
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में गंभीर सवाल उठे हैं। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने NEET पेपर लीक मामले को “बेहद संवेदनशील” बताते हुए कहा कि जब तक वास्तविक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक इस तरह की घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं। कोर्ट ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी जताई और कहा कि अगर परीक्षा व्यवस्था की निगरानी प्रधानमंत्री को खुद करनी पड़े, तो यह चिंताजनक स्थिति है।
यह सुनवाई फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (FAIMA) और यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (UDF) की ओर से दायर याचिका पर हुई। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व इसरो प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली समिति से भी कई अहम सवाल पूछे। वहीं केंद्र सरकार और NTA की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा।
“यह केवल छात्रों का नहीं, परिवारों का भी मामला”
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि NEET परीक्षा से जुड़ी तैयारियों की निगरानी प्रधानमंत्री स्तर पर की जा रही है। इस पर जस्टिस नरसिम्हा ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर ऐसी स्थिति बन रही है, तो यह दुखद है।
कोर्ट ने कहा कि लाखों छात्र वर्षों की मेहनत और उम्मीदों के साथ इस परीक्षा में शामिल होते हैं। यह केवल एक छात्र का मामला नहीं है, बल्कि पूरे परिवार की भावनाएं, समय और आर्थिक संघर्ष इससे जुड़े होते हैं। अदालत ने साफ कहा कि देश अपने छात्रों को निराश नहीं कर सकता।
राधाकृष्णन समिति से सुप्रीम कोर्ट के सवाल
NEET पेपर लीक 2024 विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व इसरो प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी। इस समिति का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में सुधार और सुरक्षा को मजबूत करने के उपाय सुझाना था।
शुक्रवार की सुनवाई में अदालत ने पूछा कि यदि समिति की सिफारिशें लागू कर दी गई थीं, तो फिर पेपर लीक जैसी घटनाएं दोबारा कैसे सामने आईं। कोर्ट ने सीधे सवाल किया कि सिफारिशों के क्रियान्वयन की निगरानी कितनी प्रभावी रही और आखिर विफलता कहां हुई।
इस पर डॉ. राधाकृष्णन ने अदालत को बताया कि समिति ने कुल 60 सुझाव दिए थे, जिनमें से अधिकांश लागू किए जा चुके हैं, जबकि कुछ अभी प्रक्रियाधीन हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 की NEET UG परीक्षा कुल मिलाकर संतोषजनक तरीके से आयोजित हुई थी। कुछ परीक्षा केंद्रों पर बिजली कटौती जैसी समस्याएं जरूर सामने आईं, लेकिन बाकी व्यवस्था सफल रही।
उन्होंने यह भी कहा कि समिति ने NTA को संस्थागत रूप से मजबूत करने की सिफारिश की थी और पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के लिए कई सुरक्षा उपाय सुझाए गए थे।
“असल समस्या जवाबदेही की है”
सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि असली समस्या केवल तकनीकी खामियां नहीं हैं, बल्कि जिम्मेदारी तय न होना है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जब तक यह तय नहीं होगा कि आखिर जिम्मेदारी किसके कंधों पर है, तब तक सुधार अधूरा रहेगा।
कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देशभर में NEET परीक्षा की पारदर्शिता और सुरक्षा को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में पेपर लीक, परीक्षा केंद्रों की अनियमितताओं और एजेंसी की कार्यप्रणाली को लेकर कई विवाद सामने आ चुके हैं।
NTA ने दाखिल किया हलफनामा
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि NTA की ओर से अदालत में हलफनामा दाखिल कर दिया गया है। इसमें परीक्षा प्रक्रिया, सुरक्षा उपायों और समिति की सिफारिशों के अनुपालन से जुड़ी जानकारी दी गई है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से साफ है कि अदालत केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं है और वह यह जानना चाहती है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस जवाबदेही कैसे तय की जाएगी।
छात्रों और अभिभावकों की बढ़ी चिंता
NEET देश की सबसे प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में से एक है, जिसमें हर साल लाखों छात्र मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने के लिए शामिल होते हैं। ऐसे में पेपर लीक जैसे मामलों का सीधा असर छात्रों के भविष्य और मानसिक स्थिति पर पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि NTA और केंद्र सरकार परीक्षा प्रणाली में भरोसा बहाल करने के लिए आगे क्या कदम उठाते हैं।




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