
सुप्रीम कोर्ट ने NEET-PG 2025-26 के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ पर्सेंटाइल में की गई असाधारण कमी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) से इस फैसले पर जवाब मांगा है और साफ कहा है कि मेडिकल शिक्षा में सीटें भरना जरूरी है, लेकिन इसके लिए गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता।
जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने NBEMS को दो सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह संतुलन बनाए रखना जरूरी है कि एक ओर बड़ी संख्या में मेडिकल सीटें खाली न रहें और दूसरी ओर पोस्टग्रेजुएट स्तर की पढ़ाई के मानक कमजोर न हों।
याचिकाकर्ताओं की आपत्ति क्या है
मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल संकरणारायणन ने दलील दी कि मेडिकल पोस्टग्रेजुएट एडमिशन में कट-ऑफ या अंकों में बदलाव केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि पीजी स्तर पर छात्रों से अपेक्षित योग्यता और मानक, अंडरग्रेजुएट स्तर से कहीं अधिक कड़े होने चाहिए। ऐसे में कट-ऑफ में इतनी बड़ी कटौती उचित नहीं मानी जा सकती।
कट-ऑफ में क्यों किया गया बदलाव
दरअसल, देशभर में करीब 18 हजार पीजी मेडिकल सीटें खाली रह जाने के बाद NBEMS ने NEET-PG 2025 के क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में बड़ा बदलाव किया। जारी नोटिस के अनुसार, जनरल कैटेगरी के लिए कट-ऑफ को 50 पर्सेंटाइल से घटाकर 7 पर्सेंटाइल कर दिया गया, जबकि आरक्षित वर्गों के लिए इसे 40 पर्सेंटाइल से घटाकर शून्य कर दिया गया। यह फैसला सामने आते ही मेडिकल शिक्षा से जुड़े हलकों में तीखी बहस शुरू हो गई।
याचिका में उठाया गया संवैधानिक सवाल
सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन समेत अन्य याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में दायर याचिका में कहा है कि चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद पात्रता नियमों में बदलाव करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। याचिका के मुताबिक, उम्मीदवारों ने पहले से तय कट-ऑफ के आधार पर अपनी तैयारी, करियर की योजना और भविष्य से जुड़े फैसले किए थे। ऐसे में अचानक नियम बदलना छात्रों के साथ अन्याय है।
मेडिकल समुदाय की चिंता
NBEMS के इस फैसले को लेकर मेडिकल समुदाय के एक बड़े हिस्से ने नाराजगी जताई है। कई डॉक्टर संगठनों और शिक्षाविदों का मानना है कि यह कदम अभूतपूर्व है और इससे पीजी मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। उनका कहना है कि केवल सीटें भरने के लिए मानकों में इतनी ढील देना लंबे समय में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
अब आगे क्या
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की है। तब तक NBEMS को यह स्पष्ट करना होगा कि कट-ऑफ में इतनी बड़ी कटौती किन आधारों पर की गई और यह फैसला मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता के साथ कैसे संतुलन बनाता है। इस मामले पर अदालत का फैसला न सिर्फ NEET-PG 2025-26 बल्कि भविष्य की मेडिकल प्रवेश नीतियों के लिए भी अहम माना जा रहा है।




Add comment