
देशभर में 1 जून से 30 जून 2026 तक चलाए जा रहे “खेत बचाओ अभियान” के तहत केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने गुजरात के गिर-सोमनाथ जिले के वेरावल तालुका स्थित चंदुवाव गांव का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने किसानों से संवाद किया और टिकाऊ एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया।
किसान जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन आहिर समाज वाड़ी में किया गया। यह कार्यक्रम कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), अंबुजानगर, कोडिनार तथा गिर-सोमनाथ जिले के कृषि, किसान कल्याण एवं सहकारिता विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसान, कृषि वैज्ञानिक, विशेषज्ञ और नीति निर्माता शामिल हुए, जिन्होंने आधुनिक और पर्यावरण हितैषी खेती के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी ने कहा कि मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता बनाए रखने, पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे धीरे-धीरे यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करें और उनकी जगह हरित खाद, नैनो यूरिया, नैनो डीएपी तथा जैव उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ाएं।
उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है, खेती की लागत घटती है और कृषि विकास को टिकाऊ बनाया जा सकता है। साथ ही किसानों को सरकार की उन योजनाओं का लाभ उठाने की सलाह दी गई जो पर्यावरण-अनुकूल खेती को प्रोत्साहित करने के लिए चलाई जा रही हैं।
कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी किसानों को जागरूक किया। विधायक भगाभाई बारड और पूर्व विधायक राजशीभाई जोटवा ने किसानों से सरकारी योजनाओं में सक्रिय भागीदारी की अपील की। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और पीएम-किसान जैसी योजनाओं का लाभ लेकर किसान अपनी उत्पादकता और आय दोनों बढ़ा सकते हैं।
कार्यक्रम के दौरान जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों और कृषि संस्थानों के अधिकारियों ने किसानों के साथ विभिन्न विषयों पर संवाद किया। इनमें किसान आईडी पंजीकरण, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, प्राकृतिक खेती प्रमाणन प्रक्रिया और जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी साझा की गई। साथ ही एकीकृत कृषि प्रणाली और टिकाऊ फसल उत्पादन पद्धतियों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।
इस अवसर पर प्राकृतिक खेती से तैयार उत्पादों की प्रदर्शनी और लाइव प्रदर्शन भी आयोजित किए गए। उद्योग प्रतिनिधियों द्वारा नई पीढ़ी के उर्वरकों से संबंधित स्टॉल लगाए गए, जबकि कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को जीवामृत तैयार करने की प्रक्रिया का प्रदर्शन कर दिखाया। जीवामृत प्राकृतिक खेती में उपयोग होने वाला एक महत्वपूर्ण जैविक घोल है, जो मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद करता है।
कार्यक्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थानों, जिनमें आईसीएआर-सीआईएफटी और आईसीएआर-सीएमएफआरआई के वैज्ञानिक भी शामिल थे, ने तकनीकी सत्रों में भाग लिया। उन्होंने किसानों को जलवायु-स्मार्ट कृषि और संसाधनों के कुशल उपयोग पर आधारित खेती के तरीकों की जानकारी दी।
यह कार्यक्रम किसानों और विशेषज्ञों के बीच ज्ञान साझा करने का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ। करीब 100 किसानों ने इसमें भाग लिया और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ कृषि उत्पादकता बढ़ाने वाली आधुनिक प्राकृतिक खेती तकनीकों के बारे में व्यावहारिक जानकारी प्राप्त की।




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