
देश के 23 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) में नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 की शुरुआत हो चुकी है। हजारों छात्र वर्षों की मेहनत के बाद जेईई एडवांस जैसी कठिन परीक्षा पास कर इन संस्थानों तक पहुंचे हैं। लेकिन जब यही छात्र अपने सपनों के संस्थान में प्रवेश करते हैं और वहां उन्हें पर्याप्त शिक्षक ही नहीं मिलते, तो यह केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा गंभीर सवाल बन जाता है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि आईआईटी में 4,300 से अधिक फैकल्टी पद खाली हैं। यानी लगभग हर तीन में से एक पद रिक्त है। यह स्थिति तब है, जब सरकार लगातार आईआईटी की सीटें बढ़ाने, नए कैंपस खोलने और तकनीकी शिक्षा के विस्तार की बात कर रही है। सवाल यह है कि यदि कक्षाओं में पढ़ाने वाले शिक्षक ही पर्याप्त संख्या में नहीं होंगे, तो सीटें बढ़ाने का वास्तविक लाभ छात्रों को कैसे मिलेगा?
आईआईटी केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं हैं। उनकी पहचान उत्कृष्ट शिक्षण, अत्याधुनिक शोध, नवाचार और उद्योग से मजबूत जुड़ाव के कारण बनी है। यदि एक प्रोफेसर पर जरूरत से ज्यादा छात्रों का बोझ होगा, तो सबसे पहले असर शोध की गुणवत्ता पर पड़ेगा। इसके बाद छात्रों को मिलने वाला व्यक्तिगत मार्गदर्शन, प्रयोगशालाओं का संचालन, पीएचडी सुपरविजन और नए अनुसंधान की गति भी प्रभावित होगी।
इस पूरी तस्वीर का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि समस्या केवल नए आईआईटी तक सीमित नहीं है। आईआईटी खड़गपुर, आईआईटी कानपुर, आईआईटी बॉम्बे और आईआईटी गुवाहाटी जैसे पुराने और प्रतिष्ठित संस्थान भी बड़ी संख्या में रिक्त पदों से जूझ रहे हैं। ये वही संस्थान हैं, जिन्होंने भारत को वैश्विक स्तर के वैज्ञानिक, इंजीनियर और उद्यमी दिए हैं। यदि यहां भी शिक्षकों की कमी बनी रहती है, तो यह आने वाले वर्षों में देश की तकनीकी क्षमता पर असर डाल सकती है।
सरकार का तर्क है कि योग्य उम्मीदवार पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं हैं। इसमें कुछ सच्चाई भी है। विश्वस्तरीय शोध करने वाले भारतीय वैज्ञानिकों और शिक्षकों का बड़ा वर्ग विदेशों के विश्वविद्यालयों में कार्यरत है। वहीं निजी विश्वविद्यालय भी अब बेहतर वेतन, आधुनिक शोध सुविधाएं और अधिक लचीला कार्य वातावरण देकर प्रतिभाओं को आकर्षित कर रहे हैं। ऐसे में केवल भर्ती विज्ञापन जारी कर देना समाधान नहीं हो सकता।
अब जरूरत यह है कि सरकार और आईआईटी मिलकर फैकल्टी भर्ती की पूरी प्रक्रिया पर नए सिरे से विचार करें। भर्ती प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाए। उत्कृष्ट शोध करने वाले भारतीय वैज्ञानिकों को वापस लाने के लिए आकर्षक पैकेज और रिसर्च ग्रांट उपलब्ध कराए जाएं। युवा पीएचडी शोधार्थियों को अकादमिक करियर चुनने के लिए बेहतर अवसर दिए जाएं। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर के शिक्षकों को भी भारतीय संस्थानों में पढ़ाने के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया जाए।
एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हम केवल रैंकिंग और सीटों की संख्या बढ़ाने की दौड़ में गुणवत्ता को पीछे छोड़ रहे हैं? विश्वविद्यालयों की असली पहचान उनकी इमारतों, बजट या छात्र संख्या से नहीं, बल्कि उनके शिक्षकों और शोध की गुणवत्ता से बनती है। यदि फैकल्टी की कमी लगातार बनी रहती है, तो विश्वस्तरीय बनने का दावा केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।
भारत आज वैश्विक तकनीकी शक्ति बनने की बात कर रहा है। सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष विज्ञान और रक्षा तकनीक जैसे क्षेत्रों में नेतृत्व की आकांक्षा तभी पूरी होगी, जब देश के सर्वोच्च तकनीकी संस्थानों में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक मौजूद हों। केवल नई सीटें जोड़ने से भविष्य नहीं बनता, उसे गढ़ने के लिए प्रेरित करने वाले शिक्षक भी चाहिए।
आज आईआईटी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इमारतें खड़ी करना नहीं, बल्कि उन कक्षाओं को योग्य शिक्षकों से भरना है। यदि इस दिशा में गंभीर और त्वरित कदम नहीं उठाए गए, तो भारत के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों की चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ सकती है। और तब नुकसान केवल आईआईटी का नहीं, बल्कि उस युवा भारत का होगा, जो इन्हीं संस्थानों से अपने भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीदें जोड़कर बैठा है।




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