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भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि है AI आधारित ‘श्वासा’ ऐप

भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि है AI आधारित ‘श्वासा’ ऐप

भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि है AI आधारित ‘श्वासा’ ऐप

भारत की प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था लंबे समय से एक बड़ी चुनौती से जूझ रही है—फेफड़ों की बीमारियों की समय पर पहचान। जिला अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्पाइरोमेट्री जैसी उन्नत जांच सुविधाओं का अभाव होने के कारण लाखों मरीज सही समय पर निदान नहीं करा पाते। इसी समस्या को दूर करने के लिए कर्नाटक के एक स्टार्टअप ने एक नई तकनीक विकसित की है, जो जल्द ही ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर बदल सकती है।

इस तकनीक का नाम है—‘श्वासा’ (Shwaasa)—एक AI आधारित मोबाइल ऐप जो फेफड़ों की गंभीर बीमारियों की शुरुआती पहचान करने में सक्षम है।

कैसे काम करता है ‘श्वासा’?

यह ऐप पूरी तरह एक उन्नत एल्गोरिदम पर आधारित है। इसकी प्रक्रिया बेहद आसान है—मरीज को सिर्फ स्मार्टफोन के माइक्रोफोन के पास खांसना होता है। ऐप का AI सॉफ्टवेयर खांसी की आवाज़, सांस लेने का पैटर्न और फेफड़ों की कार्यक्षमता का विश्लेषण करता है। सिर्फ 8 मिनट में यह ऐप यह बता देता है कि व्यक्ति के फेफड़े सामान्य हैं या उसमें COPD, अस्थमा जैसी समस्याओं के संकेत मौजूद हैं।

AIIMS का परीक्षण और सटीकता

AIIMS-दिल्ली ने अपने बल्लभगढ़ केंद्र में इस ऐप का क्लिनिकल परीक्षण किया, जिसमें 460 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। परीक्षण में पाया गया कि:

– सामान्य और असामान्य फेफड़ों की पहचान में करीब 90% सटीकता

– COPD और अस्थमा जैसे मामलों में 82%–87% तक की सटीकता

गंभीर मामलों में ऐप के परिणाम स्पाइरोमेट्री, जिसे फेफड़ों की जांच का गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है, के काफी करीब पाए गए। यह तकनीक इसकी विश्वसनीयता को और मजबूत करती है।

भारत के लिए इसकी जरूरत क्यों बढ़ी?

भारत में COPD मृत्यु और बीमारी का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। देश के ज्यादातर PHC और CHC में स्पाइरोमेट्री मशीन उपलब्ध नहीं है। AIIMS के डॉ. हर्षल रमेश साल्वे के अनुसार, स्पाइरोमेट्री की सुविधा केवल बड़े मेडिकल कॉलेजों और चुनिंदा अस्पतालों तक सीमित है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में मरीज समय पर जांच नहीं करा पाते।

इसके उलट, ‘श्वासा’ ऐप के मामले में किसी भारी मशीनरी की जरूरत नहीं, डॉक्टर बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के इस्तेमाल कर सकते हैं, सिर्फ एक स्मार्टफोन पर चल सकता है। यही वजह है कि यह तकनीक भारत की प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।

भविष्य में संभावनाएं

AIIMS के विशेषज्ञों ने इस ऐप को आयुष्मान आरोग्य मंदिरों, स्वास्थ्य उपकेन्द्रों और ग्रामीण क्लीनिकों में तैनात करने की सिफारिश की है। वर्तमान में यह ऐप कर्नाटक समेत कुछ राज्यों में उपयोग किया जा रहा है।

इसके अलावा, AIIMS अब एक अलग शोध परियोजना के तहत इस ऐप की तपेदिक (TB) स्क्रीनिंग में उपयोगिता की भी जांच कर रहा है। यदि इसमें सफलता मिलती है तो भारत में टीबी की पहचान के तरीके में भी एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

‘श्वासा’ ऐप भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि है। कम समय, कम संसाधन और उच्च सटीकता—इन तीन खूबियों के साथ यह ऐप उन इलाकों में नई उम्मीद बन सकता है, जहां आज भी फेफड़ों की बीमारियों का शुरुआती निदान एक चुनौती है। यदि यह तकनीक व्यापक रूप से लागू की गई, तो भारत में सांस संबंधी बीमारियों के बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

एडइनबॉक्स टीम

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