
भारत को लंबे समय से अपनी बड़ी युवा आबादी के कारण “डेमोग्राफिक डिविडेंड (Demographic Dividend)” यानी जनसांख्यिकीय लाभ वाला देश माना जाता है। उम्मीद की जाती रही है कि यही युवा शक्ति 21वीं सदी में भारत की आर्थिक और सामाजिक प्रगति की सबसे बड़ी ताकत बनेगी। लेकिन वर्ष 2026 में NEET UG 2026 पेपर लीक और उसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों ने शिक्षा व्यवस्था की कई कमजोरियों को उजागर कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल परीक्षा से जुड़ा विवाद नहीं है, बल्कि इसका असर देश की उत्पादकता, कुशल मानव संसाधन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ सकता है।
NEET पेपर लीक ने बढ़ाई छात्रों की चिंता
NEET UG 2026 की परीक्षा, जो 3 मई 2026 को आयोजित होनी थी, पेपर लीक की घटना के बाद रद्द करनी पड़ी। इससे 22.8 लाख (2.28 मिलियन) से अधिक छात्र प्रभावित हुए। बाद में दोबारा परीक्षा आयोजित की गई, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया ने परीक्षा प्रणाली पर छात्रों और अभिभावकों का भरोसा कमजोर किया।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों ने विरोध प्रदर्शन किए। प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार और जवाबदेही की मांग उठाई।
इन घटनाओं ने परीक्षा पेपर लीक, मूल्यांकन में गड़बड़ियां, CBSE On-Screen Marking (OSM) से जुड़े विवाद और कई स्थानों पर बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दों को भी चर्चा में ला दिया।
युवा प्रतिभा पर पड़ सकता है असर
भारत में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 36.7 करोड़ युवा हैं। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार, 15-25 वर्ष के स्नातकों में बेरोजगारी दर लगभग 40%, जबकि 25-29 वर्ष आयु वर्ग में करीब 20% बताई गई है। वहीं 2026 की शुरुआत में 15-29 वर्ष के युवाओं की कुल बेरोजगारी दर लगभग 15-16% के आसपास रही।
ऐसे में NEET, JEE जैसी प्रमुख प्रवेश परीक्षाओं में किसी भी तरह की देरी या अनियमितता का असर केवल छात्रों पर ही नहीं, बल्कि पूरे रोजगार बाजार पर भी पड़ता है।
मेडिकल कॉलेजों में दाखिले में देरी का मतलब भविष्य में डॉक्टरों की उपलब्धता पर असर पड़ना है। इसी तरह इंजीनियरिंग और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में भी कुशल मानव संसाधन समय पर उपलब्ध नहीं हो पाता। इससे छात्रों के करियर की शुरुआत देर से होती है, उनकी संभावित आय प्रभावित होती है और अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है।
शिक्षा पर खर्च बढ़ा, लेकिन लक्ष्य अभी दूर
केंद्र और राज्य सरकारों का कुल सार्वजनिक शिक्षा व्यय अभी भी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 4.1% है, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में इसे 6% तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
हालांकि, केंद्रीय बजट 2026-27 में उच्च शिक्षा के लिए बजट बढ़ाकर करीब ₹55,730 करोड़ किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 11% अधिक है। इसके साथ ही कौशल विकास (Skill Development) कार्यक्रमों के लिए भी अतिरिक्त प्रावधान किए गए हैं।
कोचिंग उद्योग का बढ़ता प्रभाव
भारत का कोचिंग उद्योग आज लगभग ₹58,000 करोड़ का माना जाता है और अनुमान है कि वर्ष 2028-2030 तक इसका आकार ₹1.3 लाख करोड़ से ₹1.5 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।
कोटा जैसे शहर हर साल हजारों छात्रों को आकर्षित करते हैं, जहां कई परिवार बच्चों की तैयारी पर ₹25,000 से ₹50,000 प्रति माह तक खर्च करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कोचिंग उद्योग रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है, लेकिन इससे परीक्षा-केंद्रित पढ़ाई को भी बढ़ावा मिलता है। सीमित सीटों के लिए होने वाली कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण कई बार व्यावहारिक कौशल (Practical Skills) और नवाचार पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा पाता।
अर्थव्यवस्था और निवेश पर भी पड़ सकता है असर
शिक्षा व्यवस्था में लगातार सामने आने वाले विवादों का असर EdTech और शिक्षा से जुड़े अन्य क्षेत्रों में निवेश पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशक ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें पारदर्शिता, स्थिरता और भरोसा हो। यदि परीक्षा प्रणाली पर लगातार सवाल उठते हैं, तो इससे निवेशकों का विश्वास प्रभावित हो सकता है।
मेडिकल क्षेत्र में प्रवेश प्रक्रिया में देरी का असर भविष्य में डॉक्टरों की उपलब्धता पर पड़ सकता है। वहीं आईटी और सेवा क्षेत्र, जो भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में शामिल हैं, उन्हें भी उच्च गुणवत्ता वाले स्नातकों की समय पर उपलब्धता की आवश्यकता होती है।
नीतिगत सुधारों की जरूरत
हालांकि सरकार ने 2026-27 के बजट में कौशल विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और रोजगार क्षमता (Employability) पर विशेष जोर दिया है, लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा प्रणाली और उच्च शिक्षा में व्यापक सुधारों की आवश्यकता बनी हुई है।
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए AI आधारित निगरानी, ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों और मजबूत डिजिटल सुरक्षा उपायों का उपयोग किया जा सकता है।
इसके अलावा मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीटों और बुनियादी ढांचे का विस्तार, उद्योगों के साथ इंटर्नशिप आधारित शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना और शिक्षा संस्थानों के प्रदर्शन का नियमित मूल्यांकन जैसे कदम भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि कोचिंग क्षेत्र के लिए गुणवत्ता मानक तय करने, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए बेहतर सहायता व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है, ताकि शिक्षा व्यवस्था अधिक समावेशी और प्रभावी बन सके।




Add comment