार को चेताया है कि अगर सरकार स्नातक वीजा कार्यक्रम को लेकर सख्त कदम उठाती है तो इससे रोजगार में कमी, पाठ्यक्रम को बंद करने की नौबत समेत यह जोखिम भी पैदा हो सकता है कि “कुछ संस्थान विफल हो जाएं”। ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से लेकर इंपीरियल कॉलेज लंदन तक दुनिया के कुछ सबसे प्रसिद्ध और मांग वाले विश्वविद्यालयों में शामिल हैं।
बहरहाल, स्नातक वीज़ा मार्ग के दुरुपयोग की चिंताओं के बाद सरकार ने इसकी समीक्षा की दिशा में कदम बढ़ाये थे। कुछ ब्रिटिश राजनेताओं की शिकायत थी कि कुछ छात्र वीजा के लिए आवेदन करते हैं और फिर शरण या यहाँ अधिक समय तक रहने का इरादा करते हैं। सुनक सरकार के मंत्री एस्थर मैकवी ने भी कहा था कि कुछ ब्रिटिश विश्वविद्यालय शिक्षा के बजाय अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आप्रवासन बेच रहे थे। अपनी चिंताओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया था कि इस मार्ग का उपयोग करने वाले 40% से अधिक अंतरराष्ट्रीय छात्र या तो काम नहीं कर रहे थे या स्नातक होने के बाद एक वर्ष में 15,000 पाउंड ($ 18,834) से कम कमा रहे थे।
हालांकि प्रवासन सलाहकार समिति ने स्नातक रूट वीजा कार्यक्रम के व्यापक दुरुपयोग का कोई सबूत नहीं पाया, जिसमें मुख्यतः चार देशों – भारत, नाइजीरिया, चीन और पाकिस्तान – के छात्रों को 70% हिस्सा प्राप्त होता है। समिति ने कहा है कि उक्त कार्यक्रम का दुरुपयोग नहीं किया जा रहा, ऐसे में “अब समय आ गया है कि इसके भविष्य को संदेह से परे रखा जाए और अटकलों के इस दौर को समाप्त किया जाए।”




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