
कक्षा 9 से तीसरी भाषा पढ़ाना अनिवार्य करने के CBSE के फैसले पर अब सुप्रीम कोर्ट की नजर है। अदालत ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) से इस मामले में विस्तृत जवाब मांगा है। यह मामला 2026-27 शैक्षणिक सत्र से नई भाषा व्यवस्था लागू करने से जुड़ा है, जिसे लेकर अभिभावकों, शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों के बीच बहस तेज हो गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने मामले में नोटिस जारी करते हुए सुनवाई जुलाई के दूसरे सप्ताह तक टाल दी। अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से भी यह बताने को कहा है कि नई भाषा नीति को लागू करने के लिए अब तक क्या तैयारियां की गई हैं और स्कूलों में इसकी व्यवस्था किस स्तर तक पहुंची है।
याचिकाकर्ताओं ने उठाए तैयारी और अधिकारों से जुड़े सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि CBSE ने 15 मई 2026 को जारी परिपत्र में अगले शैक्षणिक सत्र से तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य कर दिया है। उनका कहना था कि कई स्कूलों में अभी तक न तो जरूरी पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध हैं और न ही पर्याप्त शिक्षक मौजूद हैं। ऐसे में नई व्यवस्था को जल्दबाजी में लागू करना छात्रों और स्कूलों दोनों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है।
एक अन्य संबंधित मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी इस नीति पर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत से कहा कि भाषा केवल शिक्षा का विषय नहीं बल्कि व्यक्तिगत पसंद और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। उनके अनुसार किसी भी भाषा को छात्रों पर अनिवार्य रूप से थोपना संघीय ढांचे और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ माना जा सकता है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी मांग की कि 1 जुलाई 2026 से शुरू होने वाले नए सत्र में इस नीति को लागू करने पर अंतरिम रोक लगाई जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मांग पर कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत इस मामले को विस्तार से देखेगी।
क्या है पूरा विवाद?
यह जनहित याचिका दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और चेन्नई के अभिभावकों और शिक्षकों समेत 19 लोगों ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की है। याचिका में CBSE के 15 मई 2026 के परिपत्र संख्या Acad-33/2026 को चुनौती दी गई है।
इस परिपत्र के अनुसार कक्षा 9 के छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं शामिल होंगी। विदेशी भाषाओं को केवल तीसरी या अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में पढ़ाया जा सकेगा।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि CBSE ने 9 अप्रैल 2026 को पहले स्पष्ट किया था कि तीसरी भाषा की अनिवार्यता 2029-30 सत्र से पहले लागू नहीं होगी। इसी आधार पर स्कूलों और अभिभावकों ने अपनी शैक्षणिक योजना बनाई थी। लेकिन बाद में अचानक नीति में बदलाव किए जाने से छात्रों, स्कूलों और अभिभावकों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई।
संविधान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति का भी दिया गया हवाला
याचिका में आरोप लगाया गया है कि पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षकों और उपयुक्त पाठ्यसामग्री की कमी के बावजूद नई नीति लागू की जा रही है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14, 21ए और 19(1)(जी) के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है।
साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का हवाला देते हुए कहा गया है कि नीति में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि किसी भी छात्र या राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। याचिका में मांग की गई है कि 15 मई 2026 का परिपत्र रद्द किया जाए, 9 अप्रैल 2026 की पुरानी स्थिति बहाल की जाए और वर्तमान छात्रों पर नई भाषा नीति लागू करने पर रोक लगाई जाए।
शिक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है व्यापक असर
यह मामला केवल भाषा शिक्षा तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसका असर देश की शिक्षा नीति, स्कूल प्रशासन और राज्यों के अधिकारों पर भी पड़ सकता है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई यह तय कर सकती है कि नई भाषा नीति किस रूप में लागू होगी और छात्रों को इसके तहत क्या बदलाव देखने को मिलेंगे।




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