
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल अर्थव्यवस्था के तेजी से विस्तार के साथ दुनिया भर में डेटा सेंटरों का निर्माण रिकॉर्ड स्तर पर हो रहा है। भारत भी इस क्षेत्र में तेजी से निवेश आकर्षित कर रहा है और खुद को वैश्विक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर हब बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि, एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को समय रहते नहीं संभाला गया, तो आने वाले दशकों में यही डेटा सेंटर गंभीर परिचालन और पर्यावरणीय संकट का सामना कर सकते हैं।
डेटा सेंटर क्या होते हैं और क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
डेटा सेंटर ऐसे अत्याधुनिक परिसर होते हैं जहां हजारों-लाखों सर्वर, स्टोरेज सिस्टम और नेटवर्क उपकरण चौबीसों घंटे चलते रहते हैं। इंटरनेट पर मिलने वाली अधिकांश डिजिटल सेवाएं इन्हीं डेटा सेंटरों पर आधारित होती हैं।
आज ChatGPT, Gemini, गूगल सर्च, नेटफ्लिक्स, अमेजन वेब सर्विसेज (AWS), माइक्रोसॉफ्ट एज्योर, डिजिटल बैंकिंग, यूपीआई, ई-गवर्नेंस और क्लाउड आधारित अधिकांश सेवाएं डेटा सेंटरों की क्षमता पर निर्भर हैं। एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने और संचालित करने के लिए अत्यधिक कंप्यूटिंग क्षमता की आवश्यकता होती है, जिससे दुनिया भर में नए डेटा सेंटरों की मांग लगातार बढ़ रही है।
भारत में तेजी से बढ़ रहा है डेटा सेंटर उद्योग
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, भारत की कुल डेटा सेंटर क्षमता वर्ष 2020 में लगभग 375 मेगावाट थी, जो 2025 तक बढ़कर करीब 1,500 मेगावाट हो गई है।
एआई मिशन के तहत सरकार ने 14 सूचीबद्ध सेवा प्रदाताओं और डेटा सेंटरों के माध्यम से 38,231 GPU उपलब्ध कराए हैं। इन्हें स्टार्टअप, शोध संस्थानों, विश्वविद्यालयों और अन्य पात्र संस्थानों को औसतन 65 रुपये प्रति घंटे की सब्सिडी दर पर उपलब्ध कराया जा रहा है, जो वैश्विक औसत लागत का लगभग एक-तिहाई है।
ये सुविधाएं मुंबई, नवी मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, नोएडा और जामनगर सहित कई शहरों में स्थापित हैं।
बिजली और ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढ़ेगी
सरकार के अनुसार, एआई और डेटा सेंटरों के विस्तार को देखते हुए बिजली की बढ़ती मांग को राष्ट्रीय ऊर्जा योजना में शामिल किया गया है। ऊर्जा मंत्रालय का अनुमान है कि 2031-32 तक डेटा सेंटरों की बिजली मांग 13.56 गीगावाट तक पहुंच सकती है।
इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा है। इसके अलावा हाल ही में संसद द्वारा पारित SHANTI (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India) Act के जरिए भविष्य में छोटे मॉड्यूलर और माइक्रो न्यूक्लियर रिएक्टरों के विकास को बढ़ावा देने की भी योजना है, जिससे डेटा सेंटरों को स्थिर और विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सके।
2034 तक दोगुने से ज्यादा होगा भारतीय डेटा सेंटर बाजार
आईएमएआरसी (IMARC) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का डेटा सेंटर बाजार वर्ष 2025 में लगभग 5.55 अरब डॉलर का था। अनुमान है कि 2034 तक यह बढ़कर 13.11 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। इस दौरान उद्योग की औसत वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) लगभग 10.01 प्रतिशत रहने की संभावना है।
रिपोर्ट में भारत को लेकर क्या चेतावनी दी गई?
Cross Dependency Initiative (XDI) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत उन देशों में शामिल है जहां भविष्य के डेटा सेंटर जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
रिपोर्ट में भारत के 41 प्रस्तावित डेटा सेंटरों का विश्लेषण किया गया, जिनमें से पांच को पहले ही उच्च जोखिम की श्रेणी में रखा गया है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्षों के अनुसार—
- 2026 से 2100 के बीच भारत में डेटा सेंटरों को होने वाले जलवायु संबंधी नुकसान का जोखिम 269 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
- वर्ष 2026 में चरम मौसमीय घटनाओं से संभावित नुकसान के जोखिम के मामले में भारत दुनिया में 11वें स्थान पर है।
- तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे प्रमुख टेक्नोलॉजी हब अत्यधिक गर्मी के कारण सबसे अधिक परिचालन जोखिम वाले क्षेत्रों में शामिल हैं।
डेटा सेंटरों के लिए सबसे बड़ा खतरा क्यों बन रही है गर्मी?
अक्सर जलवायु परिवर्तन की चर्चा बाढ़ या चक्रवात तक सीमित रहती है, लेकिन डेटा सेंटरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हीटवेव और अत्यधिक तापमान है।
हजारों सर्वर लगातार काम करते हैं और बड़ी मात्रा में गर्मी उत्पन्न करते हैं। इन्हें नियंत्रित रखने के लिए शक्तिशाली कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है। यदि बाहरी तापमान बहुत अधिक बढ़ जाए तो कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं—
- सर्वर की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
- कूलिंग सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
- बिजली की खपत तेजी से बढ़ जाती है।
- बिजली ग्रिड पर अतिरिक्त भार पड़ता है।
- सर्विस बाधित होने या सिस्टम फेल होने का खतरा बढ़ जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत, ब्राजील, मैक्सिको, इंडोनेशिया और स्पेन जैसे देशों में 75 प्रतिशत से अधिक प्रस्तावित डेटा सेंटर अत्यधिक गर्मी से जुड़े उच्च परिचालन जोखिम का सामना कर सकते हैं।
खतरा सिर्फ डेटा सेंटरों तक सीमित नहीं
विशेषज्ञों का कहना है कि डेटा सेंटर अकेले काम नहीं करते। उनकी कार्यक्षमता कई बाहरी व्यवस्थाओं पर निर्भर करती है, जिनमें शामिल हैं—
- बिजली आपूर्ति
- इंटरनेट और दूरसंचार नेटवर्क
- सड़क एवं परिवहन व्यवस्था
- जल आपूर्ति
- उपकरणों की सप्लाई चेन
यदि हीटवेव, बाढ़ या चक्रवात के कारण इनमें से कोई भी व्यवस्था प्रभावित होती है तो डेटा सेंटरों का संचालन भी बाधित हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार इन अप्रत्यक्ष जोखिमों को शामिल करने पर परिचालन बाधित होने की आशंका लगभग 10 गुना तक बढ़ जाती है।
बढ़ सकती है पानी की चुनौती
एआई आधारित डेटा सेंटरों को केवल बिजली ही नहीं, बल्कि भारी मात्रा में पानी की भी आवश्यकता होती है। डेटा सेंटरों के कूलिंग सिस्टम में लगातार पानी का उपयोग होता है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार—
- वर्ष 2030 तक एआई डेटा सेंटरों की बिजली खपत 945 टेरावाट-घंटे (TWh) तक पहुंच सकती है।
- यह पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की कुल वार्षिक बिजली खपत के लगभग तीन गुना के बराबर है।
- केवल वर्ष 2025 में दुनिया के डेटा सेंटरों ने लगभग 448 TWh बिजली की खपत की।
रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक डेटा सेंटरों की बिजली खपत से जुड़ा जल पदचिह्न (Water Footprint) 9.3 ट्रिलियन लीटर तक पहुंच सकता है। यह मात्रा इतनी है कि इससे उप-सहारा अफ्रीका के लगभग 1.3 अरब लोगों की एक वर्ष की न्यूनतम घरेलू जल आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
भारत में पहले से गहराता जा रहा है जल संकट
नीति आयोग की 2019 समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (Composite Water Management Index) रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक भारत की शहरी आबादी लगभग 60 करोड़ हो जाएगी और घरेलू जल मांग दोगुनी होने की संभावना है।
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि उस समय पानी की मांग और उपलब्धता के बीच लगभग 50 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) का अंतर हो सकता है।
इसके अलावा—
- देश के 12 प्रमुख नदी बेसिनों में लगभग 82 करोड़ लोग उच्च या अत्यधिक जल संकट वाले क्षेत्रों में रह रहे हैं।
- दुनिया के सबसे अधिक जल संकट झेल रहे 20 बड़े शहरों में पांच भारत में हैं।
- केवल 35 प्रतिशत शहरी घरों में ही पाइप से नियमित जल आपूर्ति उपलब्ध है।
किन राज्यों में सबसे अधिक दबाव?
रिपोर्ट के अनुसार पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव है। वहीं महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई हिस्से भी गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं।
इन राज्यों में भूजल स्तर लगातार घट रहा है, जबकि कृषि, उद्योग और शहरीकरण के कारण पानी की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। यदि भविष्य में इन्हीं क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नए डेटा सेंटर स्थापित होते हैं, तो जल प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
निष्कर्ष
भारत तेजी से वैश्विक एआई और डेटा सेंटर हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इससे निवेश, रोजगार और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ मिलने की संभावना है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस विकास के साथ ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे पर समान रूप से निवेश करना आवश्यक होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो भविष्य में बढ़ती गर्मी, बिजली की मांग और जल संकट डेटा सेंटर उद्योग के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं।




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