
पानी में सीसे (Lead) की बढ़ती मात्रा दुनिया भर में एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही है। इसी समस्या के समाधान की दिशा में Indian Institute of Technology Guwahati के शोधकर्ताओं ने एक नई जैविक तकनीक विकसित की है, जो पारंपरिक रासायनिक उपचार की बजाय सूक्ष्मजीवों की मदद से दूषित पानी से सीसा हटाने में सक्षम है।
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने सायनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria) नामक सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया। ये ऐसे सूक्ष्मजीव होते हैं जो प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) करने की क्षमता रखते हैं। शोधकर्ताओं का उद्देश्य यह समझना था कि सायनोबैक्टीरिया का कौन-सा हिस्सा पानी में मौजूद सीसे को सबसे प्रभावी ढंग से अवशोषित कर सकता है।
अध्ययन में पाया गया कि सायनोबैक्टीरिया का एक विशेष घटक, जिसे एक्सोपॉलीसैकराइड्स (Exopolysaccharides-EPS) कहा जाता है, सीसे को हटाने में सबसे अधिक प्रभावी साबित हुआ। शोध के अनुसार EPS ने 92.5 प्रतिशत तक सीसा हटाने की क्षमता दिखाई। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Journal of Hazardous Materials में प्रकाशित हुआ है।
इस शोध का नेतृत्व Prof Debasish Das ने किया। उनके साथ पोस्टडॉक्टोरल फेलो Dr Abhijeet Mahana और केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के Prof Tapas K Mandal भी इस परियोजना से जुड़े रहे।
क्यों खतरनाक है पानी में सीसा?
विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक सीसे के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। यह मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र, हृदय संबंधी स्वास्थ्य, किडनी की कार्यप्रणाली और बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास को प्रभावित कर सकता है।
सीसा आमतौर पर औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि क्षेत्र से निकलने वाले रसायनों और पुरानी जल पाइपलाइन के माध्यम से जल स्रोतों में पहुंचता है। कई क्षेत्रों में यह समस्या लगातार बढ़ रही है, जिससे सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
पारंपरिक तरीकों से कैसे अलग है यह तकनीक?
अब तक सीसा हटाने के लिए अधिकतर रासायनिक उपचार या कृत्रिम अवशोषक पदार्थों का उपयोग किया जाता रहा है। हालांकि ये तरीके अक्सर महंगे होते हैं और कई बार इनके कारण द्वितीयक प्रदूषण भी पैदा हो सकता है।
IIT गुवाहाटी द्वारा विकसित यह तकनीक बायोरिमेडिएशन (Bioremediation) पर आधारित है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें सूक्ष्मजीव प्रदूषित वातावरण को साफ करने में मदद करते हैं। इस कारण यह तरीका पर्यावरण के लिए अधिक अनुकूल और अपेक्षाकृत कम लागत वाला माना जा रहा है।
किस सूक्ष्मजीव का किया गया उपयोग?
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में Phormidium corium NRMC-50 नामक सायनोबैक्टीरिया प्रजाति का उपयोग किया। यह प्रजाति प्रकाश की उपस्थिति में सीसे को अवशोषित करने की क्षमता रखती है। अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि भारी धातुओं से प्रभावित क्षेत्रों में जल शोधन के लिए इस तरह की जैविक तकनीक भविष्य में एक प्रभावी और टिकाऊ विकल्प बन सकती है।
स्वच्छ जल समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
शोधकर्ताओं का मानना है कि बढ़ते जल प्रदूषण और भारी धातुओं की समस्या को देखते हुए जैविक उपचार तकनीकों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। IIT गुवाहाटी का यह शोध न केवल जल शोधन के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलता है, बल्कि कम लागत और पर्यावरण-अनुकूल समाधान विकसित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू किया जाता है, तो यह उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से लाभकारी साबित हो सकती है जहां पानी में भारी धातुओं का प्रदूषण सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है।




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