
Viksit Bharat 2047: भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने के लक्ष्य के बीच नीति आयोग ने देश की स्किलिंग व्यवस्था में बड़े बदलाव का सुझाव दिया है। ‘Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047’ नाम से जारी रिपोर्ट में आयोग ने कहा है कि रोजगार से जुड़े कौशल की शुरुआत स्कूल स्तर से ही होनी चाहिए। रिपोर्ट 18 अगस्त 2026 को जारी की गई है।
नीति आयोग का मानना है कि बच्चों को केवल पारंपरिक अकादमिक विषयों तक सीमित रखने के बजाय स्कूल में ही उन्हें रोजगार, करियर और उद्यमिता से जुड़े जरूरी कौशल से परिचित कराया जाना चाहिए। इसके लिए रिपोर्ट में कक्षा 6 से 12 तक सभी विद्यार्थियों के लिए General Employability and Entrepreneurship Skills (GEES) शुरू करने और कक्षा 9 से ‘Kaushal Tracks’ यानी व्यवस्थित व्यावसायिक रास्ते उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है।
कक्षा 6 से क्या सीखेंगे छात्र?
नीति आयोग के प्रस्ताव के अनुसार, कक्षा 6 से विद्यार्थियों को सामान्य रोजगार और उद्यमिता कौशल सिखाए जा सकते हैं। इनमें संवाद कौशल, काम से जुड़ी अंग्रेजी, डिजिटल बेसिक्स, वित्तीय समझ, टीम में काम करना, समस्या का समाधान और उद्यमिता जैसे विषय शामिल हो सकते हैं।
रिपोर्ट में साफ किया गया है कि कक्षा 6 से 8 के दौरान बच्चों को किसी एक पेशे में जल्दी विशेषज्ञ बनाने के बजाय अलग-अलग काम और कौशल से परिचित कराने पर जोर होना चाहिए। इसके लिए प्रोजेक्ट आधारित पढ़ाई, स्थानीय उद्योगों के दौरे और जहां संभव हो वहां स्कूल स्तर पर व्यावसायिक लैब का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसका मकसद बच्चों को कम उम्र में किसी एक करियर में बांधना नहीं, बल्कि उन्हें आगे की पढ़ाई और करियर से जुड़े फैसले लेने के लिए बेहतर जानकारी और जरूरी कौशल देना है।
कक्षा 9 से शुरू हो सकते हैं ‘Kaushal Tracks’
नीति आयोग ने कक्षा 9 से Kaushal Tracks शुरू करने का सुझाव दिया है। ये ऐसे व्यवस्थित व्यावसायिक रास्ते होंगे, जिनमें विद्यार्थी अपनी रुचि और स्थानीय या राष्ट्रीय स्तर पर रोजगार की मांग के अनुसार किसी क्षेत्र में आगे बढ़ सकेंगे।
रिपोर्ट के अनुसार, कक्षा 9 और 10 में सामान्य रोजगार और उद्यमिता कौशल सभी छात्रों के लिए जारी रह सकते हैं। इसके साथ चयनित बड़े माध्यमिक स्कूलों को Vocational Integrated Schools के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इनमें स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग कौशल क्षेत्र उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि विद्यार्थी स्कूल से निकलते समय केवल सैद्धांतिक ज्ञान लेकर न जाएं, बल्कि उनके पास किसी काम से जुड़े व्यावहारिक कौशल भी हों।
अभी भी सीमित है स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा का विस्तार
नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और National Curriculum Framework (NCF) में कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा और रोजगार कौशल को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने का मार्ग दिया गया है। लेकिन इसका वास्तविक विस्तार अभी सीमित है।
रिपोर्ट के अनुसार, माध्यमिक स्तर के 12 स्कूलों में एक से भी कम स्कूल में व्यावसायिक विषय उपलब्ध हैं। यानी नीति में प्रावधान होने के बावजूद बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को स्कूल स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा का अवसर अभी नहीं मिल रहा है।
यही अंतर नीति आयोग के प्रस्तावित सुधारों की बड़ी वजहों में से एक है। आयोग का जोर केवल नई नीति बनाने पर नहीं, बल्कि स्कूलों में उसकी प्रभावी पहुंच और स्थानीय जरूरत के अनुसार लागू करने पर है।
बोर्ड परीक्षाओं में व्यावसायिक विषयों को बराबर महत्व देने का सुझाव
नीति आयोग ने कक्षा 10 और 12 की बोर्ड परीक्षा व्यवस्था को लेकर भी सुझाव दिए हैं। रिपोर्ट में व्यावसायिक विषयों को बोर्ड स्तर पर अधिक महत्व देने और उन्हें सामान्य विषयों के साथ उचित मान्यता देने की दिशा में बदलाव की बात कही गई है।
रिपोर्ट के प्रस्तावित मॉडल में कक्षा 11 और 12 के विद्यार्थियों के लिए भी सामान्य रोजगार और उद्यमिता कौशल जारी रखने की बात कही गई है। इससे स्कूल शिक्षा और आगे के रोजगार के बीच की दूरी कम करने की कोशिश की जाएगी।
हालांकि, ये नीति आयोग की सिफारिशें हैं। इन्हें अपने आप देशभर में लागू किया गया नया नियम नहीं माना जाना चाहिए। इनके आधार पर आगे संबंधित मंत्रालयों और राज्यों द्वारा फैसले लिए जाने होंगे।
कॉलेजों में भी उद्योग से जुड़ी पढ़ाई पर जोर
नीति आयोग ने केवल स्कूल शिक्षा में बदलाव की बात नहीं की है। रिपोर्ट में उच्च शिक्षा को भी रोजगार की बदलती जरूरतों से जोड़ने की जरूरत बताई गई है।
आयोग के अनुसार, कई उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम अभी भी सामान्य प्रकृति के हैं और उन्हें उद्योग की बदलती जरूरतों के साथ बेहतर तरीके से जोड़ने की जरूरत है। इसके लिए Public-Private Partnership (PPP), उद्योग की भागीदारी और काम के साथ पढ़ाई वाले कार्यक्रमों को बढ़ाने का सुझाव दिया गया है।
रिपोर्ट में डिग्री और डिप्लोमा स्तर पर अप्रेंटिसशिप तथा work-integrated learning को बढ़ाने की भी बात कही गई है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ वास्तविक कार्यस्थल का अनुभव देना है।
Green Industry और EV जैसे क्षेत्रों पर फोकस
नीति आयोग ने भविष्य की स्किलिंग को रोजगार की मांग से जोड़ने पर जोर दिया है। तेजी से बदलती तकनीक और अर्थव्यवस्था के कारण कुछ नए रोजगार क्षेत्र तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि कुछ पुराने कामों की मांग घट सकती है।
रिपोर्ट में ग्रीन इंडस्ट्री, इलेक्ट्रिक वाहन और दूसरे उभरते क्षेत्रों में युवाओं को तैयार करने की जरूरत बताई गई है। इसके साथ उन क्षेत्रों में reskilling और upskilling की व्यवस्था मजबूत करने की बात भी कही गई है जहां भविष्य में रोजगार की मांग कम हो सकती है।
आयोग का सुझाव है कि कम अवधि के मॉड्यूलर कोर्स, अप्रेंटिसशिप और काम के साथ पढ़ाई जैसे विकल्प बढ़ाए जाएं, ताकि युवा अपनी जरूरत के अनुसार कौशल हासिल कर सकें।
अप्रेंटिसशिप को मुख्य करियर विकल्प बनाने की सिफारिश
रिपोर्ट में अप्रेंटिसशिप को शिक्षा और नौकरी के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बताया गया है। नीति आयोग का कहना है कि इसे केवल ट्रेनिंग की एक व्यवस्था के तौर पर नहीं, बल्कि मुख्य और भरोसेमंद करियर विकल्प के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
देश में National Apprenticeship Promotion Scheme (NAPS) और National Apprenticeship Training Scheme (NATS) जैसी योजनाएं पहले से चल रही हैं। इसके बावजूद आयोग के अनुसार अवसरों की जानकारी, उपलब्धता और अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बीच समन्वय में अभी सुधार की जरूरत है।
रिपोर्ट में छोटे और मझोले उद्योगों को अप्रेंटिसशिप के ज्यादा अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रोत्साहन देने, राज्य स्तर पर एकीकृत प्लेटफॉर्म तैयार करने और विद्यार्थियों को भरोसेमंद अवसरों की जानकारी आसानी से उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है।
7.67 करोड़ से ज्यादा लोगों को ट्रेनिंग, लेकिन सिर्फ संख्या काफी नहीं
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 2014-15 से अब तक 7.67 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया गया है। वित्त वर्ष 2025-26 के केंद्रीय बजट में विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों के माध्यम से स्किलिंग से जुड़े खर्च के लिए 34,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।
लेकिन आयोग ने यह भी कहा है कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कितने लोगों को ट्रेनिंग दी गई। असली सवाल यह है कि ट्रेनिंग के बाद कितने लोगों को नौकरी मिली, उनकी कमाई में कितना बदलाव आया और सीखे गए कौशल की बाजार में वास्तविक मांग कितनी है।
यानी भविष्य की स्किलिंग व्यवस्था में training की संख्या के बजाय employment और income जैसे परिणामों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होगी।
राज्यों की भूमिका होगी अहम
नीति आयोग ने माना है कि देशभर में स्किलिंग व्यवस्था को बदलने में राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। अलग-अलग राज्यों में उद्योग, रोजगार, शिक्षा व्यवस्था और स्थानीय जरूरतें अलग हैं। इसलिए एक ही मॉडल को हर जगह लागू करने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसे अपनाने की जरूरत होगी।
रिपोर्ट में जिला स्तर पर बेहतर योजना और जवाबदेही की दिशा में काम करने की बात भी कही गई है। इसका मतलब है कि स्किलिंग को केवल बड़े शहरों और चुनिंदा संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय स्तर पर रोजगार की जरूरतों से जोड़ने की कोशिश की जाएगी।
छात्रों के लिए क्या बदल सकता है?
अगर नीति आयोग की ये सिफारिशें लागू होती हैं, तो आने वाले वर्षों में स्कूल के विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ रोजगार और उद्यमिता से जुड़े कौशल सीखने के ज्यादा अवसर मिल सकते हैं। कक्षा 6 से सामान्य रोजगार कौशल और कक्षा 9 से व्यवस्थित व्यावसायिक रास्तों की व्यवस्था विद्यार्थियों को करियर के बारे में पहले से सोचने में मदद कर सकती है।
हालांकि, इसका सफल होना केवल पाठ्यक्रम बदलने पर निर्भर नहीं करेगा। इसके लिए प्रशिक्षित शिक्षक, अच्छी लैब, उद्योग से जुड़ी ट्रेनिंग, अप्रेंटिसशिप के पर्याप्त अवसर और विद्यार्थियों को सही करियर गाइडेंस देना भी जरूरी होगा।
नीति आयोग की नई रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यही है कि विकसित भारत के लिए केवल ज्यादा लोगों को ट्रेनिंग देना पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षा, कौशल और रोजगार को एक-दूसरे से जोड़ना होगा, ताकि युवा पढ़ाई पूरी करने के बाद वास्तविक काम की दुनिया के लिए तैयार हों।




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