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CSIR-NIIST and RRII Join Hands to Develop Sustainable Technologies for India’s Rubber Industry

रबर सेक्टर की तकनीकी चुनौतियां दूर करेंगे NIIST और RRII, रीसाइक्लिंग से लेकर प्रदूषण नियंत्रण तक पर होगा काम

CSIR-NIIST and RRII Join Hands to Develop Sustainable Technologies for India’s Rubber Industry

भारत के रबर सेक्टर को तकनीकी रूप से मजबूत बनाने और उद्योग की प्रमुख समस्याओं के समाधान के लिए CSIR-NIIST और Rubber Research Institute of India (RRII) साथ मिलकर काम करेंगे। दोनों संस्थान रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के जरिए रबर उद्योग की जरूरतों के मुताबिक नई तकनीक विकसित करने और मौजूदा तकनीकी समस्याओं के समाधान पर काम करेंगे।

National Institute for Interdisciplinary Science and Technology (NIIST) वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की प्रमुख रिसर्च लैब में से एक है। वहीं Rubber Research Institute of India (RRII) रबर बोर्ड के तहत काम करने वाला प्रमुख शोध संस्थान है, जो देश के रबर क्षेत्र से जुड़े अनुसंधान और तकनीकी विकास पर काम करता है।

इस प्रस्तावित सहयोग को लेकर सोमवार को तिरुवनंतपुरम स्थित CSIR-NIIST में बैठक हुई। इसमें RRII, NIIST और रबर बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारी तथा दोनों संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हुए।

NIIST-ITE Hub के जरिए आगे बढ़ेगा सहयोग

दोनों संस्थानों के बीच प्रस्तावित सहयोग को NIIST Innovation, Technology and Entrepreneurship Hub (NIIST-ITE Hub) के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा। यह हब केरल के थोन्नक्कल स्थित Bio 360 Life Sciences Park में बनाया गया है।

इसका उद्देश्य रबर और रबर से जुड़े उद्योगों को रिसर्च, ट्रेनिंग, नई तकनीक, उद्यमिता और कारोबार शुरू करने में जरूरी वैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराना है। इससे उद्योगों और शोध संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल बनाने की भी उम्मीद है।

प्रस्तावित सहयोग के तहत रबर सेक्टर की जरूरतों के मुताबिक देश में ही नई तकनीक और सामग्री विकसित करने पर जोर रहेगा। खास तौर पर ऐसे क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां फिलहाल उद्योग को तकनीकी या पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

विदेश से आने वाले केमिकल पर निर्भरता कम करने की कोशिश

रबर उद्योग में इस्तेमाल होने वाले कुछ जरूरी केमिकल और सिंथेटिक रिएजेंट के लिए आयात पर निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से देश में ही इनके विकास पर काम किया जाएगा।

इसका लक्ष्य केवल आयात घटाना नहीं, बल्कि भारतीय रबर उद्योग की जरूरत के अनुसार ऐसी सामग्री और प्रक्रियाएं विकसित करना भी है, जिन्हें स्थानीय स्तर पर अपनाया जा सके। इससे भविष्य में लागत, सप्लाई और तकनीकी निर्भरता से जुड़ी कुछ चुनौतियों को कम करने में मदद मिल सकती है।

पुराने रबर को फिर उपयोगी बनाने पर जोर

रबर उत्पादों के इस्तेमाल के बाद उनका दोबारा उपयोग करना एक बड़ी चुनौती है। खास तौर पर वल्केनाइज्ड रबर को सामान्य तरीके से दोबारा प्रोसेस करना आसान नहीं होता।

इसी वजह से दोनों संस्थान डी-वल्केनाइजेशन यानी इस्तेमाल किए जा चुके वल्केनाइज्ड रबर की संरचना में बदलाव करके उसे दोबारा उपयोग के योग्य बनाने वाली तकनीक पर भी काम करेंगे। इसका उद्देश्य पुराने रबर उत्पादों से उपयोगी सामग्री तैयार करना और रबर कचरे को कम करना है।

इसके साथ ही रबर की रीसाइक्लिंग के लिए नई तकनीक विकसित करने पर भी ध्यान दिया जाएगा। अगर इन तकनीकों को औद्योगिक स्तर पर सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो इससे रबर कचरे के बेहतर प्रबंधन और संसाधनों के दोबारा इस्तेमाल में मदद मिल सकती है।

रबर उद्योग के प्रदूषण और बदबू पर भी काम

रबर निर्माण और प्रोसेसिंग से निकलने वाला कचरा और अपशिष्ट जल पर्यावरण के लिए चुनौती बन सकता है। इसलिए प्रस्तावित सहयोग में रबर उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट और गंदे पानी के माइक्रोबियल ट्रीटमेंट पर भी काम किया जाएगा।

इस प्रक्रिया में सूक्ष्मजीवों की मदद से प्रदूषकों को कम करने या उनका उपचार करने की तकनीकों पर ध्यान दिया जाएगा।

रबर प्रोसेसिंग के दौरान आने वाली तेज बदबू को कम करना भी इस सहयोग का एक हिस्सा है। इसके लिए NIIST की उपलब्ध तकनीकों का इस्तेमाल करने और उन्हें रबर उद्योग की जरूरत के मुताबिक विकसित करने की योजना है।

हाई-परफॉर्मेंस रबर उत्पाद बनाने पर भी जोर

सिर्फ मौजूदा समस्याओं का समाधान करना ही इस सहयोग का लक्ष्य नहीं है। दोनों संस्थान ऐसे हाई-परफॉर्मेंस और अधिक मूल्य वाले रबर उत्पाद विकसित करने पर भी काम करेंगे, जिनका इस्तेमाल बेहतर तकनीकी और औद्योगिक जरूरतों के लिए किया जा सके।

इससे रबर आधारित कारोबार को नए बाजारों तक पहुंचाने और ज्यादा मूल्य वाले उत्पाद तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है। लंबे समय में इसका फायदा रबर प्रोसेसिंग कंपनियों, उद्यमियों और इससे जुड़े दूसरे कारोबारों को मिल सकता है।

NIIST निदेशक ने बताया क्यों जरूरी है यह सहयोग

CSIR-NIIST के निदेशक डॉ. सी. आनंदरामकृष्णन ने कहा कि रबर सेक्टर केरल के औद्योगिक और आर्थिक ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में इस क्षेत्र के सामने आने वाली तकनीकी और पर्यावरण संबंधी चुनौतियों के समाधान के लिए देश में विकसित, टिकाऊ और आधुनिक तकनीक की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि CSIR-NIIST के पास मटीरियल, केमिकल, बायोलॉजिकल और प्रोसेस टेक्नोलॉजी जैसे कई क्षेत्रों में विशेषज्ञता है। दूसरी ओर, RRII को रबर सेक्टर और उसकी व्यावहारिक जरूरतों की गहरी समझ है। दोनों की विशेषज्ञता को साथ लाने से वैज्ञानिक शोध को उपयोगी तकनीक में बदलने के लिए बेहतर आधार तैयार हो सकता है।

किसानों और स्टार्टअप्स को भी मिल सकता है फायदा

रबर सेक्टर में इस सहयोग का असर सिर्फ बड़ी कंपनियों तक सीमित रखने का लक्ष्य नहीं है। रबर बोर्ड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर वसंतगेसन (IRS) ने कहा कि इसका लाभ पूरे रबर सेक्टर को मिलना चाहिए। इसमें रबर उत्पादन से लेकर प्रोसेसिंग और तैयार उत्पाद बनाने तक जुड़े अलग-अलग स्तर के लोग शामिल हैं।

खास तौर पर रबर किसानों को भी इस सहयोग से लाभ मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा रबर आधारित उद्योगों, स्टार्टअप्स, उद्यमियों और रिसर्च स्कॉलर्स के कर्मचारियों में साइंस एंड टेक्नोलॉजी से जुड़ी स्किल विकसित करने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

भारतीय रबर उद्योग के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?

भारत में रबर सेक्टर का बड़ा हिस्सा केरल से जुड़ा है। इसलिए इस राज्य में रिसर्च संस्थानों, रबर बोर्ड और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल से स्थानीय स्तर पर कई व्यावहारिक समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है।

NIIST और RRII की विशेषज्ञता को एक साथ लाने से रबर कचरे के प्रबंधन, रीसाइक्लिंग, प्रदूषण नियंत्रण, आयातित केमिकल के विकल्प और नए रबर उत्पादों के विकास जैसे क्षेत्रों में काम को गति मिल सकती है।

अगर प्रस्तावित तकनीकों को रिसर्च से आगे बढ़ाकर उद्योग स्तर पर सफलतापूर्वक अपनाया जाता है, तो इससे भारतीय रबर सेक्टर को अधिक टिकाऊ, तकनीकी रूप से मजबूत और प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिल सकती है।

 

 

Asmita Sarkar

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