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Would it be right to include 50% of board exam marks in NEET and JEE?

क्या NEET और JEE में बोर्ड के 50% अंक जोड़ना सही होगा? सिर्फ परीक्षा नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था बदलने का मौका

Would it be right to include 50% of board exam marks in NEET and JEE?

हर साल लाखों छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले के लिए NEET और JEE जैसी प्रवेश परीक्षाएं देते हैं। कई छात्रों के लिए दो-तीन घंटे की एक परीक्षा ही उनके पूरे भविष्य का फैसला करती है। ऐसे में यदि अब बोर्ड परीक्षा के अंकों को भी 50% तक वेटेज देने पर विचार किया जा रहा है, तो यह केवल एडमिशन नियमों में बदलाव नहीं, बल्कि भारत की स्कूली शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा संस्कृति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

हालांकि, यह प्रस्ताव अभी केवल विचाराधीन है और इस पर अंतिम फैसला केंद्र सरकार को लेना है। लेकिन इससे जुड़ी बहस शुरू हो चुकी है। सवाल यह है कि क्या बोर्ड के अंकों को अधिक महत्व देने से शिक्षा व्यवस्था बेहतर होगी या इससे नई समस्याएं पैदा होंगी?

एक परीक्षा से तय होता है पूरा भविष्य

आज की व्यवस्था में मेडिकल और इंजीनियरिंग में प्रवेश का सबसे बड़ा आधार NEET और JEE का स्कोर है। इसका असर यह हुआ है कि 11वीं-12वीं की पढ़ाई का बड़ा हिस्सा प्रवेश परीक्षा की तैयारी तक सीमित हो गया है। कई छात्र स्कूल की नियमित पढ़ाई से ज्यादा समय कोचिंग संस्थानों में बिताते हैं।

यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में “डमी स्कूल” का चलन तेजी से बढ़ा है। छात्र केवल बोर्ड परीक्षा देने के लिए स्कूल में नामांकन रखते हैं, जबकि उनकी असली पढ़ाई कोचिंग सेंटर में होती है। इससे स्कूल शिक्षा का उद्देश्य कमजोर पड़ता है।

अगर बोर्ड परीक्षा के अंकों को एडमिशन में महत्व मिलता है, तो छात्रों का ध्यान फिर से स्कूल की पढ़ाई पर लौट सकता है। इससे नियमित अध्ययन और अवधारणात्मक समझ को बढ़ावा मिलेगा।

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती बोर्ड परीक्षाओं की समानता है

इस प्रस्ताव का सबसे कमजोर पक्ष भी यहीं है।

भारत में एक या दो नहीं, बल्कि कई राज्य बोर्ड और राष्ट्रीय बोर्ड हैं। CBSE, CISCE और अलग-अलग राज्यों के बोर्डों का पाठ्यक्रम, मूल्यांकन प्रणाली और अंक देने का तरीका एक जैसा नहीं है। कुछ बोर्डों में 95 प्रतिशत अंक लाना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है, जबकि कुछ में 80 प्रतिशत भी बड़ी उपलब्धि होती है।

ऐसी स्थिति में यदि सभी बोर्डों के अंकों को समान वेटेज दिया जाता है, तो यह कई छात्रों के लिए असमान प्रतिस्पर्धा पैदा कर सकता है।

इसलिए यदि बोर्ड के अंकों को शामिल किया जाता है, तो पहले एक मजबूत Normalization System तैयार करना जरूरी होगा, ताकि अलग-अलग बोर्डों के छात्रों के साथ न्याय हो सके।

कोचिंग का दबाव कम होगा या बढ़ जाएगा?

इस प्रस्ताव का एक बड़ा उद्देश्य छात्रों पर एक ही परीक्षा का दबाव कम करना बताया जा रहा है।

लेकिन सवाल यह भी है कि क्या वास्तव में दबाव कम होगा?

संभव है कि भविष्य में छात्र केवल NEET या JEE की ही नहीं, बल्कि बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए भी अतिरिक्त कोचिंग लेने लगें। यानी एक परीक्षा का तनाव कम होने के बजाय दो अलग-अलग परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव बढ़ सकता है।

ऐसे में सुधार तभी सफल होगा, जब बोर्ड परीक्षाओं का मूल्यांकन अधिक संतुलित और कौशल आधारित बनाया जाए।

शिक्षा को फिर से स्कूलों तक लाने का मौका

यदि सही तरीके से लागू किया जाए तो यह बदलाव शिक्षा व्यवस्था को सकारात्मक दिशा दे सकता है।

स्कूलों की भूमिका फिर मजबूत होगी। छात्र पूरे वर्ष पढ़ाई को गंभीरता से लेंगे। केवल रटने की बजाय विषयों की समझ विकसित करने पर जोर बढ़ेगा। साथ ही बोर्ड परीक्षा की विश्वसनीयता भी पहले से अधिक मजबूत हो सकती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) भी समग्र मूल्यांकन (Holistic Assessment) और केवल एक परीक्षा पर निर्भरता कम करने की बात करती है। ऐसे में यह प्रस्ताव उसी दिशा में उठाया गया एक कदम माना जा सकता है।

ऑन-डिमांड परीक्षा का विचार भी बदल सकता है तस्वीर

रिपोर्ट्स के अनुसार, समिति छात्रों को साल में एक से अधिक बार परीक्षा देने और भविष्य में कंप्यूटर आधारित अडैप्टिव ऑन-डिमांड परीक्षा प्रणाली पर भी विचार कर रही है।

यदि ऐसा मॉडल लागू होता है, तो छात्रों को एक दिन की खराब परफॉर्मेंस के कारण पूरे साल का नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा। दुनिया के कई देशों में इस तरह की परीक्षा प्रणाली पहले से अपनाई जा रही है।

हालांकि भारत जैसे बड़े देश में इसे लागू करने के लिए मजबूत डिजिटल ढांचा, साइबर सुरक्षा और पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था की आवश्यकता होगी।

फैसला जल्दबाजी में नहीं होना चाहिए

बोर्ड के अंकों को 50 प्रतिशत वेटेज देने का विचार पहली नजर में संतुलित और छात्र हित में दिखाई देता है। लेकिन इसे लागू करने से पहले कई व्यावहारिक सवालों का समाधान जरूरी है।

सभी शिक्षा बोर्डों के मूल्यांकन में समानता कैसे आएगी? क्या इससे कोचिंग संस्कृति कम होगी या और मजबूत होगी? ग्रामीण और शहरी छात्रों पर इसका क्या असर पड़ेगा? इन सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना होगा।

निष्कर्ष

भारत की प्रवेश परीक्षा व्यवस्था में बदलाव की जरूरत से शायद ही कोई इनकार करेगा। लेकिन सुधार तभी सफल माना जाएगा, जब वह छात्रों पर बोझ बढ़ाने के बजाय उन्हें बेहतर सीखने का अवसर दे।

यदि बोर्ड परीक्षा के अंकों को शामिल करने का फैसला लिया जाता है, तो इसके साथ पारदर्शी नॉर्मलाइजेशन, समान मूल्यांकन प्रणाली और मजबूत स्कूल शिक्षा पर भी बराबर काम करना होगा। केवल वेटेज बदल देने से शिक्षा व्यवस्था नहीं बदलती, उसके लिए पूरे सिस्टम को संतुलित बनाना पड़ता है।

 

 

Asmita Sarkar

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