
भारत की कृषि शिक्षा तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रही है। खेती अब केवल बीज, मिट्टी और मौसम तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसमें डेटा एनालिटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेंसर, ड्रोन और सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इसी बदलाव के साथ ऐसे कृषि स्नातकों (Agriculture Graduates) की मांग भी बढ़ी है जो डिजिटल तकनीकों और डेटा के साथ काम करने की क्षमता रखते हों।
एग्री-टेक कंपनियां, एग्रीबिजनेस, सरकारी परियोजनाएं और शोध संस्थान अब ऐसे पेशेवरों की तलाश कर रहे हैं जो डेटा का विश्लेषण कर बेहतर खेती के फैसले लेने में मदद कर सकें। यही वजह है कि देश के कई कृषि विश्वविद्यालय अपने पाठ्यक्रम में डिजिटल एग्रीकल्चर, डेटा साइंस और AI से जुड़े विषयों को शामिल कर रहे हैं।
कृषि शिक्षा में तेजी से जुड़ रही हैं नई तकनीकें
देश के कई प्रमुख संस्थान कृषि शिक्षा को आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं। IIT मंडी ने डेटा एनालिटिक्स के साथ बीटेक इन एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग शुरू किया है। वहीं ICAR-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) और शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी एग्री-इन्फॉर्मेटिक्स और AI आधारित कार्यक्रमों को आगे बढ़ा रहे हैं।
महाराष्ट्र में वसंतराव नाईक मराठवाड़ा कृषि विद्यापीठ ने IIT बॉम्बे के सहयोग से डिजिटल फार्मिंग सेंटर स्थापित किया है। इसके अलावा आनंद कृषि विश्वविद्यालय, ICAR-भारतीय कृषि सांख्यिकी अनुसंधान संस्थान (IASRI), तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU), जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान (MANAGE) भी कृषि शिक्षा में AI और डेटा आधारित तकनीकों को बढ़ावा दे रहे हैं।
अब केवल खेती का ज्ञान काफी नहीं
ICAR के पूर्व उप महानिदेशक (कृषि शिक्षा) डॉ. आर.सी. अग्रवाल के अनुसार, आज की कृषि केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि सेंसर, सैटेलाइट और सॉफ्टवेयर पर भी आधारित होती जा रही है।
उनका कहना है कि World Economic Forum की Future of Jobs Report 2025 के अनुसार वर्ष 2030 तक वर्तमान नौकरी संबंधी लगभग 39 प्रतिशत कौशल अप्रासंगिक हो सकते हैं। ऐसे में एग्री-टेक स्टार्टअप, फूड प्रोसेसिंग कंपनियां, सरकारी एजेंसियां और शोध संस्थान ऐसे युवाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं जो डेटा एकत्र करने, उसका विश्लेषण करने और उसके आधार पर निर्णय लेने में सक्षम हों।
यदि कोई छात्र IoT सेंसर से प्राप्त मिट्टी के स्वास्थ्य संबंधी डेटा को समझ सकता है, सैटेलाइट से तैयार फसल मानचित्र पढ़ सकता है या मौसम के पुराने आंकड़ों के आधार पर कीट प्रकोप का अनुमान लगा सकता है, तो उसकी रोजगार क्षमता पारंपरिक कृषि ज्ञान रखने वाले उम्मीदवारों की तुलना में कहीं अधिक होगी।
AI और Data Analytics से बढ़ेंगे करियर के अवसर
IIT मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफेसर डॉ. रंजीत कुमार झा का मानना है कि जिन छात्रों के पास कृषि के साथ डेटा एनालिटिक्स की समझ भी होगी, वे प्रिसिजन एग्रीकल्चर, कृषि मशीनरी, एग्री-इनपुट इंडस्ट्री, एग्री-फिनटेक, रिमोट सेंसिंग और क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर जैसे क्षेत्रों में बेहतर अवसर हासिल कर सकेंगे।
इसी तरह तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. वी. गीथालक्ष्मी के अनुसार भविष्य में Precision Agriculture, Agricultural Data Science, GIS एवं Remote Sensing, AI, Machine Learning, Drone Technology, Internet of Things (IoT), Climate Analytics, Digital Agriculture, Agribusiness Analytics, Agricultural Robotics, Carbon Farming और Blockchain आधारित Traceability Systems जैसे विषय रोजगार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बनने वाले हैं।
बदलाव की रफ्तार अभी समान नहीं
हालांकि कृषि शिक्षा में तकनीकी बदलाव शुरू हो चुके हैं, लेकिन सभी संस्थानों में इसकी गति समान नहीं है।
डॉ. अग्रवाल के अनुसार, PwC-FICCI की 2025 रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (UAS), बेंगलुरु के छात्रों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि 85 प्रतिशत से अधिक छात्रों ने माना कि वे डिजिटल कृषि उपकरणों का पेशेवर स्तर पर उपयोग करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। वहीं 61 से 74 प्रतिशत छात्रों ने डिजिटल तकनीकों में खुद को केवल शुरुआती स्तर का बताया।
हालांकि सकारात्मक पहलुओं में राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (NAHEP) के तहत सभी कृषि विश्वविद्यालयों में AR/VR लैब, 600 से अधिक नए पाठ्यक्रम, लगभग 80 हजार छात्रों के लिए ब्लेंडेड लर्निंग प्लेटफॉर्म और 120 से अधिक एग्री-स्टार्टअप को बढ़ावा देने जैसे कदम शामिल हैं।
सबसे बड़ी चुनौती: प्रशिक्षित फैकल्टी और आधुनिक सुविधाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि शिक्षा के आधुनिकीकरण में सबसे बड़ी चुनौती शिक्षकों को नई तकनीकों के अनुरूप प्रशिक्षित करना है। अधिकांश फैकल्टी ऐसे समय में प्रशिक्षित हुई थी जब AI और डिजिटल एग्रीकल्चर का व्यापक उपयोग नहीं था।
इसके अलावा IoT लैब, ड्रोन ट्रेनिंग सेंटर, रिमोट सेंसिंग लैब और AI आधारित सलाहकार प्लेटफॉर्म विकसित करने के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होती है, जिसे कई राज्य कृषि विश्वविद्यालय अभी वहन नहीं कर पा रहे हैं।
पुराने और नए ज्ञान का संतुलन जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि शिक्षा में बदलाव का मतलब पारंपरिक विषयों को हटाना नहीं है। कृषि विज्ञान, मृदा विज्ञान, फसल सुधार और पौध संरक्षण जैसे मूल विषय आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन विषयों के साथ AI, डेटा एनालिटिक्स, ऑटोमेशन, ड्रोन तकनीक और डिजिटल एग्रीकल्चर को भी जोड़ा जाए।
इसी दिशा में ICAR की छठी डीन समिति ने सभी कृषि स्नातक पाठ्यक्रमों में “Agricultural Informatics and Artificial Intelligence” विषय को अनिवार्य करने की सिफारिश की है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृषि, बागवानी, खाद्य प्रौद्योगिकी या मत्स्य विज्ञान जैसे किसी भी क्षेत्र का छात्र डिजिटल तकनीकों की बुनियादी समझ के साथ स्नातक बने।
एग्री-टेक सेक्टर में आकर्षक वेतन की संभावना
AI और डेटा आधारित कृषि विशेषज्ञों की मांग बढ़ने के साथ इस क्षेत्र में वेतन भी आकर्षक होता जा रहा है। उद्योग से जुड़े शुरुआती पदों पर वार्षिक 6 लाख से 12 लाख रुपये तक का पैकेज मिल सकता है, जबकि विशेष तकनीकी भूमिकाओं में इससे अधिक वेतन भी संभव है। वहीं ICAR में वैज्ञानिक पद, जूनियर रिसर्च फेलोशिप और अंतरराष्ट्रीय शोध परियोजनाएं भी बेहतर करियर और प्रतिस्पर्धी वेतन के अवसर प्रदान करती हैं।




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