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NMC ने HOD रोटेशन पर स्थिति की साफ, कहा- मेडिकल कॉलेजों में विभागाध्यक्ष बदलने पर अभी नहीं हुआ अंतिम फैसला

NMC ने HOD रोटेशन पर स्थिति की साफ, कहा- मेडिकल कॉलेजों में विभागाध्यक्ष बदलने पर अभी नहीं हुआ अंतिम फैसला

NMC ने HOD रोटेशन पर स्थिति की साफ, कहा- मेडिकल कॉलेजों में विभागाध्यक्ष बदलने पर अभी नहीं हुआ अंतिम फैसला

देश के मेडिकल कॉलेजों में विभागाध्यक्ष (HOD) के कार्यकाल को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। आयोग ने कहा है कि मेडिकल कॉलेजों में हर तीन साल बाद विभागाध्यक्ष बदलने के प्रस्ताव पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। फिलहाल यह प्रस्ताव विचार-विमर्श और परामर्श की प्रक्रिया से गुजर रहा है।

हाल के दिनों में ऐसी खबरें सामने आई थीं कि मेडिकल कॉलेजों में विभागाध्यक्षों के कार्यकाल को तीन वर्ष तक सीमित करने और इसके बाद विभाग के वरिष्ठ शिक्षकों के बीच रोटेशन के आधार पर नए HOD नियुक्त करने की योजना पर काम किया जा रहा है। इस प्रस्ताव ने मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में व्यापक चर्चा को जन्म दिया था। कई शिक्षकों, प्रशासकों और विशेषज्ञों ने इसे लेकर अलग-अलग राय रखी थी।

अभी विचाराधीन है प्रस्ताव

NMC के अनुसार, विभागाध्यक्षों की नियुक्ति और कार्यकाल से जुड़े प्रस्तावित बदलावों पर अभी चर्चा जारी है। आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी भी बड़े शैक्षणिक या प्रशासनिक बदलाव को लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की जाती हैं।

इसी प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव को सार्वजनिक किया गया था, ताकि मेडिकल कॉलेजों, शिक्षकों, विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों की राय प्राप्त की जा सके। आयोग का कहना है कि प्राप्त सुझावों का अध्ययन किया जा रहा है और सभी पहलुओं की समीक्षा के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

मेडिकल शिक्षा में क्यों महत्वपूर्ण है यह प्रस्ताव?

मेडिकल कॉलेजों में विभागाध्यक्ष की भूमिका केवल प्रशासनिक नहीं होती, बल्कि वह शिक्षण, शोध गतिविधियों, प्रशिक्षण और विभागीय संचालन के लिए भी जिम्मेदार होता है। ऐसे में HOD के कार्यकाल में बदलाव का असर संस्थानों की कार्यप्रणाली और शैक्षणिक गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है।

प्रस्ताव के समर्थकों का मानना है कि रोटेशन व्यवस्था से नेतृत्व के अधिक अवसर मिलेंगे और विभागों में नई सोच को बढ़ावा मिलेगा। वहीं कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि बार-बार बदलाव से विभागों की दीर्घकालिक योजनाओं और प्रशासनिक स्थिरता पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि NMC इस मुद्दे पर व्यापक परामर्श कर रहा है।

सुझावों के बाद लिया जाएगा अंतिम फैसला

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आयोग को विभिन्न मेडिकल संस्थानों और शिक्षकों से सुझाव प्राप्त हुए हैं। इन सुझावों और आपत्तियों की समीक्षा के बाद ही आगे की दिशा तय की जाएगी। फिलहाल मेडिकल कॉलेजों में विभागाध्यक्षों की नियुक्ति से संबंधित मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव लागू नहीं किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो यह मेडिकल कॉलेजों की प्रशासनिक संरचना में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

PG डिप्लोमा कोर्स होंगे चरणबद्ध तरीके से बंद

इस बीच NMC ने मेडिकल शिक्षा से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। आयोग ने तय किया है कि आने वाले वर्षों में पोस्ट ग्रेजुएट (PG) डिप्लोमा मेडिकल कोर्स को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाएगा।

इनकी जगह डॉक्टर ऑफ मेडिसिन (MD) और मास्टर ऑफ सर्जरी (MS) जैसे डिग्री कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाएगी। इस संबंध में आयोग ने देशभर के मेडिकल कॉलेजों और संस्थानों को आवश्यक दिशा-निर्देश भेज दिए हैं।

NMC के अनुसार, शैक्षणिक सत्र 2026-27 PG डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में प्रवेश का अंतिम वर्ष होगा। इसके बाद 2027-28 से इन कोर्सों में नए छात्रों का दाखिला नहीं लिया जाएगा। वर्तमान में संचालित पाठ्यक्रमों को पूरा करने के बाद इन्हें पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा।

मेडिकल शिक्षा में बदलाव का दौर

विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल शिक्षा प्रणाली को आधुनिक और अधिक मानकीकृत बनाने के लिए NMC लगातार सुधारों पर काम कर रहा है। विभागाध्यक्षों के कार्यकाल से जुड़ा प्रस्ताव हो या PG डिप्लोमा कोर्स को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का निर्णय, दोनों ही कदम मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और संरचना को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण बदलावों के रूप में देखे जा रहे हैं।

फिलहाल मेडिकल कॉलेजों और शिक्षकों की नजर NMC के अंतिम फैसले पर टिकी है, जो आने वाले समय में मेडिकल संस्थानों की प्रशासनिक व्यवस्था और उच्च चिकित्सा शिक्षा की दिशा तय कर सकता है।

Asmita Sarkar

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