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UP का एक गांव जहां हर घर में है कोई न कोई IAS-IPS, ‘अफसरों की फैक्टरी’ कहते हैं इसे

माधोपट्टी। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिला स्थित एक गांव। इस गांव की पहचान यह है कि इसे अफसर पैदा करने वाली फैक्टरी कहा जाता है। और यह इसलिए कि इस गांव के लगभग हर परिवार से कोई न कोई सदस्य आईएएस, आईपीएस या आईआरएस अफसर है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी एक चुनावी सभा में इस माधोपट्टी गांव का जिक्र किया था। 

दरअसल, जौनपुर जिला मुख्यालय से करीब दस किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में करीब 75 परिवार हैं। यहां से 50 से अधिक आईएएस, आईपीएस और आईआरएस अफसर निकल कर देश के अलग-अलग राज्यों में तैनात हैं। इतना ही नहीं, पीसीएस, पीपीएस, इंजीनियर, कई एमबीबीएस, वैज्ञानिक भी हैं, जो अलग-अलग राज्यों में सेवाएं दे रहे हैं। पिछले चुनाव में 878 यानी 65 फीसदी अफसरों ने यहां मतदान किया था जबकि बीते पंचायत चुनाव में यह आंकड़ा 78 फीसदी रहा। तभी गांव के निवासी प्रणव सिंह कहते हैं कि यहां सचमुच वीणा वादिनी यानी मां सरस्वती का वास है। 

बहरहाल राजधानी लखनऊ से करीब 300 किलोमीटर दूर इस गांव से इतने अफसर हैं कि ग्रामीणों को उनकी संख्या ही नहीं पता रहती है। लेकिन गांववाले इसे अपने लिए गर्व की बात ज़रूर समझते हैं कि सबसे अधिक आईएएस, आईपीएस देने वाला गांव उनका है। राजनीति से यहाँ के लोगों का बहुत वास्ता नहीं लेकिन राजनितिक जागरूकता उनमें खूब है। वे खुलकर राज्य और राष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक क़दमों पर बात करते हैं। कहते हैं कि अभी स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत काम होना बाकी है।

वीरेंद्र सिंह, सुखदेव सिंह, प्रेमलाल सिंह, धीरीन सिंह, दुखहरन सिंह जैसे गांव के लोग कहते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के अलावा हमें खुद भी अपने स्तर से काम करना होगा। हम ऐसा कर सके तो जौनपुर में कई माधोपट्टी गांव होंगे। इस जिले से कई अफसर निकलेंगे और निकलने ही चाहिए। गांव की बुजुर्ग लालमनी कहती हैं कि यहां के इतने लोगों के अफसर बनने के पीछे माताओं की भूमिका बहुत अहम है। उल्लेखनीय है कि यहां के पुरुष ही नहीं महिलाएं भी अधिकारी बनकर अपनी सेवाएं दे रही हैं। 

बहरहाल, इस गांव से सबसे पहले 952 में  डॉ. इंदुप्रकाश आईएएस बने और यूपीएससी में दूसरी रैंक हासिल की। 1964 में छत्रसाल सिंह ने आईएएस परीक्षा पास की और तमिलनाडु के मुख्य सचिव बने। साल 1964 में ही अजय सिंह और 1968 में शशिकांत सिंह आईएएस बने। 1995 में विनय सिंह आईएएस बने और बिहार के मुख्य सचिव बने। 1980 में आशा सिंह, 1982 में ऊषा सिंह और 1983 में इंदु सिंह भी सिविल सर्विस में चुनी गईं। 

गांव से लोगों के अधिकारी बनने का सिलसिला अभी तक जारी है। डॉ इंदुप्रकाश के चार भाईयों के बाद उनकी दूसरी पीढ़ी भी यूपीएससी परीक्षा पास करने लगी। साल 2002 में डॉ इंदुप्रकाश के बेटे यशस्वी आईएएस बने। उन्हें इस परीक्षा में 31वीं रैंक मिली। वहीं, 1994 में इसी परिवार के अमिताभ सिंह भी आईएएस बने। वो नेपाल के राजदूत रह चुके हैं। अमिताभ सिंह की पत्नी सरिता सिंह भी आईपीएस अधिकारी बनी।

माधोपट्टी में खेत कम है। शायद यह एक वजह है कि लोगों का पढ़ाई-लिखाई में खास ध्यान रहता है। विद्या की देवी मां सरस्वती इस गांव में बसती हैं। अगर गांव के किसी बच्चे से उनके भविष्य के बारे में सवाल किया जाए तो उनके मुंह से आपको आईएएस आईपीएस बनने की बात ही सुनने को मिलेगी।

Asmita Sarkar

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