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Engineering Admission 2026: 23 Tamil Nadu Colleges Record Zero Admissions, 1.06 Lakh BTech Seats Still Vacant

तमिलनाडु के 23 इंजीनियरिंग कॉलेजों में जीरो एडमिशन, 1.06 लाख सीटें खाली; CSE भी नहीं भर पाई

Engineering Admission 2026: 23 Tamil Nadu Colleges Record Zero Admissions, 1.06 Lakh BTech Seats Still Vacant

JoSAA काउंसलिंग खत्म होने के बाद राज्यों में इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले की प्रक्रिया जारी है। इसी बीच तमिलनाडु इंजीनियरिंग एडमिशन (TNEA) 2026 के दूसरे राउंड के बाद सामने आए आंकड़ों ने इंजीनियरिंग शिक्षा को लेकर एक अहम सवाल खड़ा किया है। राज्य में बड़ी संख्या में BTech सीटें अब भी खाली हैं और कुछ कॉलेज ऐसे हैं जहां दूसरे राउंड तक एक भी छात्र ने दाखिला नहीं लिया।

उपलब्ध TNEA 2026 आंकड़ों के अनुसार दूसरे राउंड के बाद 23 इंजीनियरिंग कॉलेजों में शून्य एडमिशन दर्ज हुआ है। वहीं करीब 1.06 लाख BTech सीटें खाली हैं। इनमें कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग (CSE) और इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग (ECE) जैसी लोकप्रिय ब्रांच की सीटें भी शामिल हैं।

हालांकि TNEA की आगे की काउंसलिंग प्रक्रिया में इन सीटों पर दाखिले हो सकते हैं, लेकिन दूसरे राउंड के बाद इतनी बड़ी संख्या में सीटों का खाली रहना इंजीनियरिंग शिक्षा में बदलती छात्र पसंद और कॉलेजों की स्थिति की ओर इशारा करता है।

167 कॉलेजों में 10 फीसदी से भी कम सीटें भरीं

TNEA 2026 के दूसरे राउंड के बाद 167 इंजीनियरिंग कॉलेजों में 10 फीसदी से कम सीटें भरने की स्थिति सामने आई है। 23 कॉलेजों में तो अभी तक कोई दाखिला नहीं हुआ।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तमिलनाडु देश के प्रमुख इंजीनियरिंग शिक्षा केंद्रों में शामिल है। राज्य में बड़ी संख्या में सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी इंजीनियरिंग संस्थान हैं और छात्रों के लिए अलग-अलग ब्रांच में बड़ी संख्या में सीटें उपलब्ध रहती हैं।

दूसरे राउंड के बाद करीब 1.06 लाख सीटों का खाली रहना यह बताता है कि सिर्फ सीटें उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। छात्र अब कॉलेज की गुणवत्ता, फीस, लोकेशन, प्लेसमेंट और ब्रांच की भविष्य की संभावनाओं को पहले से ज्यादा महत्व दे रहे हैं।

CSE और ECE जैसी लोकप्रिय ब्रांच में भी सीटें खाली

इंजीनियरिंग में कंप्यूटर साइंस और इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी ब्रांच लंबे समय से छात्रों की पहली पसंद रही हैं। लेकिन TNEA 2026 के दूसरे राउंड के आंकड़ों में इन ब्रांचों में भी बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने की बात सामने आई है।

आंकड़ों के अनुसार दूसरे राउंड तक CSE की करीब 17 हजार सीटों पर दाखिला हुआ, जबकि लगभग 19 हजार सीटें अभी खाली थीं। इसी तरह ECE में करीब 12 हजार सीटें भरीं, जबकि 13 हजार से ज्यादा सीटें खाली रहीं।

यह बदलाव इंजीनियरिंग एडमिशन के पुराने ट्रेंड से अलग दिखाई देता है, जहां CSE जैसी ब्रांच को लेकर छात्रों में काफी ज्यादा मांग रहती थी। हालांकि इन आंकड़ों को अंतिम प्रवेश स्थिति नहीं माना जा सकता, क्योंकि TNEA की आगे की काउंसलिंग और सीट आवंटन के बाद तस्वीर बदल सकती है।

देश में भी लंबे समय से खाली रह रही हैं इंजीनियरिंग सीटें

इंजीनियरिंग सीटों का खाली रहना सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित समस्या नहीं है। केंद्र सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि देश के इंजीनियरिंग संस्थानों में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में सीटें खाली रही हैं।

शिक्षा मंत्रालय ने दिसंबर 2022 में राज्यसभा में बताया था कि 2021-22 में AICTE से मंजूर 12,53,337 अंडरग्रेजुएट इंजीनियरिंग सीटों में से 4,21,203 सीटें खाली रह गई थीं। यानी करीब 33.6 फीसदी सीटों पर दाखिला नहीं हुआ।

हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि खाली सीटों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में कम हुई थी। 2017-18 में 7,22,112, 2018-19 में 6,78,932, 2019-20 में 5,87,314 और 2020-21 में 5,66,538 इंजीनियरिंग सीटें खाली रही थीं।

इसलिए उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के आधार पर यह कहना ज्यादा सही होगा कि भारत में इंजीनियरिंग सीटों की समस्या गंभीर जरूर रही है, लेकिन हर साल इंजीनियरिंग में छात्रों की रुचि लगातार गिर रही है, ऐसा निष्कर्ष केवल इन आंकड़ों से नहीं निकाला जा सकता।

आखिर इंजीनियरिंग की सीटें खाली क्यों रह जाती हैं?

इंजीनियरिंग सीटों के खाली रहने के पीछे एक ही कारण नहीं है। शिक्षा मंत्रालय ने भी संसद में बताया था कि सीटों का भरना मांग और उपलब्ध सीटों के बीच संतुलन, कॉलेज की लोकेशन, शैक्षणिक और इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाओं तथा प्लेसमेंट के अवसरों पर निर्भर करता है।

कई निजी कॉलेजों में फीस छात्रों और परिवारों के लिए बड़ा मुद्दा बनती है। अगर किसी कॉलेज की फीस ज्यादा है लेकिन प्लेसमेंट और पढ़ाई के अवसर अपेक्षा के मुताबिक नहीं हैं, तो छात्र दूसरे विकल्प चुन सकते हैं।

इसी तरह छोटे शहरों या दूरदराज के इलाकों में स्थित संस्थानों को भी छात्रों को आकर्षित करने में ज्यादा चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। आज छात्र सिर्फ BTech की डिग्री नहीं देख रहे, बल्कि डिग्री के बाद मिलने वाली नौकरी और आगे की पढ़ाई के रास्ते भी देख रहे हैं।

CSE की बढ़ती मांग ने दूसरी ब्रांच पर डाला असर

पिछले कुछ वर्षों में कंप्यूटर साइंस, AI, डेटा साइंस और दूसरी टेक्नोलॉजी आधारित पढ़ाई की मांग बढ़ी है। इसका असर पारंपरिक इंजीनियरिंग ब्रांचों पर भी पड़ा है।

कई छात्र इलेक्ट्रिकल, सिविल, मैकेनिकल या दूसरी ब्रांच की तुलना में कंप्यूटर और टेक्नोलॉजी से जुड़े पाठ्यक्रमों को प्राथमिकता देते हैं। इसका एक कारण IT और डिजिटल सेक्टर में मिलने वाले रोजगार के अवसरों की धारणा भी है।

हालांकि सिर्फ CSE में दाखिला लेना ही बेहतर करियर की गारंटी नहीं है। कॉलेज की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम, छात्रों के कौशल, इंटर्नशिप और उद्योग से जुड़ाव भी रोजगार की संभावनाओं को प्रभावित करते हैं।

प्लेसमेंट भी बन रहा है बड़ा फैक्टर

आज इंजीनियरिंग में दाखिला लेते समय छात्र और अभिभावक सबसे ज्यादा जिन बातों पर ध्यान देते हैं, उनमें प्लेसमेंट भी शामिल है। अगर किसी ब्रांच में रोजगार के अवसर कम दिखाई देते हैं तो छात्र उसमें दाखिला लेने से बच सकते हैं।

सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि कॉलेज की प्लेसमेंट क्षमता और रोजगार के अवसर छात्रों के दाखिले के फैसले को प्रभावित करते हैं।

हालांकि अलग-अलग रिपोर्टों में प्लेसमेंट के आंकड़े अलग हो सकते हैं और उन्हें सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों पर लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए किसी कॉलेज में दाखिला लेने से पहले सिर्फ विज्ञापन में दिए गए प्लेसमेंट प्रतिशत के बजाय पिछले वर्षों की वास्तविक प्लेसमेंट रिपोर्ट, भर्ती करने वाली कंपनियों और औसत पैकेज की जानकारी देखना बेहतर है।

AI के दौर में बदल रही है इंजीनियरिंग की तस्वीर

Artificial Intelligence और ऑटोमेशन ने भी इंजीनियरिंग शिक्षा और रोजगार की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है। कंपनियों में कई तरह के काम अब नई तकनीकों के साथ तेजी से बदल रहे हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि इंजीनियरिंग की जरूरत खत्म हो रही है। बल्कि छात्रों के लिए जरूरी हो गया है कि वे डिग्री के साथ नई तकनीक, प्रोग्रामिंग, डेटा, साइबर सिक्योरिटी, ऑटोमेशन या अपने क्षेत्र से जुड़े दूसरे जरूरी कौशल भी सीखें।

यही वजह है कि इंजीनियरिंग कॉलेजों के सामने भी अपने पाठ्यक्रम और उद्योग से जुड़ी पढ़ाई को समय के साथ बदलने की चुनौती है।

इंजीनियरिंग कॉलेजों की बढ़ी संख्या भी एक कारण

भारत में इंजीनियरिंग शिक्षा के विस्तार के दौरान बड़ी संख्या में नए कॉलेज और सीटें शुरू की गईं। बाद में जब छात्रों की मांग और रोजगार बाजार में बदलाव आया, तो सभी संस्थानों के लिए पर्याप्त संख्या में छात्रों को आकर्षित करना आसान नहीं रहा।

AICTE के आंकड़ों में भी पिछले वर्षों में स्वीकृत इंजीनियरिंग सीटों की संख्या में कमी दिखाई देती है। 2017-18 में 14,65,873 स्वीकृत सीटों के मुकाबले 2021-22 में यह संख्या घटकर 12,53,337 रह गई थी।

AICTE की ओर से गठित BVR मोहन रेड्डी समिति ने भी इंजीनियरिंग शिक्षा में नई क्षमता बढ़ाने और मौजूदा संस्थानों की स्थिति की समीक्षा से जुड़े सुझाव दिए थे। सरकार ने बाद में नए संस्थानों और सीटों की जरूरत को मांग के आधार पर देखने की दिशा में कदम उठाए।

छात्रों के लिए क्या है संदेश?

TNEA 2026 के दूसरे राउंड के आंकड़े इंजीनियरिंग शिक्षा में एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर संकेत करते हैं। अब छात्रों के लिए सिर्फ BTech में दाखिला लेना लक्ष्य नहीं रह गया है। वे यह भी देख रहे हैं कि किस कॉलेज में पढ़ाई की गुणवत्ता कैसी है, फीस कितनी है, प्लेसमेंट कितना मजबूत है और चुनी गई ब्रांच से आगे किस तरह के करियर विकल्प मिल सकते हैं।

तमिलनाडु में अभी काउंसलिंग के आगे के चरण बाकी हैं, इसलिए 1.06 लाख खाली सीटों को अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता। आने वाले राउंड में सीटों की स्थिति बदल सकती है।

लेकिन 23 कॉलेजों में शून्य एडमिशन और 167 कॉलेजों में 10 फीसदी से कम सीटें भरना कॉलेजों और नीति निर्माताओं दोनों के लिए एक साफ संकेत है—इंजीनियरिंग शिक्षा में अब सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने के बजाय गुणवत्ता, फीस, उद्योग से जुड़ाव और रोजगार के अवसरों पर ज्यादा ध्यान देना होगा।

 

 

Asmita Sarkar

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