Edinbox Hindi
बदलेंगे शिक्षक, तभी बदलेगी शिक्षा

बदलेंगे शिक्षक, तभी बदलेगी शिक्षा

बदलेंगे शिक्षक, तभी बदलेगी शिक्षा

भारत की शिक्षा व्यवस्था इस समय बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है। नई शिक्षा नीति लागू हो रही है। स्कूलों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे नए विषय शामिल किए जा रहे हैं। पाठ्यक्रम बदले जा रहे हैं, तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है और बच्चों की सीखने की क्षमता को पहले से अधिक गंभीरता से मापा जा रहा है।

इन सबके बीच एक सवाल ऐसा है, जिस पर शायद सबसे कम चर्चा होती है—क्या हमारे शिक्षक इन बदलावों के लिए तैयार हैं?

किसी भी शिक्षा सुधार की शुरुआत सरकारी फाइलों में होती है, लेकिन उसकी सफलता या असफलता का फैसला कक्षा में होता है। आखिरकार, कोई भी नीति छात्रों तक शिक्षक के माध्यम से ही पहुंचती है। किताबें बदल सकती हैं, स्मार्ट बोर्ड लग सकते हैं, AI आधारित ऐप आ सकते हैं, लेकिन यदि शिक्षक इनका सही उपयोग नहीं कर पाए, तो शिक्षा में वास्तविक बदलाव संभव नहीं होगा।

भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा व्यवस्थाओं में से एक है। UDISE+ 2024-25 के अनुसार देश में 14.71 लाख से अधिक स्कूल, एक करोड़ से ज्यादा शिक्षक और लगभग 24.69 करोड़ छात्र हैं। आंकड़े प्रभावशाली हैं, लेकिन सवाल केवल संख्या का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या हर शिक्षक को बदलती शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप लगातार प्रशिक्षित किया जा रहा है?

ग्रामीण भारत की तस्वीर इस चुनौती को और स्पष्ट करती है। कई सरकारी स्कूलों में एक शिक्षक को कई कक्षाएं संभालनी पड़ती हैं। पढ़ाने के साथ-साथ प्रशासनिक काम, ऑनलाइन डेटा अपलोड करना, अभिभावकों से संवाद और दूसरी जिम्मेदारियां भी उसी के हिस्से आती हैं। ऐसे में केवल साल में एक-दो प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर देना पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।

इसी बीच ASER 2024 की रिपोर्ट बताती है कि कक्षा 3 के केवल 23.4 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा 2 स्तर का पाठ सहजता से पढ़ पा रहे हैं। महामारी के बाद सुधार जरूर हुआ है, लेकिन यह आंकड़ा यह भी बताता है कि बड़ी संख्या में बच्चे बुनियादी पढ़ने और गणित की क्षमता विकसित किए बिना आगे बढ़ रहे हैं।

इस स्थिति के लिए केवल छात्रों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए संकेत है कि शिक्षक को और अधिक सहयोग, बेहतर प्रशिक्षण और आधुनिक शिक्षण तकनीकों की जरूरत है।

नई शिक्षा नीति केवल पाठ्यक्रम बदलने की बात नहीं करती। यह बच्चों में रचनात्मक सोच, अनुभव आधारित सीखने, समस्या समाधान, संवाद कौशल और समग्र विकास पर जोर देती है। लेकिन इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए शिक्षक को भी पारंपरिक पढ़ाने के तरीके से आगे बढ़ना होगा।

आज शिक्षक से उम्मीद की जाती है कि वह तकनीक का उपयोग करे, अलग-अलग सीखने की क्षमता वाले बच्चों को साथ लेकर चले, मानसिक स्वास्थ्य को समझे, बहुभाषी कक्षाओं को संभाले और बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करे। यह जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बड़ी है।

यही कारण है कि शिक्षक प्रशिक्षण को एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली पेशेवर व्यवस्था बनाना होगा। प्रशिक्षण केवल कार्यशालाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। कक्षा में मार्गदर्शन, अनुभवी शिक्षकों से सीखने का अवसर, नियमित फीडबैक और स्थानीय जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण ही वास्तविक बदलाव ला सकता है।

तकनीक निश्चित रूप से मददगार है। DIKSHA जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म शिक्षकों को नए संसाधन उपलब्ध करा रहे हैं। लेकिन तकनीक स्वयं समाधान नहीं है। सबसे अच्छी डिजिटल सामग्री भी तभी उपयोगी होगी, जब शिक्षक उसे बच्चों की जरूरतों के अनुसार प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सके।

यूनेस्को भी चेतावनी दे चुका है कि 2030 तक दुनिया को करोड़ों नए शिक्षकों की जरूरत होगी। भारत के लिए यह केवल भर्ती का नहीं, बल्कि प्रशिक्षित, प्रेरित और सम्मानित शिक्षक तैयार करने का अवसर भी है।

शिक्षा सुधार पर चर्चा अक्सर नई नीतियों, स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड और रैंकिंग तक सीमित रह जाती है। लेकिन असली सवाल बहुत सरल है—क्या शिक्षक हर बच्चे को समझने, सीखने और आगे बढ़ने में सक्षम बना पा रहा है?

यदि इस सवाल का जवाब ‘हां’ नहीं है, तो हमें शिक्षा सुधार की शुरुआत फिर से शिक्षक से करनी होगी। क्योंकि आखिरकार, शिक्षा की गुणवत्ता उतनी ही मजबूत होती है, जितना मजबूत उसका शिक्षक होता है।

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed