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CUET परीक्षा के ढांचे और प्रश्नों की गुणवत्ता पर उठे सवाल, संसदीय समिति ने की समीक्षा की सिफारिश

CUET परीक्षा के ढांचे और प्रश्नों की गुणवत्ता पर उठे सवाल, संसदीय समिति ने की समीक्षा की सिफारिश

CUET परीक्षा के ढांचे और प्रश्नों की गुणवत्ता पर उठे सवाल, संसदीय समिति ने की समीक्षा की सिफारिश

कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) को लेकर संसद की एक स्थायी समिति ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। समिति का मानना है कि मौजूदा मल्टीपल-चॉइस प्रश्न (MCQ) आधारित परीक्षा प्रारूप मानविकी और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों की वास्तविक प्रकृति के अनुरूप नहीं है। इस कारण समिति ने परीक्षा के ढांचे और प्रश्नों की गुणवत्ता की व्यापक समीक्षा करने की सिफारिश की है, ताकि यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के उद्देश्यों के साथ बेहतर तालमेल स्थापित कर सके।

राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि CUET को शैक्षणिक सत्र 2022-23 से लागू किया गया था। इसका उद्देश्य देशभर के विभिन्न शिक्षा बोर्डों से आने वाले छात्रों के लिए एक समान अवसर उपलब्ध कराना और विश्वविद्यालयों की प्रवेश प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी एवं सरल बनाना था।

CUET को एकमात्र प्रवेश माध्यम बनाने पर मतभेद

समिति की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कुछ सदस्यों ने स्नातक स्तर पर प्रवेश के लिए CUET को एकमात्र माध्यम बनाए जाने के लाभों पर असहमति जताई है। समिति का मानना है कि देश के सभी विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक और प्रशासनिक आवश्यकताएं एक जैसी नहीं होतीं, इसलिए एक ही परीक्षा के आधार पर प्रवेश प्रक्रिया तय करना कुछ संस्थानों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, विशेष रूप से मानविकी और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों में विद्यार्थियों की विश्लेषणात्मक क्षमता, स्वतंत्र सोच और व्यक्तिपरक समझ का मूल्यांकन केवल बहुविकल्पीय प्रश्नों के माध्यम से पूरी तरह संभव नहीं है। समिति ने सुझाव दिया है कि परीक्षा के डिजाइन और प्रश्नों की गुणवत्ता का पुनर्मूल्यांकन किया जाए, ताकि यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावना के अनुरूप छात्रों की व्यापक क्षमताओं का आकलन कर सके।

JNU जैसे संस्थानों की विशेष जरूरतों का भी उठाया मुद्दा

समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि CUET के कई फायदे हैं, लेकिन यह कुछ विश्वविद्यालयों को उनकी विशेष प्रवेश नीतियों और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप काम करने की पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं देता। उदाहरण के तौर पर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की प्रवेश प्रणाली को इस तरह विकसित किया गया था कि सामाजिक, आर्थिक और क्षेत्रीय विविधता को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।

समिति ने कहा कि इस विषय पर आगे भी विस्तृत विचार-विमर्श की आवश्यकता है, ताकि राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा और विश्वविद्यालयों की विशेष आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाया जा सके।

सरकार ने कहा- सुझावों पर किया जा रहा है विचार

अपनी ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ में केंद्र सरकार ने बताया कि समिति द्वारा उठाए गए मुद्दों को गंभीरता से लिया गया है। इस संबंध में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को आवश्यक सुझाव और दिशा-निर्देश दिए गए हैं।

सरकार का कहना है कि CUET ने उच्च शिक्षा में प्रवेश प्रक्रिया को अधिक सरल बनाया है। इसके माध्यम से छात्र एक ही आवेदन प्रक्रिया के जरिए कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों और भाग लेने वाले संस्थानों में प्रवेश के लिए आवेदन कर सकते हैं। इससे अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं का बोझ कम हुआ है और छात्रों का समय तथा संसाधन दोनों बचते हैं।

देश की दूसरी सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है CUET

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, CUET शुरू होने के केवल दो वर्षों के भीतर देश की दूसरी सबसे बड़ी परीक्षा के रूप में उभरकर सामने आया है। वर्ष 2025 में इस परीक्षा में 13.54 लाख से अधिक छात्रों ने भाग लिया था, जो इसकी बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि CUET-UG के प्रारूप में पिछले तीन वर्षों के अनुभवों के आधार पर लगातार सुधार किए गए हैं। वर्ष 2025 में 37 विषयों के लिए परीक्षा आयोजित की गई थी और परिणाम भी पिछले वर्ष की तुलना में तीन सप्ताह से अधिक पहले घोषित किए गए थे। इससे प्रवेश प्रक्रिया को समयबद्ध और अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिली।

शिक्षा विशेषज्ञों के लिए भी महत्वपूर्ण बहस

CUET को लेकर संसदीय समिति की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में उच्च शिक्षा प्रवेश प्रणाली को और अधिक समावेशी, निष्पक्ष और छात्र-केंद्रित बनाने पर चर्चा चल रही है। आने वाले समय में परीक्षा प्रारूप, मूल्यांकन पद्धति और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाने को लेकर नई नीतिगत चर्चाएं देखने को मिल सकती हैं।

फिलहाल, समिति की सिफारिशों ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है कि क्या सभी विषयों और सभी विश्वविद्यालयों के लिए एक समान प्रवेश परीक्षा मॉडल वास्तव में सबसे उपयुक्त विकल्प है या इसमें विषय-विशेष और संस्थान-विशेष आवश्यकताओं को भी शामिल किया जाना चाहिए।

Asmita Sarkar

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