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A special tribunal will be set up for university teachers and staff in Jharkhand, ensuring speedy resolution of disputes

झारखंड में विश्वविद्यालयों के शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए बनेगा विशेष ट्रिब्यूनल, मिलेगा विवादों का जल्द समाधान

A special tribunal will be set up for university teachers and staff in Jharkhand, ensuring speedy resolution of disputes

झारखंड सरकार ने सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मचारियों के सेवा संबंधी विवादों के समाधान के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य सरकार ने फैसला किया है कि अब ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए एक विशेष ट्रिब्यूनल (Tribunal) का गठन किया जाएगा। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य कर्मचारियों को छोटे-बड़े सेवा विवादों के लिए सीधे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाने की आवश्यकता कम करना और मामलों का तेजी से निपटारा सुनिश्चित करना है।

सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद नियुक्ति, वेतन, पदोन्नति, सेवा समाप्ति और अन्य प्रशासनिक मामलों का समाधान पहले की तुलना में अधिक तेज और व्यवस्थित तरीके से हो सकेगा।

पहले शिकायत समिति, फिर ट्रिब्यूनल में होगी अपील

नई व्यवस्था के तहत किसी भी शिक्षक या कर्मचारी की सेवा संबंधी शिकायत पर सबसे पहले शिकायत निवारण समिति (Grievance Redressal Committee) सुनवाई करेगी। यदि कर्मचारी समिति के निर्णय से संतुष्ट नहीं होता है, तो वह राज्य स्तर पर गठित ट्रिब्यूनल में अपील कर सकेगा।

इस व्यवस्था का उद्देश्य अदालतों में लंबित मामलों की संख्या कम करना और कर्मचारियों को समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराना है।

ट्रिब्यूनल क्या होता है?

ट्रिब्यूनल को सरल भाषा में विशेष न्यायिक मंच या विशेष अदालत कहा जा सकता है। यह सामान्य अदालतों की तरह सभी प्रकार के मामलों की सुनवाई नहीं करता, बल्कि किसी विशेष विषय से जुड़े विवादों का निपटारा करता है।

भारत में कई ऐसे ट्रिब्यूनल पहले से काम कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) केंद्र सरकार के कर्मचारियों की नियुक्ति, सेवा, वेतन और ट्रांसफर से जुड़े मामलों की सुनवाई करता है। वहीं नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) कंपनियों से जुड़े विवादों और दिवाला मामलों का निपटारा करता है।

इसी तर्ज पर झारखंड का नया ट्रिब्यूनल केवल सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के शिक्षकों एवं कर्मचारियों के सेवा संबंधी मामलों की सुनवाई करेगा।

ट्रिब्यूनल में कौन होंगे सदस्य?

राज्य सरकार की प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या ऐसे व्यक्ति करेंगे जो हाईकोर्ट के न्यायाधीश बनने की योग्यता रखते हों।

इसके अलावा ट्रिब्यूनल में अनुभवी अधिवक्ता, झारखंड वित्तीय सेवा के संयुक्त सचिव स्तर के सेवानिवृत्त अधिकारी तथा प्रशासनिक मामलों का अनुभव रखने वाले सदस्य शामिल किए जाएंगे। आवश्यकता पड़ने पर अध्यक्ष किसी विषय विशेषज्ञ को आमंत्रित सदस्य के रूप में भी बुला सकेंगे।

किसी सरकारी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर को सदस्य सचिव बनाया जाएगा। सभी सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष का होगा और उन्हें नियमानुसार वेतन एवं भत्ते दिए जाएंगे। ट्रिब्यूनल की बैठक के लिए कम से कम दो सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक होगी।

किन मामलों में कर सकेंगे अपील?

ट्रिब्यूनल में उन मामलों की अपील की जा सकेगी, जिनका संबंध सेवा शर्तों से होगा। यदि किसी कर्मचारी या शिक्षक को नौकरी से हटाया जाता है, सेवा समाप्त कर दी जाती है, अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जाती है या पदावनत किया जाता है, तो वह ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटा सकेगा।

हालांकि, जो मामले पहले से किसी अदालत या अन्य न्यायाधिकरण में लंबित हैं, उनकी सुनवाई इस ट्रिब्यूनल में नहीं होगी।

650 से अधिक मामले अदालतों में लंबित

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, झारखंड के सरकारी विश्वविद्यालयों से जुड़े करीब 650 सेवा संबंधी मामले फिलहाल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इनमें अधिकांश विवाद वेतन निर्धारण, नियुक्ति, पदोन्नति और अन्य सेवा शर्तों से जुड़े हैं।

इन मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए पहले लोक अदालत की व्यवस्था का भी सहारा लिया गया था। इसके अलावा राज्य सरकार ने सभी विश्वविद्यालयों में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की है, जो लंबित मामलों की नियमित निगरानी कर रहे हैं।

सरकार को उम्मीद है कि ट्रिब्यूनल बनने के बाद नए मामलों का समाधान तेजी से होगा और उच्च न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ भी कम होगा।

आदेश का पालन नहीं करने पर लगेगा जुर्माना

नई व्यवस्था में ट्रिब्यूनल के आदेशों को प्रभावी बनाने के लिए दंड का भी प्रावधान रखा गया है। यदि कोई विश्वविद्यालय ट्रिब्यूनल के आदेशों का पालन नहीं करता है, तो पहली बार उस पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। सामान्य परिस्थितियों में यह जुर्माना 10 हजार रुपये से कम नहीं होगा।

यदि दोबारा भी आदेशों की अनदेखी की जाती है, तो जुर्माना बढ़ाकर पांच लाख रुपये तक लगाया जा सकेगा। दूसरी बार उल्लंघन की स्थिति में न्यूनतम जुर्माना 50 हजार रुपये निर्धारित किया गया है, जब तक कि ट्रिब्यूनल अपने आदेश में कोई विशेष कारण दर्ज न करे।

कर्मचारियों और विश्वविद्यालयों दोनों को होगा फायदा

विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लंबे समय से लंबित सेवा विवादों के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। इससे कर्मचारियों को न्याय पाने में कम समय लगेगा, विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ेगी और उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या कम करने में भी मदद मिलेगी। यदि ट्रिब्यूनल प्रभावी ढंग से कार्य करता है, तो राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था में विवाद निपटारे की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक तेज और व्यवस्थित हो सकती है।

 

 

Asmita Sarkar

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