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NCERT की किताब से न्यायपालिका अध्याय हटने पर बढ़ी बहस, मिशेल डैनिनो बोले- लेखकों पर पड़ेगा ‘चिलिंग इफेक्ट’

NCERT की किताब से न्यायपालिका अध्याय हटने पर बढ़ी बहस, मिशेल डैनिनो बोले- लेखकों पर पड़ेगा ‘चिलिंग इफेक्ट’

NCERT की किताब से न्यायपालिका अध्याय हटने पर बढ़ी बहस, मिशेल डैनिनो बोले- लेखकों पर पड़ेगा ‘चिलिंग इफेक्ट’

एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से न्यायपालिका से जुड़ा विवादित अध्याय हटाए जाने के बाद देश में अकादमिक स्वतंत्रता और पाठ्यपुस्तक लेखन को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। इस मुद्दे पर पद्मश्री सम्मानित शिक्षाविद् मिशेल डैनिनो ने चिंता जताते हुए कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का वर्तमान और भविष्य के पाठ्यपुस्तक लेखकों पर “चिलिंग इफेक्ट” पड़ सकता है। उनके अनुसार, इससे लेखक नए विचारों और प्रयोगों को लेकर सतर्क और भयभीत हो सकते हैं।

फ्रांसीसी मूल के भारतीय विद्वान मिशेल डैनिनो एनसीईआरटी के सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम तैयार करने वाले समूह के अध्यक्ष रह चुके हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की पुस्तक में न्यायपालिका पर दिए गए एक अध्याय को लेकर डैनिनो समेत तीन शिक्षाविदों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था। हालांकि बाद में अदालत ने अपने आदेश में बदलाव करते हुए यह फैसला केंद्र सरकार, राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और संबंधित शैक्षणिक संस्थानों पर छोड़ दिया।

समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में डैनिनो ने कहा कि अदालत के आदेशों के बाद कई शिक्षाविदों और टिप्पणीकारों ने “चिलिंग इफेक्ट” शब्द का इस्तेमाल किया है। उन्होंने कहा कि यदि लेखक हर पंक्ति पर विवाद या आपत्ति की आशंका से डरने लगेंगे, तो वे नए प्रयोग करने से बचेंगे। इससे शिक्षा प्रणाली में नवाचार प्रभावित होगा।

उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का हवाला देते हुए कहा कि सरकार शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव और आधुनिक सोच की बात करती है, लेकिन यह तभी संभव है जब लेखकों और शिक्षाविदों को स्वतंत्र माहौल मिले। उनके मुताबिक, रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच के बिना नई पीढ़ी के लिए बेहतर किताबें तैयार नहीं की जा सकतीं।

डैनिनो ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को जरूरत से ज्यादा पाठ्यपुस्तकों पर निर्भर बताया। उन्होंने कहा कि कई विकसित देशों में किताबें केवल सहायक सामग्री के रूप में इस्तेमाल होती हैं, जबकि कक्षा में शिक्षक अपने शोध, नोट्स और अन्य स्रोतों के आधार पर पढ़ाते हैं। इसके विपरीत भारत में पढ़ाई का मुख्य आधार अब भी किताबें ही हैं।

उन्होंने कहा कि असली चुनौती सिर्फ छात्रों के स्कूल बैग का वजन कम करना नहीं है, बल्कि कक्षा में किताबों पर अत्यधिक निर्भरता को घटाना भी है। इसके लिए शिक्षकों को रिसर्च आधारित और आधुनिक शिक्षण पद्धति के लिए तैयार करना जरूरी होगा।

हालांकि डैनिनो ने यह भी माना कि भारत में इस तरह का बदलाव आसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि देश में बड़ी संख्या में शिक्षक अभी इस प्रणाली के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। साथ ही कई स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी बड़ी बाधा है। उनके अनुसार, देश के आधे से ज्यादा स्कूलों में अब भी इंटरनेट की पर्याप्त सुविधा नहीं है, जिसके कारण किताबें ही शिक्षा का सबसे बड़ा माध्यम बनी हुई हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इन चुनौतियों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल हो सकता है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल एक अध्याय हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि भारत में पाठ्यपुस्तक लेखन और अकादमिक स्वतंत्रता की सीमा क्या होनी चाहिए।

Asmita Sarkar

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