
स्कूल शिक्षा में होने वाला हर सुधार आखिरकार एक छोटे से सामान्य पल पर आकर टिक जाता है—सरकारी स्कूल की कक्षा में 30 बच्चों के सामने खड़ा एक शिक्षक, जो उन्हें पढ़ना, लिखना और तर्क करना सिखाने की कोशिश कर रहा है। सरकार नीतियां बना सकती है, लक्ष्य तय कर सकती है और बच्चों की सीखने की क्षमता का आकलन कर सकती है, लेकिन जब तक उस कक्षा के अंदर कुछ नहीं बदलता, तब तक वह बदलाव नहीं आ सकता जिसकी हम उम्मीद करते हैं। शिक्षा व्यवस्था के संचालन और प्रबंधन के सामने यही एक अहम सच्चाई है।
पिछले कुछ वर्षों में हरियाणा ने निपुण हरियाणा मिशन (NIPUN Haryana Mission) के जरिए बुनियादी शिक्षा को अपने शिक्षा एजेंडे के केंद्र में रखा है। इसका लक्ष्य सीधा और महत्वपूर्ण है—कक्षा 3 के अंत तक हर बच्चा समझ के साथ पढ़ सके और बुनियादी गणित कर सके।
राज्य में बच्चों का स्कूलों में नामांकन लगभग सार्वभौमिक स्तर पर पहुंच चुका है। राज्य स्तर के संसाधन समूहों से लेकर ब्लॉक और क्लस्टर स्तर के संसाधन व्यक्तियों तक शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था का विस्तार हुआ है। बच्चों की सीखने की क्षमता को अब नियमित आकलन के जरिए मापा जा रहा है, जैसा पहले इस स्तर पर नहीं होता था। ये महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं और दिखाती हैं कि हरियाणा की शिक्षा व्यवस्था अब परिणामों को लेकर गंभीर हुई है।
लेकिन मजबूत प्रशासन का मतलब हमेशा बेहतर सीखने के नतीजे नहीं होता। अच्छी शिक्षा व्यवस्था के लिए यह जानना जरूरी है कि बच्चे स्कूल में हैं या नहीं और शिक्षक प्रशिक्षित हैं या नहीं, इसके साथ-साथ यह भी पता होना चाहिए कि हर दिन कक्षा में वास्तव में क्या हो रहा है। यह कहीं अधिक कठिन सवाल है और हाल ही में किए गए एक कक्षा अध्ययन ने इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है।
Teaching and Learning Practices Survey 2025 के तहत हरियाणा में कक्षा 1 और 2 की बड़ी संख्या में कक्षाओं का अध्ययन किया गया। इसमें शिक्षकों से केवल यह नहीं पूछा गया कि वे क्या करते हैं, बल्कि कक्षा में चल रही पढ़ाई को मिनट-दर-मिनट देखा गया। अध्ययन के निष्कर्ष हरियाणा की हर District Progress Implementation Unit (DPIU) और Block Progress Implementation Unit (BPIU) के लिए महत्वपूर्ण हैं।
अच्छी बात यह है कि निपुण हरियाणा मिशन की बुनियादी व्यवस्था अब काफी हद तक तैयार है। ज्यादातर कक्षाओं में उपयोग करने लायक ब्लैकबोर्ड और दीवारों पर पढ़ाई से जुड़ी सामग्री मौजूद थी। बड़ी संख्या में शिक्षक पिछले एक वर्ष के दौरान प्रशिक्षण ले चुके थे और उन्होंने मिशन के फायदों के बारे में विश्वास के साथ बात की। इससे साफ है कि व्यवस्था की पहुंच और शिक्षकों की प्रतिबद्धता पर सवाल नहीं है।
लेकिन अध्ययन की एक महत्वपूर्ण चिंता यह है कि यह प्रतिबद्धता अभी कक्षा में होने वाली रोजमर्रा की पढ़ाई में पूरी तरह दिखाई नहीं देती। ज्यादातर कक्षाओं में शिक्षक बच्चों को पूरे समूह के रूप में बोलने के लिए प्रोत्साहित करते थे, जबकि अलग-अलग बच्चों को बोलने के मौके कम मिलते थे। शिक्षक सवाल जरूर पूछते थे, लेकिन ऐसे सवाल कम पूछे जाते थे जिनमें बच्चे से यह पूछा जाए कि किसी बात का ‘क्यों’ या ‘कैसे’ क्या है और उसे अपनी सोच खुलकर बताने का मौका मिले।
अधिकांश कक्षाओं में लिखने का मतलब बच्चों से अपनी बात लिखवाने के बजाय बोर्ड पर लिखी चीजों को कॉपी करना था। करीब एक-तिहाई पाठ के दौरान बच्चे किसी सार्थक सीखने की गतिविधि में शामिल नहीं थे। पढ़ाई का तरीका मुख्य रूप से शिक्षक के बोलने और समझाने पर केंद्रित था, जबकि बच्चों को खुद करने, सोचने और अपनी बात व्यक्त करने के पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे थे।
इन स्थितियों का मतलब यह नहीं है कि शिक्षक मेहनत नहीं कर रहे हैं। इसके पीछे वे परिस्थितियां हैं जिनमें शिक्षक काम करते हैं। उन पर बड़े पाठ्यक्रम को समय पर पूरा करने का दबाव रहता है। कई स्कूलों में एक ही कक्षा में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को साथ पढ़ाना पड़ता है। इसके अलावा प्रशिक्षण में अच्छी शिक्षण पद्धतियों के बारे में बताया तो जाता है, लेकिन उन्हें कक्षा में कैसे लागू किया जाए, इसका पर्याप्त प्रदर्शन और बाद में सहयोग नहीं मिल पाता। ये केवल शिक्षकों की समस्या नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं हैं और इनके समाधान भी व्यवस्था के स्तर पर ही तलाशने होंगे। सवाल यह है कि क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था वास्तव में इन्हीं समस्याओं पर ध्यान दे रही है?
यहीं से निपुण हरियाणा मिशन के अगले चरण की प्राथमिकता तय होनी चाहिए। तीन बदलाव सबसे ज्यादा जरूरी हैं और इन तीनों को लागू करने के लिए हरियाणा के पास पहले से ही जरूरी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
पहला बदलाव—मासिक समीक्षा में केवल आंकड़ों के बजाय कक्षा की पढ़ाई पर ध्यान देना।
जिला और ब्लॉक स्तर की समीक्षा बैठकों के साथ-साथ उनके ऊपर काम करने वाली राज्य स्तरीय Steering Committee ने यह देखने की अच्छी व्यवस्था बनाई है कि कितने शिक्षकों को प्रशिक्षण मिला, कितने स्कूलों का दौरा किया गया और कितने बच्चों के आकलन का डेटा दर्ज किया गया।
ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये मुख्य रूप से व्यवस्था में किए गए प्रयासों और संसाधनों को मापते हैं। अगर DPIU की समीक्षा बैठक की शुरुआत उसी महीने की दो-तीन कक्षाओं के निरीक्षण से हो और यह पूछा जाए कि वहां बच्चों को किस तरह पढ़ाया जा रहा था, तो इससे पूरी व्यवस्था का ध्यान शिक्षण की वास्तविक प्रक्रिया पर जाएगा। आखिर जिस चीज की नेतृत्व स्तर पर जांच की जाती है, उसी पर पूरी व्यवस्था सबसे ज्यादा ध्यान देती है।
दूसरा बदलाव—निरीक्षण से आगे बढ़कर शिक्षकों को व्यवहारिक प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देना।
कक्षाओं का दौरा करने वाले ABRCs और Cluster Resource Persons को रजिस्टर और दस्तावेजों की जांच में कम समय देना चाहिए और शिक्षक को यह दिखाने में अधिक समय देना चाहिए कि बच्चों को जोड़ने वाली और प्रभावी कक्षा कैसे चलाई जाती है। यह केवल शिक्षण पद्धति से जुड़ा फैसला नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के संचालन का भी सवाल है।
इसके लिए DIETs को अपने मेंटर विजिट की योजना निगरानी के बजाय व्यवहारिक उदाहरण और प्रदर्शन पर आधारित करनी होगी। ब्लॉक अधिकारियों को भी मेंटरिंग के लिए तय समय को प्रशासनिक रिपोर्टिंग के अतिरिक्त बोझ से बचाना होगा। जब शिक्षक को उसके वास्तविक कक्षा माहौल में यह दिखाया जाता है कि बेहतर तरीके से पढ़ाई कैसे कराई जा सकती है, तभी शिक्षण पद्धति में स्थायी बदलाव की संभावना बढ़ती है।
तीसरा बदलाव—जिन परिस्थितियों में स्कूल वास्तव में चल रहे हैं, उन्हें ध्यान में रखकर योजना बनाना।
हरियाणा में एक ही शिक्षक द्वारा अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को साथ पढ़ाना कोई अपवाद नहीं है। राज्य के बड़ी संख्या में स्कूलों में यह रोज की वास्तविकता है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों, शिक्षक गाइड और प्रशिक्षण को इसी व्यवस्था के हिसाब से तैयार किया जाना चाहिए। अगर एक शिक्षक को एक साथ दो कक्षाओं को संभालना है तो उसे सफल होने के लिए सही सामग्री और तरीका मिलना चाहिए, न कि हर शिक्षक को खुद ही इसका समाधान निकालने के लिए छोड़ दिया जाए।
यह फैसला राज्य स्तर पर लिया जाना चाहिए। निपुण हरियाणा मिशन में अध्ययन सामग्री और प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करते समय बहु-कक्षा शिक्षण यानी Multi-grade Teaching को ध्यान में रखना जरूरी है। यह ऐसी समस्या नहीं होनी चाहिए जिसका समाधान हर शिक्षक अकेले तलाशे।
इस तरह के अध्ययन की सबसे बड़ी उपयोगिता यह नहीं है कि यह किसी शिक्षक या स्कूल को अंक देता है। इसकी असली अहमियत यह है कि यह अनुमान की जगह वास्तविक आंकड़े और प्रमाण सामने रखता है। लंबे समय से शिक्षा की योजनाएं इस धारणा पर बनाई जाती रही हैं कि कक्षाओं में क्या हो रहा होगा। अब हमारे पास यह जानने का अवसर है कि वास्तव में क्या हो रहा है और उसी आधार पर आगे की योजनाएं बनाई जा सकती हैं।
इस जानकारी को निपुण हरियाणा मिशन की हर स्तर की व्यवस्था में शामिल किया जा सकता है—BPIU से लेकर राज्य स्तरीय Steering Committee तक। यह निश्चित रूप से ज्यादा कठिन और जिम्मेदारी वाला मानक है, लेकिन उन बच्चों के भविष्य को गंभीरता से लेने वाले राज्य के लिए यही सही रास्ता है।
कक्षा भले ही एक छोटी सी जगह हो, लेकिन यहीं यह तय होता है कि सरकार और शिक्षा व्यवस्था ने बच्चों से किया अपना वादा पूरा किया या नहीं। अगर हरियाणा अपने प्रशासनिक प्रयासों को कक्षा में होने वाली वास्तविक पढ़ाई तक पहुंचा पाता है, तो वह ऐसा बदलाव खड़ा कर सकता है जो किसी एक मिशन या एक लक्ष्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लंबे समय तक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगा।




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