
Supreme Court on Judiciary Criticism: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की आलोचना को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतें आलोचना से बच नहीं सकतीं और न ही उन्हें ऐसा करना चाहिए। न्यायपालिका के कामकाज की निष्पक्ष, तथ्यपरक और रचनात्मक आलोचना संवैधानिक लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा है। इससे न्यायिक व्यवस्था में जवाबदेही और सुधार को बढ़ावा मिलता है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने यह टिप्पणी एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर 2026 के अपने आदेश में यह बात कही थी। आदेश बाद में अदालत की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया गया।
अदालत ने साफ किया कि असली अंतर आलोचना और चुप्पी के बीच नहीं है। फर्क जिम्मेदार और तथ्य आधारित चर्चा तथा बिना पर्याप्त जानकारी के किए गए दावों के बीच है।
सुप्रीम कोर्ट ने आलोचना को लेकर क्या कहा?
पीठ ने कहा कि न्यायपालिका एक संस्था के रूप में आलोचना से परहेज नहीं करती और न ही कर सकती है। न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष, जानकारी पर आधारित और रचनात्मक आलोचना लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा है।
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी आलोचना उचित मंच पर और निष्पक्ष तथा तर्कसंगत प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। खास तौर पर स्कूली पाठ्यक्रम में किसी गंभीर आरोप को शामिल करने से पहले तथ्यों की अच्छी तरह जांच जरूरी है, क्योंकि स्कूल जाने वाले बच्चे अभी सीखने और अपनी समझ विकसित करने की उम्र में होते हैं।
यानी सुप्रीम कोर्ट का संदेश आलोचना पर रोक लगाने का नहीं, बल्कि जिम्मेदार और तथ्य आधारित आलोचना को बढ़ावा देने का है।
किस मामले से जुड़ी है सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी?
यह मामला एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब ‘Exploring Society: India and Beyond’ के एक अध्याय से जुड़ा था। फरवरी 2026 में जारी इस किताब के एक अध्याय में न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा के साथ ‘Corruption in the Judiciary’ यानी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार शीर्षक वाला हिस्सा शामिल था।
इस सामग्री को लेकर विवाद तब बढ़ा जब इसके प्रकाशन की जानकारी सामने आई। सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए किताब की सामग्री की समीक्षा की। 26 फरवरी 2026 को अदालत ने संबंधित किताब के आगे प्रकाशन, पुनर्मुद्रण और डिजिटल प्रसार पर रोक लगा दी थी।
अदालत की शुरुआती चिंता यह थी कि कक्षा 8 के विद्यार्थियों के लिए तैयार पाठ्यक्रम में न्यायपालिका के बारे में इस तरह की सामग्री किस संदर्भ और किस प्रक्रिया के तहत शामिल की गई।
तीन शिक्षाविदों को लेकर क्या हुआ था?
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 के आदेश में प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दीवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार को पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक तैयार करने की प्रक्रिया से अलग रखने का निर्देश दिया था।
उस समय अदालत ने कहा था कि इन तीनों की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं और केंद्र, राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों तथा सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों को उनसे अलग रहने का निर्देश दिया था। हालांकि, यह निर्देश इन शिक्षाविदों को अदालत के सामने अपना पक्ष रखने का अवसर देने के अधीन था।
बाद में तीनों शिक्षाविदों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि संबंधित अध्याय तैयार करना किसी एक व्यक्ति का अकेला काम नहीं था, बल्कि यह एक सामूहिक प्रक्रिया थी।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद में अपने रुख में बदलाव किया
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने तीनों शिक्षाविदों की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण पर विचार करते हुए मार्च के आदेश में महत्वपूर्ण बदलाव किया। अदालत ने उन टिप्पणियों को वापस ले लिया जिनमें कहा गया था कि तीनों ने जानबूझकर तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया और कक्षा 8 के विद्यार्थियों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश की।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले की टिप्पणियां संबंधित अध्याय की सामग्री के संदर्भ में थीं, न कि तीनों व्यक्तियों के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष के रूप में। केंद्र, राज्य, केंद्रशासित प्रदेश और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों को इन शिक्षाविदों के साथ भविष्य में काम करने के बारे में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की छूट दी गई।
विवादित अध्याय का अब क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा आदेश में दर्ज किया कि केंद्र सरकार की ओर से गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर विवादित अध्याय में बदलाव किया जा चुका है। संशोधित सामग्री के बाद नई किताबें प्रसार में लाई गई हैं और इसी के बाद अदालत ने मामले की कार्यवाही समाप्त कर दी।
इस तरह यह मामला अब केवल एक पाठ्यपुस्तक में शामिल सामग्री का विवाद नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने यह भी स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका की आलोचना लोकतंत्र में स्वीकार्य है, लेकिन ऐसी आलोचना तथ्य, जानकारी और उचित प्रक्रिया पर आधारित होनी चाहिए।
स्कूल की किताबों में सामग्री को लेकर क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
स्कूली पाठ्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को किसी संस्था के प्रति अंध समर्थन या विरोध सिखाना नहीं, बल्कि उन्हें सही जानकारी के आधार पर समझ विकसित करने में मदद करना है। इसलिए अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि बच्चों के लिए तैयार की जाने वाली सामग्री में गंभीर दावों और आरोपों की तथ्यात्मक जांच जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख शिक्षा व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। इससे यह संकेत मिलता है कि आलोचनात्मक सोच और संस्थागत सम्मान दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, लेकिन पाठ्यक्रम में शामिल सामग्री तथ्यपरक और जिम्मेदार होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सार
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की आलोचना पर रोक लगाने की बात नहीं कही है। इसके उलट अदालत ने माना है कि निष्पक्ष और रचनात्मक आलोचना लोकतंत्र में जरूरी है। लेकिन अदालत के अनुसार, आलोचना तथ्यों और पर्याप्त जानकारी पर आधारित होनी चाहिए तथा उसे उचित मंच और प्रक्रिया के माध्यम से सामने रखा जाना चाहिए।
एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब से जुड़े इस मामले में विवादित सामग्री को विशेषज्ञ समीक्षा के बाद बदला गया और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही समाप्त कर दी।




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