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जुर्म सुलझाने का नया विज्ञान, फॉरेंसिक साइंस में छात्रों का बढ़ता रुझान

भारत में अब कई छात्र अपराध जांच, कानून प्रवर्तन और विधिक अध्ययन जैसे क्षेत्रों में करियर बना रहे हैं। इसका बड़ा कारण है फॉरेंसिक साइंस का तेजी से बढ़ता महत्व। फॉरेंसिक साइंस का मूल आधार है — अपराध स्थल से जुटाए गए साक्ष्य, जो सच्चाई उजागर करने और न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इस क्षेत्र में रुचि रखने वाले छात्रों को विभिन्न प्रकार के साक्ष्यों की अच्छी समझ होनी चाहिए।

फॉरेंसिक साक्ष्य क्या होता है?
कोई भी वस्तु जो अपराध स्थल या अपराध से जुड़ी हो और वैज्ञानिक तरीके से जांच के योग्य हो, उसे फॉरेंसिक साक्ष्य कहा जाता है। यह साक्ष्य जांचकर्ताओं को यह समझने में मदद करता है कि अपराध कैसे और किसने किया, और इसका उपयोग अदालत में भी होता है।

फॉरेंसिक साक्ष्य दो मुख्य प्रकार के होते हैं:

भौतिक साक्ष्य (Tangible Evidence): उंगलियों के निशान, खून, हथियार आदि।

मौखिक साक्ष्य (Testimonial Evidence): गवाहों या घटना में शामिल लोगों के बयान।

वैज्ञानिक परीक्षणों के चलते भौतिक साक्ष्य को आमतौर पर मौखिक साक्ष्यों से अधिक विश्वसनीय माना जाता है।

फॉरेंसिक साक्ष्यों के प्रकार

1. जैविक साक्ष्य (Biological Evidence):
खून, थूक, बाल, त्वचा कोशिकाएं और अन्य जैविक तरल। डीएनए प्रोफाइलिंग की मदद से भारत में पुराने और गलत मामलों को भी सुलझाया गया है।

2. ट्रेस साक्ष्य (Trace Evidence):
छोटे-छोटे कण जैसे बाल, कपड़े के रेशे, मिट्टी, रंग के टुकड़े और कांच, जो अपराध स्थल पर छूट जाते हैं।

3. फिंगरप्रिंट साक्ष्य (Fingerprint Evidence):
हर व्यक्ति की उंगलियों के निशान अलग होते हैं। भारत में पुलिस विभाग फिंगरप्रिंट्स का डाटाबेस रखते हैं ताकि अपराधियों को पहचाना जा सके।

4. डिजिटल साक्ष्य (Digital Evidence):
मोबाइल, कंप्यूटर, ईमेल, सोशल मीडिया और GPS से जुटाए गए डेटा की जांच। साइबर क्राइम यूनिट इसी पर निर्भर करती है।

5. बैलिस्टिक साक्ष्य (Ballistics Evidence):
बंदूक और गोला-बारूद से जुड़े मामलों में गोलियों, खोल और बारूद के कणों की जांच की जाती है।

फॉरेंसिक साक्ष्य सिखाने के क्या लाभ हैं?
भारत में फॉरेंसिक साइंस का करियर चुनने वालों के लिए यह जरूरी है कि वे साक्ष्यों के प्रकारों को समझें:

शैक्षणिक तैयारी: परीक्षाओं और कोर्स में साक्ष्य से जुड़े सवाल जरूर होते हैं।

प्रायोगिक कौशल: फॉरेंसिक विशेषज्ञों को साक्ष्य को सही तरीके से संभालना और जांचना आना चाहिए।

करियर अवेयरनेस: डीएनए, फिंगरप्रिंट और डिजिटल जांच जैसे क्षेत्रों में करियर विकल्प उपलब्ध हैं।

भारत में उभरते ट्रेंड्स

AI और मशीन लर्निंग: डीएनए और फिंगरप्रिंट की जांच और अधिक सटीक बन रही है।

ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी: साक्ष्य की सुरक्षा और ट्रैकिंग में सहायक।

फॉरेंसिक नैनोटेक्नोलॉजी: सूक्ष्म साक्ष्यों की पहचान में प्रयोग।

आईएसओ 17025 और एनएबीएल मान्यता: सभी प्रयोगशालाओं में एक समान मानक लागू करने के लिए।

शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम: कानून अधिकारियों और आम जनता को फॉरेंसिक साइंस का महत्व समझाना।

भारत में फॉरेंसिक साक्ष्यों की प्रक्रिया
भारत में फॉरेंसिक साक्ष्यों को अदालत में मान्य बनाने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है:
– अपराध स्थल पर जांचकर्ता सुरक्षा उपकरण पहनकर साक्ष्य इकट्ठा करते हैं।
– साक्ष्य को वैज्ञानिक तरीके से पैक कर Central Forensic Science Laboratory या राज्य की मान्यता प्राप्त लैब्स में भेजा जाता है।

छात्र फॉरेंसिक साइंस में करियर के लिए कैसे तैयार हों?
– मान्यता प्राप्त संस्थानों के कोर्स जॉइन करें।
– फॉरेंसिक लैब्स या पुलिस विभागों में इंटर्नशिप करें।
– डिजिटल फॉरेंसिक्स और बायोटेक्नोलॉजी के नवीनतम तरीकों से अपडेट रहें।
– लॉ और विज्ञान के बीच संबंधों को समझना सीखें।
– AIFSS 2025 जैसे सेमिनारों और कॉन्फ्रेंस में भाग लें।

भारत के न्याय तंत्र में फॉरेंसिक साइंस की भूमिका लगातार बढ़ रही है। नई तकनीक और कानूनों की बदौलत यह क्षेत्र छात्रों के लिए एक रोमांचक करियर विकल्प बन गया है। डीएनए से लेकर डिजिटल फाइलों तक, जो छात्र विज्ञान के जरिए कानून को मजबूत बनाना चाहते हैं, उनके लिए यह क्षेत्र अनंत संभावनाएं रखता है।

शीर्ष फॉरेंसिक साइंस कॉलेजों में प्रवेश के लिए एंट्रेंस एग्जाम और मेरिट दोनों में अच्छा प्रदर्शन जरूरी है। AIFSET, जिसे Edinbox द्वारा आयोजित किया जाता है, एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा है जो छात्रों को शीर्ष प्राइवेट यूनिवर्सिटी में प्रवेश का अवसर देती है। 

Asmita Sarkar

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