
SFI School Bachao Andolan: स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने सरकारी स्कूलों की स्थिति और स्कूली शिक्षा में सरकारी निवेश को लेकर देशव्यापी अभियान तेज करने का ऐलान किया है। संगठन ने अगले तीन महीनों यानी अगस्त, सितंबर और अक्टूबर में ‘स्कूल बचाओ आंदोलन’ चलाने की घोषणा की है। इसके तहत सरकारी स्कूलों की स्थिति का जायजा लेने, छात्रों और स्थानीय लोगों को जोड़ने तथा स्कूलों को दोबारा खोलने की मांग को लेकर प्रदर्शन और जनसभाएं आयोजित की जाएंगी।
SFI ने दिल्ली के HKS सुरजीत भवन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में अभियान की जानकारी दी। संगठन का कहना है कि सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी, शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं की समस्या का सबसे ज्यादा असर कमजोर आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों पर पड़ सकता है।
SFI का दावा: एक दशक में 94 हजार सरकारी स्कूल बंद
SFI ने UDISE+ के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया है कि पिछले एक दशक में देश में 94,000 सरकारी स्कूल बंद हुए, जबकि इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या करीब 40,000 बढ़ी। संगठन के मुताबिक, इस दौरान सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में 85.86 लाख की कमी आई, जबकि निजी स्कूलों में 88.27 लाख छात्रों की बढ़ोतरी हुई।
हालांकि, इन आंकड़ों को SFI के दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। शिक्षा मंत्रालय के UDISE+ 2024-25 आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 14,71,473 स्कूल हैं, जिनमें 10,13,322 सरकारी और 3,39,583 निजी मान्यता प्राप्त स्कूल हैं। 2017-18 में सरकारी स्कूलों की संख्या 10,94,543 थी। यानी UDISE+ के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2017-18 से 2024-25 के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या में 81,221 की कमी आई है।
इसलिए ‘एक दशक में 94 हजार स्कूल बंद’ के आंकड़े को सीधे सरकारी रिकॉर्ड का अंतिम आंकड़ा बताने के बजाय SFI द्वारा UDISE डेटा के आधार पर किया गया दावा कहना ज्यादा सही होगा।
1 लाख से ज्यादा स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक
सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता भी अभियान का बड़ा मुद्दा है। SFI ने कहा है कि देश में 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक है और इन स्कूलों में करीब 29 लाख छात्र पढ़ते हैं।
UDISE+ के आंकड़ों में भी 1,00,843 सिंगल-टीचर स्कूलों में 29 लाख से अधिक छात्रों के नामांकन की जानकारी सामने आती है। इसका मतलब है कि इन स्कूलों में एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं और विषयों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ सकती है।
यह समस्या केवल शिक्षकों की संख्या तक सीमित नहीं है। सरकारी और निजी स्कूलों के बीच इंटरनेट, कंप्यूटर और दूसरी सुविधाओं को लेकर भी अंतर मौजूद है। UDISE+ 2024-25 के अनुसार देश के करीब 67.4 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट सुविधा और 69.9 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर उपलब्ध हैं।
शिक्षा पर GDP का 6 फीसदी खर्च करने की मांग
SFI ने केंद्र सरकार से शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की मांग की है। संगठन चाहता है कि शिक्षा पर सरकारी खर्च GDP का 6 प्रतिशत किया जाए और सालाना बजट में शिक्षा के लिए 10 प्रतिशत हिस्सा तय किया जाए। SFI ने स्कूली शिक्षा को इसमें प्राथमिकता देने की मांग की है।
इसके अलावा संगठन ने बंद किए गए सरकारी स्कूलों को फिर से खोलने, स्कूलों में बेहतर कक्षाएं, प्रयोगशालाएं, लाइब्रेरी, खेल सुविधाएं और शौचालय उपलब्ध कराने तथा सभी विषयों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती करने की मांग की है। SFI ने छात्र-शिक्षक अनुपात 1:20 रखने की भी मांग की है।
NEP 2020 को रद्द करने की भी मांग
SFI ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को वापस लेने की मांग भी दोहराई है। संगठन का आरोप है कि नीति के तहत सरकारी स्कूलों के विलय और बंद होने की स्थिति को बढ़ावा मिला है।
हालांकि, यह SFI का राजनीतिक और नीतिगत मत है। NEP 2020 को लेकर सरकार का पक्ष अलग है और नीति का आधिकारिक उद्देश्य स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता, पहुंच, सीखने के परिणाम और व्यावसायिक शिक्षा को मजबूत करना है। इसलिए स्कूलों के बंद होने या विलय को केवल NEP 2020 से जोड़ने के दावे को अलग-अलग राज्यों की नीतियों और प्रशासनिक फैसलों के संदर्भ में देखना जरूरी है।
स्कूल छोड़ने वाले बच्चों पर रहेगा फोकस
‘स्कूल बचाओ आंदोलन’ के दौरान SFI का एक प्रमुख फोकस स्कूल छोड़ चुके बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ना रहेगा। संगठन जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए बच्चों को स्कूल में बनाए रखने और ड्रॉपआउट रोकने की दिशा में काम करने की योजना बना रहा है।
SFI ने सरकारी स्कूलों में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की मांग भी की है। इसके साथ ही लड़कियों, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई है।
यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि “73 फीसदी छात्र 12वीं से पहले स्कूल छोड़ देते हैं” जैसा SFI द्वारा बताया गया आंकड़ा मौजूदा आधिकारिक UDISE+ ड्रॉपआउट आंकड़ों से मेल नहीं खाता। UDISE+ 2025-26 के हालिया आंकड़ों के अनुसार सेकेंडरी स्तर पर ड्रॉपआउट रेट 7 प्रतिशत दर्ज किया गया है। इसलिए 73 प्रतिशत के आंकड़े को सरकारी ड्रॉपआउट दर के रूप में प्रकाशित करना सही नहीं होगा।
10 करोड़ हस्ताक्षर जुटाने की योजना
SFI ने अभियान के तहत देशभर में 10 करोड़ हस्ताक्षर जुटाने का लक्ष्य रखा है। संगठन छात्रों, अभिभावकों, स्थानीय लोगों, सामाजिक संगठनों और अन्य समूहों को अभियान से जोड़ना चाहता है।
इसके अलावा कार्यकर्ता अलग-अलग राज्यों में सरकारी स्कूलों का दौरा कर उनकी स्थिति की जानकारी जुटाएंगे। स्कूलों में शिक्षकों, कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, लाइब्रेरी, शौचालय, खेल सुविधाओं और दूसरी बुनियादी जरूरतों का रिकॉर्ड तैयार करने की योजना है।
स्कूल बंद होने या दूसरे स्कूलों में विलय से प्रभावित छात्रों और स्थानीय समुदायों को भी अभियान में शामिल किया जाएगा। संगठन ब्लॉक, उपखंड और जिला स्तर के अधिकारियों को ज्ञापन सौंपने के साथ राज्य स्तर पर रैलियां और जनसभाएं आयोजित करेगा।
8 सितंबर को दिल्ली में पहला बड़ा सम्मेलन
SFI के अनुसार अभियान का पहला बड़ा ‘स्कूल बचाओ सम्मेलन’ 8 सितंबर को दिल्ली के HKS सुरजीत भवन में आयोजित किया जाएगा। इसके बाद विभिन्न राज्यों की राजधानियों में छात्र रैलियां और दूसरे कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है। संगठन ने अन्य छात्र और सामाजिक संगठनों से भी अभियान में शामिल होने की अपील की है।
सरकारी स्कूलों की संख्या, शिक्षकों की उपलब्धता और स्कूलों में सुविधाओं को लेकर बहस ऐसे समय में तेज हुई है जब UDISE+ के आंकड़े देश में सरकारी स्कूलों की बड़ी हिस्सेदारी दिखाते हैं। 2024-25 में देश के करीब 69 प्रतिशत स्कूल सरकारी प्रबंधन के तहत थे और इनमें लगभग 49 प्रतिशत छात्र पढ़ रहे थे।
इसलिए सरकारी स्कूलों की स्थिति का सवाल केवल किसी एक छात्र संगठन या राजनीतिक समूह का मुद्दा नहीं है। यह करोड़ों बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य से जुड़ा विषय है। आने वाले महीनों में SFI का ‘स्कूल बचाओ आंदोलन’ इस मुद्दे को देशभर में कितना बड़ा सार्वजनिक अभियान बना पाता है, यह देखने वाली बात होगी।




Add comment