
शिक्षक भर्ती और नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम अंतरिम आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि स्कूलों और कॉलेजों में ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति या नियुक्ति के बाद सेवा जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिनके पास संबंधित कानूनों के तहत तय न्यूनतम योग्यता नहीं है।
पीठ में CJI सूर्यकांत के अलावा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। अदालत ने यह आदेश एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान दिया। हालांकि, इस आदेश को देशभर की सभी शिक्षक भर्तियों पर रोक के तौर पर देखना सही नहीं होगा। मौजूदा मामला असम में शिक्षकों और कर्मचारियों के provincialisation यानी सरकारी सेवा में समायोजन की व्यवस्था से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर निर्देश दिया कि लागू कानूनी प्रावधानों के तहत निर्धारित जरूरी योग्यता के बिना किसी शिक्षक को स्कूल या कॉलेज में नियुक्त या सेवा में जारी नहीं रखा जाए।
अदालत का यह निर्देश Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 (RTE Act), National Council for Teacher Education Act, 1993 (NCTE Act) और University Grants Commission Act, 1956 (UGC Act) के तहत तय शिक्षक पात्रता से जुड़ा है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने यह सवाल भी उठाया कि यदि निर्धारित योग्यता के बिना लोगों को शिक्षक बनाया जाता है तो इसका छात्रों के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा। अदालत ने शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षक की योग्यता को गंभीर मुद्दा माना है।
किस मामले में आया सुप्रीम कोर्ट का आदेश?
यह मामला असम की Assam Education (Provincialisation of Services of Teachers and Re-organisation of Educational Institutions) Act, 2017 से जुड़ा है। इस व्यवस्था के तहत कुछ ‘venture educational institutions’ में काम करने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों को सरकारी व्यवस्था में शामिल किया जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं राजेश चौहान और माधब मुकुंद पुजारी ने इस व्यवस्था की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए कुछ लोगों को नियमित सरकारी सेवा में शामिल होने का रास्ता मिलता है, जबकि उन्होंने सामान्य सरकारी भर्ती जैसी निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी चयन प्रक्रिया का सामना नहीं किया है।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि किसी शिक्षक के पास केंद्रीय कानूनों और संबंधित नियमों के तहत जरूरी न्यूनतम योग्यता नहीं है, तो उसे सरकारी या provincialised संस्थान में शिक्षक के रूप में कैसे नियुक्त या समायोजित किया जा सकता है।
असम की शिक्षक भर्ती व्यवस्था पर क्या असर?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल असम सरकार और उसके शिक्षा विभागों को provincialisation योजना के तहत शिक्षकों की नई नियुक्ति या उन्हें सरकारी सेवा में समायोजित करने से रोक दिया है। यह रोक अगले आदेश तक प्रभावी रहेगी।
अदालत ने केंद्र सरकार, असम सरकार और शिक्षा विभाग के संबंधित अधिकारियों को नोटिस भी जारी किया है। मामले में आगे की सुनवाई के दौरान अदालत इस व्यवस्था की संवैधानिक और कानूनी वैधता पर विस्तार से विचार करेगी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार मामले को आगे सुनवाई के लिए 22 सितंबर को सूचीबद्ध किया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने 2011 और 2017 की provincialisation व्यवस्थाओं के तहत पहले से सरकारी सेवा में शामिल किए गए शिक्षकों की भी समीक्षा करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह जांच की जानी चाहिए कि संबंधित शिक्षकों के पास लागू कानूनों के अनुसार जरूरी योग्यता है या नहीं।
किन कानूनों के तहत शिक्षक की योग्यता तय होती है?
भारत में शिक्षक बनने की योग्यता एक जैसी नहीं होती। यह इस बात पर निर्भर करती है कि शिक्षक प्राथमिक या स्कूली शिक्षा में नियुक्त होना चाहता है या कॉलेज और विश्वविद्यालय में।
RTE Act की धारा 23 के तहत प्राथमिक शिक्षा के लिए शिक्षक की न्यूनतम योग्यता तय करने में NCTE की भूमिका है। स्कूल शिक्षकों के लिए D.El.Ed., B.Ed. और अन्य शिक्षक-शिक्षा योग्यताएं संबंधित स्तर और भर्ती नियमों के अनुसार लागू होती हैं। इसके अलावा RTE के दायरे वाले स्कूलों में Teacher Eligibility Test (TET) भी निर्धारित न्यूनतम योग्यताओं का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2025 में TET को RTE Act की धारा 23 के तहत निर्धारित न्यूनतम योग्यता में शामिल माना था। मई 2026 में अदालत ने पात्र शिक्षकों को TET हासिल करने की समय-सीमा 31 अगस्त 2028 तक बढ़ाई थी।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर कक्षा या हर राज्य में शिक्षक बनने के लिए एक ही डिग्री और एक ही परीक्षा अनिवार्य है। प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर योग्यता संबंधित NCTE नियमों और राज्य के भर्ती नियमों के अनुसार अलग हो सकती है।
कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षकों के लिए क्या नियम हैं?
उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षक बनने की योग्यता का नियमन UGC के नियमों के तहत होता है। आम तौर पर असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए संबंधित विषय में निर्धारित न्यूनतम अंकों के साथ मास्टर डिग्री और UGC-NET या संबंधित मान्य पात्रता परीक्षा की आवश्यकता होती है। कुछ मामलों में UGC के नियमों के अनुसार PhD धारकों को NET से छूट का प्रावधान भी है।
इसलिए कॉलेज और विश्वविद्यालय में नियुक्ति के नियम स्कूल शिक्षक भर्ती से अलग होते हैं। किसी उम्मीदवार की पात्रता उसके विषय, पद और उस समय लागू UGC नियमों पर निर्भर करती है।
क्या बिना योग्यता वाले सभी शिक्षकों की नौकरी जाएगी?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। सुप्रीम कोर्ट का मंगलवार का आदेश अंतरिम आदेश है और इसका तत्काल संदर्भ असम की provincialisation व्यवस्था है।
अदालत ने अभी यह अंतिम फैसला नहीं दिया है कि पहले से सेवा में मौजूद प्रत्येक शिक्षक की नियुक्ति अवैध है या सभी ऐसे शिक्षकों को नौकरी से हटाया जाएगा। मामले में केंद्र और असम सरकार से जवाब मांगा गया है और आगे की सुनवाई में अदालत पूरे मुद्दे पर विचार करेगी।
यही वजह है कि इस आदेश का सबसे सीधा असर फिलहाल असम में provincialisation के जरिए होने वाली नई नियुक्तियों और सरकारी सेवा में समायोजन पर पड़ता है।
शिक्षक भर्ती में पारदर्शी चयन पर जोर
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि सरकारी शिक्षक पदों पर नियुक्ति निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के जरिए हो। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का भी हवाला दिया गया है, जो समानता और सरकारी रोजगार में समान अवसर से जुड़े हैं।
सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश ऐसे समय आया है जब शिक्षक की योग्यता और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर देश में लगातार चर्चा हो रही है। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त व्यवस्था में शिक्षकों की नियुक्ति करते समय संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और संबंधित नियामक संस्थाओं के मानकों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल असम की provincialisation व्यवस्था के तहत शिक्षकों की नई नियुक्ति और सरकारी सेवा में समायोजन पर रोक लगाई है और स्पष्ट किया है कि शिक्षक के पास लागू कानूनों के तहत जरूरी योग्यता होना जरूरी है। मामले की अगली सुनवाई में यह साफ होगा कि असम की मौजूदा व्यवस्था की संवैधानिक वैधता पर अदालत क्या अंतिम रुख अपनाती है।




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