
हल्के और मजबूत कंपोजिट मटेरियल आज आधुनिक इंजीनियरिंग का अहम हिस्सा बन चुके हैं। एयरोस्पेस, ऑटोमोबाइल, नवीकरणीय ऊर्जा और परिवहन जैसे क्षेत्रों में इनका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। उद्योगों की मांग ऐसे मटेरियल की है जो कम वजन के साथ अधिक मजबूती और लंबी उम्र प्रदान कर सकें। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए शोध संस्थान फाइबर-प्रबलित कंपोजिट (Fibre-Reinforced Composites) की संरचनात्मक क्षमता बढ़ाने और उनके निर्माण को औद्योगिक स्तर पर अधिक व्यावहारिक बनाने पर काम कर रहे हैं।
इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने फाइबर-रिइन्फोर्स्ड पॉलिमर (FRP) कंपोजिट की मजबूती और टिकाऊपन बढ़ाने वाली एक नई निर्माण तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट (पेटेंट संख्या 596943) प्राप्त किया है। यह तकनीक संस्थान के धातुकर्म एवं सामग्री अभियांत्रिकी विभाग की FRP कंपोजिट लैब में किए गए संयुक्त शोध का परिणाम है।
इस शोध दल में NIT राउरकेला के सहायक प्रोफेसर डॉ. राजेश कुमार प्रुस्ती, प्रोफेसर प्रो. बंकिम चंद्र रे और शोधार्थी परिमल जाना शामिल हैं। इनके साथ मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MNIT) जयपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग से डॉ. दिनेश कुमार राठौड़ ने भी योगदान दिया है।
FRP कंपोजिट का उपयोग आज वाणिज्यिक विमानों, रक्षा उपकरणों, अंतरिक्ष प्रक्षेपण यानों, हाई-स्पीड रेल प्रणालियों, नवीकरणीय ऊर्जा ढांचे और हाइड्रोजन भंडारण टैंकों में व्यापक रूप से किया जाता है। इसकी प्रमुख वजह इनका उच्च शक्ति-से-वजन अनुपात, जंग से बचाव की क्षमता और लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन है। हालांकि, पारंपरिक FRP कंपोजिट पर अधिक भार पड़ने की स्थिति में इनके अंदर दरारें या परतों के अलग होने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जिससे इनकी दीर्घकालिक क्षमता प्रभावित होती है।
इस चुनौती का समाधान खोजते हुए शोधकर्ताओं ने एक त्रि-आयामी (3D) प्रबलित कंपोजिट विकसित किया है, जिसमें ग्लास फाइबर और ग्राफीन नैनोप्लेटलेट्स को निर्माण प्रक्रिया के दौरान सामग्री की मोटाई के भीतर विशेष तरीके से व्यवस्थित किया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे सामग्री की आंतरिक संरचना अधिक मजबूत बनती है और फाइबर, ग्राफीन तथा एपॉक्सी मैट्रिक्स एक-दूसरे के साथ बेहतर तालमेल में कार्य करते हैं।
पेटेंट प्राप्त इस तकनीक में बिना संशोधित ग्राफीन नैनोप्लेटलेट्स का उपयोग किया गया है, जिन्हें ग्लास फाइबर-प्रबलित एपॉक्सी कंपोजिट के भीतर एक संशोधित निर्माण प्रक्रिया के जरिए व्यवस्थित किया जाता है। क्योरिंग प्रक्रिया के दौरान 800 वोल्ट पर मानक 50 हर्ट्ज़ एसी विद्युत क्षेत्र लागू किया जाता है। इससे यह तकनीक वर्तमान में प्रचलित कंपोजिट निर्माण प्रणालियों के साथ भी आसानी से उपयोग की जा सकती है।
तकनीक के संभावित उपयोगों के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. राजेश कुमार प्रुस्ती ने कहा कि यह सामग्री उन इंजीनियरिंग उत्पादों में उपयोगी हो सकती है, जहां हल्के वजन के साथ क्षति-सहनशीलता की आवश्यकता होती है। इनमें विमान के पैनल, वाहन सुरक्षा संरचनाएं, पवन ऊर्जा टरबाइन ब्लेड, प्रेशर वेसल और समुद्री ढांचे शामिल हैं।
ASTM मानकों के अनुसार किए गए प्रयोगशाला परीक्षणों में इस नई तकनीक से बने कंपोजिट में कई यांत्रिक गुणों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। परीक्षणों में तन्य शक्ति (Tensile Strength) में 37 प्रतिशत, फ्लेक्सुरल स्ट्रेंथ में 30 प्रतिशत, फ्लेक्सुरल मॉड्यूलस में 63 प्रतिशत, तन्य मॉड्यूलस में 26 प्रतिशत और इंटरलैमिनर शीयर स्ट्रेंथ में 24 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। इसके अलावा फ्रैक्चर टफनेस के विभिन्न मानकों में भी महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किया गया, जबकि 40 डिग्री सेल्सियस पर स्टोरेज मॉड्यूलस में 55 प्रतिशत तक बढ़ोतरी पाई गई।
इस उपलब्धि के महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रो. बंकिम चंद्र रे ने कहा कि कम वजन के साथ अधिक टिकाऊ सामग्री विकसित होने से रखरखाव की जरूरत घट सकती है, ऊर्जा दक्षता बढ़ सकती है और अधिक टिकाऊ विनिर्माण प्रक्रियाओं को बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने कहा कि यह तकनीक उन्नत सामग्री के क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता को भी मजबूती देने की क्षमता रखती है।
औद्योगिक उपयोग के अलावा यह उपलब्धि उच्च शिक्षण संस्थानों की उस महत्वपूर्ण भूमिका को भी दर्शाती है, जिसके माध्यम से बहु-विषयक सहयोग के जरिए नई सामग्री प्रौद्योगिकियों का विकास किया जा रहा है। पेटेंट मिलने के बाद शोधकर्ता अब इस सामग्री का बड़े संरचनात्मक घटकों में परीक्षण करेंगे, इसकी दीर्घकालिक पर्यावरणीय टिकाऊपन का मूल्यांकन करेंगे और उद्योगों के साथ साझेदारी एवं तकनीक लाइसेंसिंग की संभावनाओं पर काम करेंगे, ताकि भविष्य में इसका व्यावसायिक उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।




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