
समुद्री जल से यूरेनियम को दूसरे आयनों से अलग करना लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती रहा है। अब भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलूरू के शोधकर्ताओं ने इस दिशा में एक नई राह दिखाई है। वैज्ञानिकों ने ऐसी विशेष झिल्ली का अध्ययन किया है, जो समुद्री जल में मौजूद यूरेनिल आयनों (UO₂²⁺) को रोक सकती है, जबकि पानी और कई सामान्य आयनों को आगे गुजरने देती है।
यह शोध भविष्य में समुद्री जल से यूरेनियम की रिकवरी और यूरेनियम से प्रदूषित पानी की सफाई के लिए उपयोगी तकनीक विकसित करने का आधार बन सकता है। हालांकि, अभी इसे सीधे समुद्री जल से बड़े पैमाने पर यूरेनियम निकालने वाली तैयार तकनीक नहीं माना जा सकता, क्योंकि मौजूदा अध्ययन मुख्य रूप से कंप्यूटर आधारित आणविक सिमुलेशन पर किया गया है।
समुद्री जल में यूरेनियम पर क्यों बढ़ा ध्यान?
यूरेनियम परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए प्रमुख ईंधन है। जमीन पर उपलब्ध यूरेनियम संसाधनों की तुलना में समुद्री जल में इसकी कुल मात्रा बहुत अधिक मानी जाती है। IISc के अनुसार, समुद्री जल में करीब 4.5 अरब टन यूरेनियम होने का अनुमान है, जबकि जमीन पर उपलब्ध संसाधन करीब 75 लाख टन बताए जाते हैं।
समस्या यह है कि समुद्री जल में यूरेनियम बहुत कम सांद्रता में मौजूद होता है और उसके साथ बड़ी मात्रा में दूसरे आयन भी होते हैं। इसलिए समुद्र से यूरेनियम निकालने के लिए केवल यूरेनियम को पहचानने और अलग करने वाली बेहद चुनिंदा तकनीक की जरूरत होती है।
समुद्री जल से यूरेनियम अलग करना इतना मुश्किल क्यों?
समुद्री जल कोई साधारण पानी नहीं है। इसमें सोडियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम और कई दूसरे आयन बड़ी मात्रा में मौजूद होते हैं। जब वैज्ञानिक यूरेनियम को अलग करने की कोशिश करते हैं, तो ये दूसरे आयन प्रक्रिया में बाधा डाल सकते हैं।
अब तक कई ऐसी सामग्री विकसित की गई हैं, जो यूरेनियम आयनों के साथ मजबूत रासायनिक संबंध बनाकर उन्हें पकड़ने की कोशिश करती हैं। इनमें छिद्रयुक्त ऑर्गेनिक पॉलिमर और अलग-अलग तरह के नैनोमटेरियल शामिल हैं। लेकिन समुद्री जल जैसे जटिल वातावरण में केवल रासायनिक रूप से यूरेनियम को पकड़ना पर्याप्त नहीं होता। दूसरे आयनों की बड़ी संख्या के कारण चुनिंदा तरीके से यूरेनियम अलग करना मुश्किल बना रहता है।
IISc के शोधकर्ताओं ने क्या नया तरीका अपनाया?
IISc के भौतिकी विभाग की टीम ने Covalent Organic Framework (COF) से बनी विशेष झिल्लियों का अध्ययन किया। इन झिल्लियों की परतों को सामान्य तरीके से एक-दूसरे के ऊपर रखने के बजाय एक खास तरीके से थोड़ा खिसकाकर यानी “slipped” architecture तैयार किया गया।
शोधकर्ताओं ने पाया कि TpPa-1 और TpPa-F4 जैसी slipped COF झिल्लियां यूरेनिल आयनों को पूरी तरह रोक सकती हैं, जबकि पानी और एक-वैलेंट वाले कई आयनों को गुजरने देती हैं। शोध में कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे कुछ द्वि-वैलेंट आयनों की आवाजाही भी इन झिल्लियों में कम पाई गई।
इस खोज की खास बात यह है कि झिल्ली यूरेनियम को अलग करने के लिए केवल मजबूत रासायनिक बंधन पर निर्भर नहीं करती। इसके बजाय झिल्ली की बेहद छोटी संरचना आयनों के गुजरने के रास्ते और उनके लिए पैदा होने वाली ऊर्जा बाधा को नियंत्रित करती है।
परतों की छोटी सी बनावट कैसे करती है बड़ा काम?
शोधकर्ताओं ने आणविक स्तर पर यह समझने के लिए अध्ययन किया कि अलग-अलग आयन COF झिल्ली के भीतर कैसे आगे बढ़ते हैं। इसके लिए उन्होंने आयनों के आसपास मौजूद पानी की संरचना, ऊर्जा संबंधी बाधाओं और झिल्ली के कारण पैदा होने वाले घर्षण का विश्लेषण किया।
शोध में पाया गया कि COF की दो परतों के बीच बनने वाला खास छिद्र यूरेनिल आयन के लिए अतिरिक्त बाधा पैदा करता है। अध्ययन के अनुसार, इस वातावरण में यूरेनिल आयन के लिए करीब 3.6 kcal/mol की मुक्त-ऊर्जा बाधा बनती है। इसके कारण यूरेनिल आयन झिल्ली से आगे नहीं जा पाता, जबकि पानी और कुछ छोटे आयन गुजर सकते हैं।
यानी वैज्ञानिकों ने झिल्ली की रासायनिक संरचना बदलकर यूरेनियम को पकड़ने के बजाय उसकी नैनोस्तरीय बनावट के जरिए आयनों की आवाजाही को नियंत्रित करने का रास्ता दिखाया है।
भूजल में यूरेनियम प्रदूषण के लिए भी उपयोगी हो सकती है तकनीक
इस शोध का महत्व केवल परमाणु ईंधन के संभावित स्रोत तक सीमित नहीं है। पानी में यूरेनियम का प्रदूषण भी पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंता है।
IISc के मुताबिक, ऐसी झिल्लियों के जरिए पानी में मौजूद यूरेनिल आयनों को चुनिंदा तरीके से रोकने की क्षमता भविष्य में यूरेनियम प्रदूषण वाले जलीय स्रोतों की सफाई के लिए उपयोगी हो सकती है। हालांकि, इसके लिए प्रयोगशाला से बाहर वास्तविक परिस्थितियों में इसकी क्षमता, लागत, टिकाऊपन और बड़े पैमाने पर काम करने की क्षमता की आगे जांच जरूरी होगी।
अभी शोध किस चरण में है?
इस शोध को समझते समय यह अंतर महत्वपूर्ण है कि वैज्ञानिकों ने एक संभावित मेम्ब्रेन डिजाइन और उसके काम करने के तरीके को सिमुलेशन के जरिए दिखाया है। इसका मतलब यह नहीं है कि समुद्री जल से बड़े पैमाने पर यूरेनियम निकालने का व्यावसायिक संयंत्र तैयार हो चुका है।
अध्ययन में मल्टीलेयर TpPa-1 झिल्ली के मॉडल में भी यह चयनात्मकता बनी रही, जिससे शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि झिल्ली की मोटाई बढ़ने पर भी यह प्रभाव काम कर सकता है। आगे वास्तविक समुद्री जल, लंबे समय तक संचालन, झिल्ली की मजबूती और लागत जैसे पहलुओं पर प्रयोग इस तकनीक की व्यावहारिक उपयोगिता तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।
IISc की इस रिसर्च में कौन-कौन शामिल हैं?
यह अध्ययन बीनू वर्गीज, योगेंद्र कुमार, शुभाशीष सेनगुप्ता और प्रोफेसर प्रबल के. मैती ने किया है। शोधकर्ताओं की संबद्धता IISc के Centre for Condensed Matter Theory और Department of Physics से है, जबकि Accenture Labs, बेंगलूरू ने भी शोध में सहयोग किया।
यह शोध Small जर्नल में 17 अगस्त 2026 को प्रकाशित हुआ है। शोध का शीर्षक Selective Recovery of Uranyl Ions From Sea Water Using Covalent Organic Framework Membranes है और इसका DOI 10.1002/smll.75260 है।
परमाणु ऊर्जा और जल सुरक्षा, दोनों के लिए अहम संकेत
IISc का यह अध्ययन समुद्री जल से यूरेनियम हासिल करने की दिशा में अभी एक शुरुआती लेकिन महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कदम है। खास बात यह है कि इसमें आयनों को अलग करने के लिए झिल्ली की संरचना को ही एक साधन बनाया गया है। भविष्य में अगर इस डिजाइन को वास्तविक परिस्थितियों में सफलतापूर्वक विकसित किया जाता है, तो इससे एक तरफ यूरेनियम जैसे महत्वपूर्ण संसाधन की रिकवरी और दूसरी तरफ पानी से यूरेनियम प्रदूषण हटाने के लिए नई तकनीक विकसित करने की संभावना बन सकती है।




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