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क्षत-विक्षत शवों की पहचान आसान बनाने के लिए एम्स ने बनाया नया प्रोटोकॉल, राष्ट्रीय मॉर्चरी पर भी विचार

AIIMS has developed a new protocol to facilitate the identification of mutilated bodies

देश में दुर्घटनाओं, ब्लास्ट या अन्य गंभीर घटनाओं में कई बार ऐसी स्थितियां सामने आती हैं जहां मृतकों के पार्थिव शरीर पहचान लायक नहीं रहते। इन संवेदनशील हालात में परिजनों को सही जानकारी और सम्मानजनक तरीके से शव सौंपना बड़ी चुनौती बन जाती है। अब दिल्ली स्थित ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) ने इस चुनौती को देखते हुए एक नया प्रोटोकॉल तैयार किया है, जिसके तहत क्षत-विक्षत शवों का वैज्ञानिक रूप से पुनर्निर्माण कर उन्हें पहचान योग्य बनाया जाएगा। इसी के साथ देश में एक नेशनल मॉर्चरी स्थापित करने पर भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

बेहतर हालात में सौंपे जाएं पार्थिव शरीर: एम्स का नया प्रोटोकॉल

एम्स के फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग प्रमुख डॉ. सुधीर गुप्ता ने बताया कि संस्थान ने एक विस्तृत प्रोटोकॉल तैयार किया है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृत्यु के बाद किसी भी व्यक्ति के पार्थिव शरीर को तकनीकी रूप से तैयार करके परिजनों तक बेहतर हालत में पहुंचाया जा सके।

उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में शव इतने क्षत-विक्षत होते हैं कि परिवारजन उन्हें पहचान भी नहीं पाते। ऐसे मामलों में पुनर्निर्माण (reconstruction) एक अहम प्रक्रिया बन जाती है, जिससे पहचान की संभावना बढ़ जाती है।

शव पुनर्निर्माण की तकनीक: 14 घंटे तक चलता है जटिल काम

डॉ. गुप्ता के मुताबिक कई घटनाओं—खासकर सड़क हादसों और ब्लास्ट—में चेहरे और शरीर के हिस्से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। ऐसे में विशेषज्ञ टीम चेहरे की संरचना को पूर्व रूप में लाने के लिए विशेष सर्जरी तकनीकों का उपयोग करती है। 

यदि किसी विस्फोट में चेहरे का हिस्सा उड़ गया हो, तो उपलब्ध ऊतकों और क्षतिग्रस्त स्थान को वैज्ञानिक विधियों से दोबारा गढ़ा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया करीब 14 घंटे तक चल सकती है। इसका उद्देश्य है कि मृतक की अंतिम झलक परिजन उस रूप में देख सकें जिससे पहचान स्पष्ट हो।

शव संरक्षण के लिए उन्नत तकनीकें 

शव संरक्षण (preservation) भी इस प्रोटोकॉल का अहम हिस्सा है। एम्स में एम्बाम्बिंग (embalming), विशेष रसायनों का उपयोग और तापमान नियंत्रण तकनीकों के माध्यम से शव को अधिक समय तक सुरक्षित रखा जाता है।

डॉ. गुप्ता बताते हैं कि कई बार विस्फोट जैसे मामलों में कई शवों के अंग एक-दूसरे में मिल जाते हैं। ऐसे में सही तरीके से उन्हें अलग करना और पुनर्निर्मित करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य होता है, जिसके लिए विशेष दक्षता और सावधानी की जरूरत होती है।

डीएनए मैचिंग के लिए सभी बॉडी पार्ट एक ही स्थान पर हों

फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया है कि डीएनए पहचान प्रक्रिया को सरल और सटीक बनाने के लिए जरूरी है कि मृतक के सभी शरीर के अंग एक ही संस्थान में रखे जाएं।

डॉ. गुप्ता ने कहा कि अक्सर देखा गया है कि एक बॉडी पार्ट का डीएनए किसी अस्पताल में मिलाया जाता है, जबकि दूसरा हिस्सा दूसरे केंद्र में भेज दिया जाता है। इससे पहचान की प्रक्रिया और जटिल हो जाती है।

देश में बनेगी राष्ट्रीय मॉर्चरी? क्षमता 400–500 शवों की

हवाई दुर्घटनाओं, बड़े ट्रेन हादसों या आतंकवादी हमलों जैसी घटनाओं में बड़ी संख्या में मौतें होती हैं। ऐसे मामलों में एक ही स्थान पर दर्जनों शवों को वैज्ञानिक तरीके से रखना मुश्किल हो जाता है।

इसी को देखते हुए भारत में नेशनल मॉर्चरी स्थापित करने का प्रस्ताव विचाराधीन है, जहां एक साथ 400 से 500 शवों को सुरक्षित तरीके से रखा जा सके। दुनिया में ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ऐसा आधुनिक मॉर्चरी सिस्टम पहले से मौजूद है, और भारत भी अब इसी दिशा में कदम बढ़ा सकता है।

एम्स का नया प्रोटोकॉल न सिर्फ तकनीकी सुधार है, बल्कि मृतकों और उनके परिजनों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण भी दर्शाता है। शव पुनर्निर्माण और संरक्षण की उन्नत तकनीकें भविष्य में बड़े हादसों की स्थितियों में पहचान और प्रक्रियाओं को कहीं अधिक व्यवस्थित और मानवीय बना सकती हैं। देश में प्रस्तावित नेशनल मॉर्चरी इस दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है। 

एडइनबॉक्स टीम

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