
कार्बन डाइऑक्साइड के बाद मीथेन (Methane) को वैश्विक तापवृद्धि बढ़ाने वाली सबसे प्रभावशाली ग्रीनहाउस गैसों में माना जाता है। अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी प्राकृतिक प्रक्रिया के संकेत खोजे हैं, जो भविष्य में वातावरण से मीथेन को कम करने की नई तकनीकों के विकास का रास्ता खोल सकती है। यह महत्वपूर्ण जानकारी 2022 में दक्षिण प्रशांत महासागर में हुए टोंगा के समुद्र के नीचे ज्वालामुखीय विस्फोट के अध्ययन से सामने आई है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में वातावरण में बनने वाले रासायनिक कण मीथेन को तेजी से तोड़ सकते हैं। यदि इस प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझा और नियंत्रित किया जा सके, तो यह जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियों में अहम भूमिका निभा सकती है।
नमक, राख और सूरज की रोशनी ने शुरू की रासायनिक प्रक्रिया
वैज्ञानिकों के अनुसार, टोंगा ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान बड़ी मात्रा में समुद्री नमक, राख और जलवाष्प समताप मंडल (Stratosphere) तक पहुंच गए। सूर्य की रोशनी के संपर्क में आने के बाद इन तत्वों के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया हुई, जिससे क्लोरीन परमाणु (Chlorine Atoms) बने।
यही क्लोरीन परमाणु वातावरण में मौजूद मीथेन से प्रतिक्रिया कर उसे धीरे-धीरे तोड़ने लगे। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रक्रिया पहले अटलांटिक महासागर के ऊपर भी देखी जा चुकी है, जहां सहारा रेगिस्तान से आने वाली धूल और समुद्री नमक मिलकर लोहे पर आधारित सूक्ष्म कण बनाते हैं। सूर्य की रोशनी इन कणों पर पड़ने के बाद क्लोरीन सक्रिय होता है और मीथेन को तोड़ने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
टोंगा विस्फोट के दौरान समताप मंडल में लगभग 58 हजार ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूलों के बराबर नमकीन जलवाष्प पहुंची थी। इसके साथ बड़ी मात्रा में ज्वालामुखीय राख भी वातावरण में फैली, जिसने इस रासायनिक प्रक्रिया को संभव बनाया।
एक सप्ताह से ज्यादा समय तक घटती रही मीथेन
शोधकर्ताओं ने विस्फोट के बाद बने फॉर्मल्डिहाइड (Formaldehyde) के बादल पर करीब 10 दिनों तक नजर रखी। अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक वान हर्पेन के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में फॉर्मल्डिहाइड वातावरण में केवल कुछ घंटों तक ही रहता है। लेकिन इसका लगातार दिखाई देना इस बात का संकेत था कि ज्वालामुखीय गुबार में मीथेन टूटने की प्रक्रिया एक सप्ताह से अधिक समय तक जारी रही।
अध्ययन के अनुसार, टोंगा विस्फोट से लगभग 3.3 लाख टन मीथेन वातावरण में पहुंची थी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस दौरान प्रतिदिन करीब 900 टन मीथेन प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रिया के जरिए नष्ट हो रही थी।
जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में क्यों अहम है यह खोज?
जलवायु वैज्ञानिक लंबे समय से मीथेन उत्सर्जन को कम करने के उपाय तलाश रहे हैं, क्योंकि यह गैस अल्पकाल में पृथ्वी के तापमान पर बहुत अधिक प्रभाव डालती है। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, 20 वर्षों की अवधि में मीथेन की ताप रोकने की क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में लगभग 80 गुना अधिक होती है। वैश्विक तापवृद्धि में इसका योगदान करीब एक-तिहाई माना जाता है।
हालांकि मीथेन वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड जितने लंबे समय तक नहीं रहती। यही कारण है कि यदि इसके उत्सर्जन को तेजी से कम किया जाए या इसे वातावरण से हटाने के प्रभावी तरीके विकसित किए जाएं, तो अपेक्षाकृत कम समय में वैश्विक तापवृद्धि की रफ्तार को धीमा किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
इस अध्ययन से जुड़े मैथ्यू जॉनसन का कहना है कि यह पूरी तरह अप्रत्याशित खोज है। अब तक इस तरह की रासायनिक प्रक्रिया केवल अटलांटिक महासागर के ऊपर देखी गई थी, लेकिन पहली बार इसके संकेत समताप मंडल में ज्वालामुखीय गुबार के भीतर भी मिले हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी इस प्रक्रिया पर और विस्तृत शोध की जरूरत है। यदि भविष्य में इसे सुरक्षित और नियंत्रित तरीके से अपनाने योग्य तकनीक में बदला जा सके, तो यह मीथेन उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।




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