
सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र को जारी किए गए पांच लाख रुपये के निजी मुचलके वाले नोटिस पर बुधवार को कड़ी नाराजगी जताई। यह नोटिस जुलाई में हुए Cockroach Janta Party (CJP) से जुड़े छात्र प्रदर्शन के मामले में जारी किया गया था। खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इन प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में दर्ज FIR रद्द कर चुका है और छात्रों के खिलाफ केवल प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर जबरन कार्रवाई पर रोक लगा चुका है।
मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने रखा। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया कि जब कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई पर रोक लगा रखी थी, तो इसके बावजूद कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी किया।
क्या है पूरा मामला?
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के दूसरे वर्ष के कानून छात्र अक्षत त्रिपाठी को 4 सितंबर 2026 को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया था। नोटिस में उनसे छह महीने तक शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी मुचलका देने को कहा गया था। इसके अलावा दो जमानतदारों से भी पांच-पांच लाख रुपये के मुचलके की मांग की गई थी।
यह कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 126 और 135 के तहत शुरू की गई कार्यवाही के बाद हुई थी। नोटिस BNSS की धारा 130 के तहत जारी किया गया था। ऐसी कार्रवाई का उद्देश्य किसी व्यक्ति को सजा देना नहीं, बल्कि संभावित शांति भंग को रोकने के लिए पहले से कानूनी बंधन में रखना होता है।
छात्र पर क्या आरोप लगाए गए थे?
पुलिस रिपोर्ट के आधार पर जारी नोटिस में आरोप लगाया गया था कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच कथित तौर पर सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहे थे। उन पर छात्रों को दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित करने का भी आरोप लगाया गया।
पुलिस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि उनकी गतिविधियों के कारण विश्वविद्यालय परिसर में तनाव पैदा हुआ और आगे चलकर लड़ाई-झगड़े तथा शांति व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी। इसी आधार पर मजिस्ट्रेट ने शांति बनाए रखने के लिए मुचलका लेने की कार्रवाई शुरू की थी।
हालांकि, अक्षत त्रिपाठी ने इन आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रदर्शन में शांतिपूर्ण तरीके से हिस्सा लिया था और उस दौरान वह विश्वविद्यालय की कक्षाओं में नहीं थे।
पांच लाख रुपये के मुचलके का मतलब क्या था?
नोटिस का मतलब यह नहीं था कि छात्र को पांच लाख रुपये तुरंत जमा कराने थे। उससे यह जवाब मांगा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए उससे पांच लाख रुपये का निजी मुचलका और दो जमानतदारों से समान राशि के मुचलके क्यों न लिए जाएं।
हालांकि, इतनी बड़ी राशि का मुचलका मांगने को लेकर मामला गंभीर हो गया, खासकर इसलिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट कुछ ही दिन पहले CJP से जुड़े छात्र प्रदर्शनों के संबंध में महत्वपूर्ण आदेश दे चुका था।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले क्या आदेश दिया था?
1 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने CJP के नेतृत्व में जुलाई में हुए प्रदर्शनों से जुड़े देशभर के FIR रद्द कर दिए थे। कोर्ट ने कहा था कि इन प्रदर्शनों में शामिल होने मात्र से छात्रों या युवाओं को आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए, हालांकि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को इस सुरक्षा से अलग रखा गया था।
यही वजह है कि अक्षत त्रिपाठी को नया नोटिस जारी किए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचने के बाद ज्यादा गंभीर हो गया।
नोटिस वापस लेने के बाद भी कोर्ट क्यों नाराज?
मामला सामने आने के बाद पुलिस ने नोटिस वापस ले लिया। रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने कहा कि जांच के बाद 4 सितंबर को ही नोटिस रद्द कर दिया गया था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि केवल नोटिस वापस ले लेने से मामला खत्म कैसे माना जा सकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट के सामने इसे उसके आदेश की अवहेलना का मुद्दा बताया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सवाल किया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस कैसे जारी कर दिया। LiveLaw और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, CJI ने पूछा कि जब कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर रोक लगाई थी तो कोई मजिस्ट्रेट उस आदेश के विपरीत कार्रवाई कैसे कर सकता है।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता से नोटिस को औपचारिक याचिका के जरिए रिकॉर्ड पर लाने को कहा है। कोर्ट संबंधित अधिकारी से इस कार्रवाई को लेकर स्पष्टीकरण भी मांग सकता है। यानी नोटिस वापस हो जाने के बावजूद मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की जांच का रास्ता खुला हुआ है।
इस मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह सवाल केवल एक छात्र को जारी नोटिस तक सीमित नहीं है। मामला इस बात से जुड़ा है कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बाद निचले स्तर के प्रशासनिक अधिकारी उस आदेश को किस तरह लागू करते हैं। सुप्रीम कोर्ट की बुधवार की नाराजगी से यह साफ है कि वह अपने आदेशों की अनदेखी को हल्के में लेने के मूड में नहीं है।




Add comment